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मंगलवार, 16 जून 2026

वन्देमातरम् और आज का भारत : राष्ट्रभाव से राष्ट्रनिर्माण तक,102

 

वन्देमातरम् और आज का भारत : राष्ट्रभाव से राष्ट्रनिर्माण तक







इमेज, गूगल 


भारत के राष्ट्रीय जीवन में यदि किसी गीत ने जनभावना, सांस्कृतिक चेतना और स्वतंत्रता संघर्ष को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया है, तो वह "वन्देमातरम्" है। यह केवल दो शब्द नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का वह स्वर है जिसने गुलामी के अंधकार में स्वाधीनता का दीप जलाया और आज भी राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा देता है। वन्देमातरम् का अर्थ केवल मातृभूमि को प्रणाम करना नहीं है। भारतीय दर्शन में भूमि मात्र भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास, परंपरा, प्रकृति और लोकजीवन का समग्र स्वरूप है। इसी कारण भारत में राष्ट्रवाद सत्ता से नहीं, संस्कृति से जन्म लेता है। वन्देमातरम् उसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उद्घोष है जिसमें हिमालय की ऊँचाई, गंगा की पवित्रता, खेतों की हरियाली, संतों की वाणी और बलिदानियों का रक्त एक साथ बोलता है।स्वतंत्रता आंदोलन में वन्देमातरम् ने लाखों भारतीयों को एकजुट किया। यह ऐसा मंत्र था जिसने जाति, भाषा, क्षेत्र और वर्ग के भेदों को पीछे छोड़ दिया। अंग्रेजी सत्ता के लिए यह एक गीत था, लेकिन भारतीयों के लिए यह राष्ट्रीय अस्मिता की घोषणा थी। क्रांतिकारियों के फाँसी के फंदे से लेकर जनसभाओं के नारों तक, वन्देमातरम् ने संघर्ष को संकल्प में बदलने का कार्य किया। किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वन्देमातरम् की भूमिका समाप्त नहीं हुई। राष्ट्र केवल विदेशी शासन से मुक्त होकर महान नहीं बनता; उसे निरंतर आत्मनिर्माण करना पड़ता है। आज का भारत इसी आत्मनिर्माण के दौर से गुजर रहा है। विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाने वाला भारत, अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाला भारत, डिजिटल क्रांति का नेतृत्व करने वाला भारत और वैश्विक मंचों पर निर्णायक भूमिका निभाने वाला भारत—इन सबके पीछे केवल सरकारी नीतियाँ नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सामूहिक ऊर्जा कार्य कर रही है।
आज वन्देमातरम् का अर्थ बदलते समय के साथ और व्यापक हो गया है। स्वतंत्रता संग्राम के समय यह विदेशी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक था, जबकि आज यह आत्मनिर्भरता, नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय चरित्र का प्रतीक है। यदि कोई युवा रोजगार माँगने के बजाय रोजगार सृजित करता है, यदि कोई वैज्ञानिक देश की तकनीकी क्षमता बढ़ाता है, यदि कोई किसान आधुनिक तकनीक से उत्पादन बढ़ाता है, यदि कोई शिक्षक राष्ट्रहित की चेतना से विद्यार्थियों को शिक्षित करता है, तो वह आधुनिक वन्देमातरम् का ही स्वरूप है।
