पत्रकारिता में आरक्षण ?क्या चौथे स्तम्भ को भी जातियों में बाँटा जाएगा?
साँप की मन्तर न जाने बिच्छू के बिल में हाथ डाले
किसने रोका पत्रकारिता करने से
बस्ती, विशिष्ठ नगर सम्वाददाता, 272001
भीम आर्मी ने लोकतंत्र के चारों स्तम्भों में आरक्षण की मांग कर एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व पर बहस हो सकती है, लेकिन पत्रकारिता को भी आरक्षण के दायरे में लाने की मांग लोकतंत्र की आत्मा को समझने की चुनौती प्रस्तुत करती है।पत्रकारिता कोई सरकारी विभाग नहीं है, न ही यह नियुक्तियों और पदोन्नतियों का ऐसा ढाँचा है जिसे शासनादेशों से संचालित किया जा सके। पत्रकारिता एक विचारधारा नहीं, बल्कि विचारों का मुक्त बाजार है; एक पद नहीं, बल्कि एक दायित्व है; एक नौकरी नहीं, बल्कि सत्य की खोज का सतत संघर्ष है।
कलम की कोई जाति नहीं होती, प्रश्नों का कोई आरक्षण नहीं होता और सत्य किसी वर्ग विशेष का बंधक नहीं होता। यदि समाचारों, संपादकीयों और विचारों को भी जातीय खाँचों में बाँटने की शुरुआत हुई, तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ स्वतंत्र नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक कोटों का बंधक बन जाएगा।विडम्बना यह है कि जिन महापुरुषों के नाम पर सामाजिक न्याय की बात की जाती है, उनमें से अनेक स्वयं शिक्षा, संघर्ष, प्रतिभा और वैचारिक शक्ति के बल पर स्थापित हुए थे। उन्होंने अवसरों की समानता की बात की थी, विचारों की गुलामी की नहीं।
निस्संदेह मीडिया में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी बढ़नी चाहिए। ग्रामीण, दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक—सभी की आवाज़ समाचार जगत में सुनी जानी चाहिए। परंतु इसका समाधान आरक्षण नहीं, बल्कि शिक्षा, प्रशिक्षण, संसाधनों तक पहुँच और निष्पक्ष अवसर हैं।प्रश्न यह है कि क्या पत्रकार का चयन उसकी जाति देखकर होगा या उसकी कलम देखकर? क्या समाचार की विश्वसनीयता उसके सामाजिक वर्ग से तय होगी या उसके तथ्यों से?
लोकतंत्र की रक्षा के लिए चौथा स्तम्भ स्वतंत्र रहना चाहिए। जिस दिन पत्रकारिता पर जातीय पहचान हावी हो गई, उस दिन समाचार कम और सामाजिक खेमेबंदी अधिक दिखाई देगी।सामाजिक न्याय आवश्यक है, पर सत्य की खोज पर किसी प्रकार का आरक्षण नहीं लगाया जा सकता। पत्रकारिता की एकमात्र धारा है—सत्य, और उसकी एकमात्र जाति है—जनहित।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें