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मंगलवार, 16 जून 2026

बस्ती में धन की बाढ़, खेतों में सूखा! आखिर जिम्मेदार कौन?

 बस्ती में धन की बाढ़, खेतों में सूखा! आखिर जिम्मेदार कौन?

बस्ती, सम्वाददाता 

बस्ती में सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, तटबंधों और नहरों के नाम पर वर्षों से करोड़ों नहीं, अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। हर साल बजट आता है, टेंडर होते हैं, मरम्मत के दावे होते हैं, सफाई के प्रमाणपत्र बनते हैं, लेकिन जब किसान अपने खेत की ओर देखता है तो उसे पानी नहीं, व्यवस्था की विफलता दिखाई देती है।सरयू किनारे के गाँव आज भी कटान, बाढ़ और विस्थापन के भय से त्रस्त हैं। नहरें जगह-जगह गाद से भरी हैं। खेत सिंचाई के लिए तरस रहे हैं। सवाल यह है कि जब विभागों में धन की बाढ़ आई हुई है तो खेतों तक पानी क्यों नहीं पहुँच रहा? आखिर यह पैसा जाता कहाँ है?हर वर्ष बरसात से पहले नहर सफाई और तटबंध मरम्मत की फाइलें चमक उठती हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते हैं। लेकिन पहली बारिश होते ही व्यवस्थाओं की पोल खुल जाती है। यदि कार्य वास्तव में हुए हैं तो किसानों को लाभ क्यों नहीं मिला? यदि लाभ नहीं मिला तो भुगतान किस बात का हुआ?

सबसे चिंताजनक बात यह है कि शिकायतें वर्षों से उठ रही हैं, लेकिन जवाबदेही तय नहीं होती। अधिकारी आते हैं, निरीक्षण करते हैं, फोटो खिंचते हैं, प्रेस विज्ञप्तियाँ जारी होती हैं और फिर सब कुछ अगले मानसून तक के लिए स्थगित हो जाता है। जनता पूछ रही है—क्या सरकारी खजाना केवल कागजी विकास के लिए है?बस्ती के किसानों, ग्रामीणों और करदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि सिंचाई और बाढ़ सुरक्षा पर खर्च हुए अरबों रुपये का सामाजिक और तकनीकी ऑडिट कब होगा? किन अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी? किन ठेकेदारों की कार्य गुणवत्ता की जांच होगी?आज स्थिति यह है कि बरसात का बहुमूल्य जल सरयू में बह जाएगा, खेत फिर पानी को तरसेंगे और अगले वर्ष फिर वही बजट, वही दावे और वही बहाने सुनने को मिलेंगे।यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि किसान के अधिकारों पर सीधा प्रहार है।

यदि भगवान राम के नाम पर एक-एक रुपये का हिसाब मांगा जा सकता है, तो किसानों के नाम पर खर्च हुए अरबों रुपये का हिसाब मांगना भी लोकतंत्र का अधिकार है। बस्ती पूछ रही है,"नहरें सूखी क्यों हैं?""तटबंध कमजोर क्यों हैं?""किसान प्यासा क्यों है?"और सबसे बड़ा सवाल—आखिर जिम्मेदार कौन है?"अब केवल आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए। जांच चाहिए। जवाबदेही चाहिए।क्योंकि जनता का पैसा जनता के लिए है, किसी विभागीय रहस्य के लिए नहीं।

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