"जब प्रश्न मृत्यु से टकराया" - कौटिल्य का भारत

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बुधवार, 3 जून 2026

"जब प्रश्न मृत्यु से टकराया"

नचिकेता : विश्व का प्रथम और सर्वोच्च प्रश्न कर्ता,जिसने मृत्यु को भी निरुत्तर कर दिया

बस्ती 272001


मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ उत्तरों से नहीं, प्रश्नों से जन्मी हैं। पहिए का आविष्कार, विज्ञान की खोजें, दर्शन की परंपराएँ और धर्मों की स्थापना—इन सबके मूल में किसी न किसी मनुष्य का एक प्रश्न था। प्रश्न ही वह शक्ति है जो मनुष्य को पशु से अलग करती है, जिज्ञासु को साधारण से असाधारण बनाती है और सभ्यता को आगे बढ़ाती है। विश्व इतिहास में अनेक महान प्रश्नकर्ता हुए। सुकरात ने समाज से पूछा—सत्य क्या है, न्याय क्या है, नैतिकता क्या है? गौतम बुद्ध ने जीवन से पूछा—दुःख क्यों है और मुक्ति कैसे संभव है? अय्यूब ने ईश्वर से पूछा—यदि न्याय है तो पीड़ा क्यों है? हैमलेट ने स्वयं से पूछा—जीवन का अर्थ क्या है? जनक ने अष्टावक्र से रहस्य का सत्य पूछा। किन्तु इन सबके बीच भारतीय ज्ञान परंपरा का एक बालक ऐसा है जिसने प्रश्नों की दिशा ही बदल दी। उसने समाज, जीवन, ईश्वर या स्वयं से नहीं, बल्कि मृत्यु से प्रश्न किया। वह बालक था—नचिकेता। नचिकेता का प्रश्न केवल एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं था। वह मानवता की आदि-जिज्ञासा थी। वह प्रश्न था—"मनुष्य के मरने के बाद क्या बचता है?"

यह वही प्रश्न है जिसने युगों से मनुष्य को बेचैन रखा है। साम्राज्य बने और मिट गए, धर्म आए और विकसित हुए, विज्ञान ने अनगिनत रहस्यों का उद्घाटन किया, किंतु मृत्यु का रहस्य आज भी मानव चेतना के केंद्र में है। नचिकेता ने उसी रहस्य के हृदय पर प्रहार किया था।नचिकेता की महानता केवल उसके प्रश्न में नहीं है, बल्कि उसके चरित्र में है। जब मृत्यु के देवता यम ने उसे धन, वैभव, राज्य, सुंदरियाँ, लंबी आयु और सांसारिक सुखों का प्रस्ताव दिया, तब उसने सब ठुकरा दिया। उसने समझ लिया था कि जो स्वयं नश्वर है, वह नश्वरता के प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता। उसे संपत्ति नहीं चाहिए थी, सत्य चाहिए था; उसे सुख नहीं चाहिए था, ज्ञान चाहिए था; उसे जीवन का विस्तार नहीं चाहिए था, जीवन का रहस्य चाहिए था।

यहीं नचिकेता विश्व के अन्य सभी प्रश्नकर्ताओं से अलग और ऊँचा दिखाई देता है। सुकरात के प्रश्न समाज के भीतर थे, बुद्ध के प्रश्न जीवन के भीतर थे, अय्यूब के प्रश्न आस्था के भीतर थे, हैमलेट के प्रश्न मन के भीतर थे; पर नचिकेता का प्रश्न जीवन और मृत्यु दोनों की सीमाओं के पार था। वह अस्तित्व के अंतिम द्वार पर दस्तक दे रहा था। भारतीय सभ्यता की विशिष्टता भी यहीं दिखाई देती है। अनेक सभ्यताओं ने मृत्यु को भय का विषय माना, पर भारत ने उसे ज्ञान का विषय बनाया। अनेक परंपराओं ने मृत्यु से बचने की चेष्टा की, पर उपनिषदों ने मृत्यु से संवाद करने का साहस किया। नचिकेता इसी साहस का नाम है।

आज का युग सूचना का युग है। उत्तर बहुत हैं, पर प्रश्न कम हैं। लोग जानकार अधिक हैं, जिज्ञासु कम। शिक्षा डिग्री देती है, पर जिज्ञासा नहीं जगाती। ऐसे समय में नचिकेता केवल एक उपनिषदिक पात्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आवश्यकता बन जाता है। वह हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान का आरंभ श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होता है; और जिज्ञासा का सर्वोच्च रूप वह है जो सुविधा नहीं, सत्य खोजे।

नचिकेता हमें यह भी सिखाता है कि महान प्रश्न पूछने के लिए आयु नहीं, साहस चाहिए। वह बालक था, पर उसके सामने स्वयं मृत्यु को उत्तर देना पड़ा। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में नचिकेता केवल एक चरित्र नहीं, बल्कि ज्ञान की अखंड ज्योति है।यदि विश्व के प्रश्नकर्ताओं का क्रम बनाया जाए तो नचिकेता को अंत में नहीं, आरंभ में रखा जाना चाहिए; क्योंकि उसने वह प्रश्न पूछा था जिसके उत्तर खोजने में मानवता आज भी लगी हुई है।

सुकरात ने समाज को जगाया, बुद्ध ने चेतना को जगाया, अय्यूब ने आस्था को जगाया, हैमलेट ने आत्ममंथन को जगाया; पर नचिकेता ने स्वयं मृत्यु को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर दिया।और शायद इसी कारण भारतीय सभ्यता गर्व से कह सकती है—"विश्व ने अनेक उत्तरदाता देखे हैं, अनेक उपदेशक देखे हैं, अनेक दार्शनिक देखे हैं; पर मृत्यु से सत्य का उत्तर मांगने वाला प्रथम और सर्वोच्च प्रश्नकर्ता नचिकेता था।"

मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ उत्तरों से नहीं, प्रश्नों से जन्मी हैं। पहिए का आविष्कार, विज्ञान की खोजें, दर्शन की परंपराएँ और धर्मों की स्थापना—इन सबके मूल में किसी न किसी मनुष्य का एक प्रश्न था। प्रश्न ही वह शक्ति है जो मनुष्य को पशु से अलग करती है, जिज्ञासु को साधारण से असाधारण बनाती है और सभ्यता को आगे बढ़ाती है।

विश्व इतिहास में अनेक महान प्रश्नकर्ता हुए। सुकरात ने समाज से पूछा—सत्य क्या है, न्याय क्या है, नैतिकता क्या है? गौतम बुद्ध ने जीवन से पूछा—दुःख क्यों है और मुक्ति कैसे संभव है? अय्यूब  ने ईश्वर से पूछा—यदि न्याय है तो पीड़ा क्यों है? हैमलेट ने स्वयं से पूछा—जीवन का अर्थ क्या है? किन्तु इन सबके बीच भारतीय ज्ञान परंपरा का एक बालक ऐसा है जिसने प्रश्नों की दिशा ही बदल दी। उसने समाज, जीवन, ईश्वर या स्वयं से नहीं, बल्कि मृत्यु से प्रश्न किया। वह बालक था—नचिकेता।

नचिकेता का प्रश्न केवल एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं था। वह मानवता की आदि-जिज्ञासा थी। वह प्रश्न था"मनुष्य के मरने के बाद क्या बचता है?"

यह वही प्रश्न है जिसने युगों से मनुष्य को बेचैन रखा है। साम्राज्य बने और मिट गए, धर्म आए और विकसित हुए, विज्ञान ने अनगिनत रहस्यों का उद्घाटन किया, किंतु मृत्यु का रहस्य आज भी मानव चेतना के केंद्र में है। नचिकेता ने उसी रहस्य के हृदय पर प्रहार किया था।नचिकेता की महानता केवल उसके प्रश्न में नहीं है, बल्कि उसके चरित्र में है। जब मृत्यु के देवता यम ने उसे धन, वैभव, राज्य, सुंदरियाँ, लंबी आयु और सांसारिक सुखों का प्रस्ताव दिया, तब उसने सब ठुकरा दिया। उसने समझ लिया था कि जो स्वयं नश्वर है, वह नश्वरता के प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता। उसे संपत्ति नहीं चाहिए थी, सत्य चाहिए था; उसे सुख नहीं चाहिए था, ज्ञान चाहिए था; उसे जीवन का विस्तार नहीं चाहिए था, जीवन का रहस्य चाहिए था।

यहीं नचिकेता विश्व के अन्य सभी प्रश्नकर्ताओं से अलग और ऊँचा दिखाई देता है। सुकरात के प्रश्न समाज के भीतर थे, बुद्ध के प्रश्न जीवन के भीतर थे, अय्यूब के प्रश्न आस्था के भीतर थे, हैमलेट के प्रश्न मन के भीतर थे; पर नचिकेता का प्रश्न जीवन और मृत्यु दोनों की सीमाओं के पार था। वह अस्तित्व के अंतिम द्वार पर दस्तक दे रहा था।

भारतीय सभ्यता की विशिष्टता भी यहीं दिखाई देती है। अनेक सभ्यताओं ने मृत्यु को भय का विषय माना, पर भारत ने उसे ज्ञान का विषय बनाया। अनेक परंपराओं ने मृत्यु से बचने की चेष्टा की, पर उपनिषदों ने मृत्यु से संवाद करने का साहस किया। नचिकेता इसी साहस का नाम है।

आज का युग सूचना का युग है। उत्तर बहुत हैं, पर प्रश्न कम हैं। लोग जानकार अधिक हैं, जिज्ञासु कम। शिक्षा डिग्री देती है, पर जिज्ञासा नहीं जगाती। ऐसे समय में नचिकेता केवल एक उपनिषदिक पात्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आवश्यकता बन जाता है। वह हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान का आरंभ श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होता है; और जिज्ञासा का सर्वोच्च रूप वह है जो सुविधा नहीं, सत्य खोजे।

नचिकेता हमें यह भी सिखाता है कि महान प्रश्न पूछने के लिए आयु नहीं, साहस चाहिए। वह बालक था, पर उसके सामने स्वयं मृत्यु को उत्तर देना पड़ा। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में नचिकेता केवल एक चरित्र नहीं, बल्कि ज्ञान की अखंड ज्योति है।

यदि विश्व के प्रश्नकर्ताओं का क्रम बनाया जाए तो नचिकेता को अंत में नहीं, आरंभ में रखा जाना चाहिए; क्योंकि उसने वह प्रश्न पूछा था जिसके उत्तर खोजने में मानवता आज भी लगी हुई है।

सुकरात ने समाज को जगाया, बुद्ध ने चेतना को जगाया, अय्यूब ने आस्था को जगाया, हैमलेट ने आत्ममंथन को जगाया; पर नचिकेता ने स्वयं मृत्यु को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर दिया।और शायद इसी कारण भारतीय सभ्यता गर्व से कह सकती है—

"विश्व ने अनेक उत्तरदाता देखे हैं, अनेक उपदेशक देखे हैं, अनेक दार्शनिक देखे हैं; पर मृत्यु से सत्य का उत्तर मांगने वाला प्रथम और सर्वोच्च प्रश्नकर्ता नचिकेता था।"सनातन ही है जो सत्य से साक्षात्कार  कर सकता है ।

राजेंद्र नाथ तिवारी


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