आज भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि विकास और संस्कृति के बीच संतुलन बनाए रखना है। वैश्वीकरण के इस युग में अनेक राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक पहचान खो रहे हैं। भारत की शक्ति उसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं को आधुनिकता के साथ जोड़ने की क्षमता में है। एक ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान और डिजिटल अर्थव्यवस्था है, तो दूसरी ओर उपनिषद, गीता, बुद्ध, महावीर और विवेकानंद की विरासत है। वन्देमातरम् हमें याद दिलाता है कि आधुनिकता तभी सार्थक है जब वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। लोकतंत्र के संदर्भ में भी वन्देमातरम् की नई व्याख्या आवश्यक है। राष्ट्रभक्ति केवल नारों और उत्सवों तक सीमित नहीं हो सकती। ईमानदारी से कर देना, कानून का पालन करना, मतदान करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और समाज के प्रति उत्तरदायी रहना भी राष्ट्रसेवा है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक होंगे। वन्देमातरम् नागरिक चेतना का भी मंत्र है।
आज सूचना क्रांति के युग में पत्रकारिता की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। जो पत्रकार गाँवों, किसानों, श्रमिकों और आमजन की समस्याओं को सामने लाते हैं, वे लोकतंत्र के वास्तविक प्रहरी हैं। वन्देमातरम् का भाव पत्रकारिता को सत्ता का नहीं, सत्य का पक्षधर बनने की प्रेरणा देता है। राष्ट्रहित और जनहित के बीच संतुलन ही पत्रकारिता की वास्तविक कसौटी है।
भारत की युवा शक्ति इस समय विश्व की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक है। यदि यह युवा वर्ग केवल उपभोक्ता बनकर रह गया तो अवसर खो देगा, लेकिन यदि यह नवाचार, अनुसंधान, उद्यमिता और सामाजिक नेतृत्व का दायित्व उठाएगा तो भारत विश्व नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ेगा। आज वन्देमातरम् युवाओं को भावुकता नहीं, उत्कृष्टता का संदेश देता है। राष्ट्रप्रेम का सर्वोच्च रूप अपने कार्यक्षेत्र में श्रेष्ठता प्राप्त करना है।वैश्विक स्तर पर भारत का बढ़ता प्रभाव भी वन्देमातरम् की भावना का विस्तार है। भारत विश्व को केवल बाजार नहीं, बल्कि विचार दे सकता है। जलवायु संकट, वैश्विक असमानता, तकनीकी नैतिकता और शांति जैसे विषयों पर भारत की सभ्यतागत दृष्टि मानवता को नया मार्ग दिखा सकती है। "वसुधैव कुटुम्बकम्" और "वन्देमातरम्" मिलकर यह संदेश देते हैं कि जो अपनी मातृभूमि से प्रेम करता है, वही सम्पूर्ण मानवता के प्रति भी उत्तरदायी हो सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि वन्देमातरम् को केवल ऐतिहासिक स्मृति या राजनीतिक विमर्श तक सीमित न रखा जाए। इसे राष्ट्रनिर्माण की जीवंत प्रेरणा के रूप में देखा जाए। जब किसान खेत में परिश्रम करता है, सैनिक सीमा पर डटा रहता है, वैज्ञानिक प्रयोगशाला में शोध करता है, शिक्षक विद्यार्थियों का भविष्य गढ़ता है, पत्रकार सत्य को सामने लाता है और नागरिक अपने दायित्वों का निर्वाह करता है, तब वन्देमातरम् केवल गाया नहीं जाता—वह साकार होता है।
अंततः, वन्देमातरम् अतीत का गौरव नहीं, भविष्य का मार्गदर्शन है। यह भारत की मिट्टी के प्रति श्रद्धा, संस्कृति के प्रति सम्मान, स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता और विकास के प्रति संकल्प का नाम है। आज का भारत जितना आधुनिक होगा, उतना ही अपनी आत्मा से जुड़ा होना चाहिए। यदि विकास के साथ राष्ट्रीय चरित्र, तकनीक के साथ संस्कृति, शक्ति के साथ संवेदना और प्रगति के साथ आत्मबोध जुड़ जाए, तो वही वन्देमातरम् की वास्तविक साधना होगी।वन्देमातरम् का अर्थ केवल "माँ, तुझे प्रणाम" नहीं है; इसका वास्तविक अर्थ है—"माँ, मैं तेरे गौरव, तेरी रक्षा और तेरी उन्नति के लिए अपना जीवन समर्पित करता हूँ।"

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