अष्टावक्र का प्रथम प्रश्न : सभ्यता के शोर में आत्मा की पुकार
अष्ट्रावक्र गीता केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं है; यह मनुष्य की अंतःचेतना का वह दर्पण है जिसमें जीवन का वास्तविक स्वरूप दिखाई देता है। भारतीय दर्शन के विशाल आकाश में अनेक ग्रंथ हैं, अनेक उपदेश हैं, अनेक वाद-विवाद हैं, किंतु अष्टावक्र गीता की निर्भीकता और आत्मबोध की तीव्रता उसे अद्वितीय बनाती है।
यहाँ कोई कर्मकांड नहीं, कोई बाहरी प्रदर्शन नहीं, कोई धार्मिक भय नहीं। यहाँ केवल आत्मा और सत्य का सीधा संवाद है। यही कारण है कि इसका प्रथम श्लोक ही मानव सभ्यता के सबसे बड़े प्रश्न को उद्घाटित कर देता है—
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो॥
राजा जनक पूछते हैं—
“हे प्रभु! ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? मुक्ति कैसे मिलती है? और वैराग्य कैसे प्राप्त हो?”
देखने में यह साधारण प्रश्न प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में यही समस्त मानव इतिहास की बेचैनी का केंद्र है। यही प्रश्न वेदों से लेकर उपनिषदों तक, बुद्ध से लेकर शंकराचार्य तक और आधुनिक मनुष्य से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग तक निरंतर गूँजता रहा है।
जब साधन बढ़ते हैं और शांति घटती है
आज का मनुष्य इतिहास के सबसे विकसित युग में खड़ा है। उसके पास विज्ञान है, तकनीक है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, संचार की अद्भुत शक्ति है। वह पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष तक पहुँच गया है। लेकिन इसी मनुष्य के भीतर एक गहरा खालीपन भी बढ़ता जा रहा है।
उसके पास सूचना का महासागर है, परंतु आत्मज्ञान की एक बूँद नहीं।
वह हजारों लोगों से जुड़ा हुआ है, लेकिन स्वयं से कट चुका है।
वह संसार को जीतना चाहता है, किंतु अपने मन पर विजय नहीं पा सका।
यहीं अष्टावक्र का प्रथम प्रश्न आधुनिक सभ्यता पर सबसे बड़ा प्रहार बनकर सामने आता है।
ज्ञान क्या है?
क्या डिग्रियों का संग्रह ज्ञान है?
क्या इंटरनेट की जानकारी ज्ञान है?
क्या शब्दों का बोझ ज्ञान है?
अष्टावक्र कहते हैं— नहीं।
ज्ञान वह है जो मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराए। जो उसे यह समझा दे कि वह केवल शरीर नहीं, केवल उपभोक्ता नहीं, केवल बाजार का एक आँकड़ा नहीं। उसके भीतर एक चेतना है, एक आत्मा है, जो अनंत है।
आज की शिक्षा मनुष्य को कुशल कर्मचारी बना रही है, परंतु जाग्रत मनुष्य नहीं बना पा रही। इसलिए डिग्रियाँ बढ़ रही हैं और दिशाहीनता भी।
मुक्ति : केवल मृत्यु के बाद नहीं
राजा जनक का दूसरा प्रश्न है— “मुक्ति कैसे मिले?”
आधुनिक युग में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो गया है। क्योंकि आज मनुष्य बाहर से जितना स्वतंत्र दिखता है, भीतर से उतना ही बंधा हुआ है।
वह मोबाइल का दास है।
वह प्रशंसा का दास है।
वह तुलना और प्रतिस्पर्धा का दास है।
वह अपनी इच्छाओं का बंदी है।
उसकी मुस्कान कृत्रिम है और उसकी थकान वास्तविक।
अष्टावक्र गीता कहती है कि मुक्ति किसी दूसरे लोक में मिलने वाली वस्तु नहीं है। मुक्ति तब प्रारंभ होती है जब मनुष्य अपने भीतर के भय, लोभ, मोह और अहंकार को पहचान लेता है।
जिस दिन मनुष्य बाहरी मान्यता पर निर्भर रहना छोड़ देता है, उसी दिन उसकी स्वतंत्रता का जन्म होता है।
वैराग्य : भागना नहीं, जागना
आज वैराग्य शब्द को सुनते ही लोगों के मन में सन्यास, जंगल और संसार-त्याग की छवि उभरती है। लेकिन अष्टावक्र का वैराग्य पलायन नहीं है।
वैराग्य का अर्थ है—
संसार में रहकर भी उसके मोह का गुलाम न बनना।
राजा जनक स्वयं राजा थे। उनके पास सत्ता थी, वैभव था, ऐश्वर्य था। फिर भी वे वैराग्य का प्रश्न पूछ रहे थे। इसका अर्थ स्पष्ट है कि वैराग्य वस्त्र बदलने से नहीं आता, दृष्टि बदलने से आता है।
आज मनुष्य वस्तुओं का स्वामी नहीं रहा; वस्तुएँ मनुष्य की स्वामिनी बन गई हैं। बाज़ार उसकी इच्छाएँ तय कर रहा है। विज्ञापन उसके विचार बना रहे हैं। सोशल मीडिया उसकी आत्मा की दिशा नियंत्रित कर रहा है।
ऐसे समय में वैराग्य का अर्थ है—
अपने विवेक को बचा लेना।
सभ्यता का संकट और अष्टावक्र की प्रासंगिकता
आज पूरी दुनिया विकास की दौड़ में है, लेकिन इस दौड़ ने मनुष्य को भीतर से खोखला कर दिया है। विज्ञान ने सुविधा दी, पर शांति नहीं। बाजार ने विकल्प दिए, पर संतोष नहीं।
अष्टावक्र का पहला श्लोक इसीलिए आज केवल आध्यात्मिक श्लोक नहीं, बल्कि सभ्यता की समीक्षा बन गया है।
यह मनुष्य से पूछता है—
क्या तुमने स्वयं को जाना?
क्या तुम्हारी स्वतंत्रता वास्तविक है?
क्या तुम्हारा जीवन तुम्हारे विवेक से संचालित है या बाजार से?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है, तो सारी प्रगति अधूरी है।
भारत की सांस्कृतिक दृष्टि
भारतीय दर्शन ने सदैव बाहरी विजय से अधिक आंतरिक विजय को महत्व दिया। पश्चिम ने संसार को जीतने की बात की; भारत ने स्वयं को जीतने की।
इसीलिए अष्टावक्र गीता भारत की उस आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है जो कहती है—
“मनुष्य का सबसे बड़ा युद्ध बाहर नहीं, भीतर है।”
जब व्यक्ति स्वयं पर विजय पा लेता है, तभी समाज स्वस्थ होता है, राजनीति नैतिक होती है और राष्ट्र सांस्कृतिक रूप से शक्तिशाली बनता है।
निष्कर्ष
अष्टावक्र गीता का प्रथम श्लोक आज के युग में एक दीपस्तंभ की तरह है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल तकनीकी प्राणी नहीं, बल्कि चेतन सत्ता है।
ज्ञान बिना आत्मबोध के अधूरा है।
मुक्ति बिना आंतरिक स्वतंत्रता के असंभव है।
और वैराग्य बिना विवेक के केवल अभिनय है।
आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ रही है, तब अष्टावक्र मनुष्य को उसकी वास्तविक बुद्धि की ओर बुला रहे हैं।
और शायद यही इस श्लोक की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।
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