लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की अधूरी गणना: मान्यता से वंचित पत्रकारों की राष्ट्रीय सूची क्यों नहीं ?
,वी के त्रिपाठी, सम्वाददाता, कौटिल्य का भारत, 272001
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और पत्रकारिता उसकी चेतना का सबसे सशक्त माध्यम। संसद कानून बनाती है, सरकार योजनाएं संचालित करती है, न्यायपालिका न्याय सुनिश्चित करती है, लेकिन इन सबके बीच जनता की आवाज़ को व्यवस्था तक पहुंचाने का कार्य पत्रकार करता है। दुर्भाग्य यह है कि देश में पत्रकारों का एक विशाल वर्ग आज भी सरकारी मान्यता, सरकारी आंकड़ों और सरकारी सुविधाओं से बाहर है। विशेष रूप से स्थानीय और ग्रामीण पत्रकारिता की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। बड़े समाचार पत्र, राष्ट्रीय चैनल और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान जिन समाचारों के आधार पर अपनी सुर्खियां बनाते हैं, उनका प्राथमिक स्रोत अक्सर गांव, कस्बे और तहसील स्तर पर कार्यरत वही पत्रकार होते हैं जिन्हें न पर्याप्त वेतन मिलता है, न संसाधन और न ही सरकारी पहचान। वे घटनास्थल तक सबसे पहले पहुंचते हैं, जनसमस्याओं को उजागर करते हैं और स्थानीय सूचनाओं को जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। वास्तव में स्थानीय पत्रकार ही भारतीय पत्रकारिता की जड़ हैं। यदि गांव का संवाददाता न हो तो बड़े मीडिया संस्थानों तक न तो ग्रामीण भारत की समस्याएं पहुंचेंगी और न ही वहां की उपलब्धियां। किसी गांव में पुल टूटने, स्कूल बंद होने, भ्रष्टाचार होने, बाढ़ आने, किसान की आत्महत्या, पंचायत की उपलब्धि या किसी सामाजिक नवाचार की पहली सूचना अक्सर स्थानीय पत्रकार ही देता है। बाद में यही समाचार बड़े अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों की सुर्खियां बनते हैं।
विडंबना यह है कि समाचार-संग्रह की इस पूरी श्रृंखला का सबसे कमजोर और उपेक्षित हिस्सा भी यही स्थानीय पत्रकार है। वह अपने संसाधनों से यात्रा करता है, जोखिम उठाता है, प्रशासन और समाज दोनों के दबाव झेलता है, लेकिन सरकारी अभिलेखों में उसका अस्तित्व तक स्पष्ट नहीं है। लोकतंत्र के इस मौन प्रहरी को केवल इसलिए अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि वह किसी बड़े मीडिया समूह का हिस्सा नहीं है।जब कि पूरे देश के असंगठित मजदूरों के लिए अलग से स्वास्थ्य,सुविधाएं संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं
आज डिजिटल क्रांति ने पत्रकारिता का स्वरूप बदल दिया है। हजारों युवा यूट्यूब, वेब पोर्टल, डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से पत्रकारिता कर रहे हैं। इनमें से अनेक लोग जनहित के मुद्दों को उठाकर समाज और शासन के बीच संवाद का कार्य कर रहे हैं। ऐसे पत्रकारों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन सरकार के पास उनका कोई समग्र आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
इसलिए आवश्यकता है कि केंद्र सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय देशव्यापी पत्रकार पंजीकरण अभियान चलाएं। मान्यता प्राप्त और मान्यता से वंचित पत्रकारों का पृथक-पृथक आंकड़ा संकलित किया जाए तथा एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार किया जाए। इस प्रक्रिया में स्थानीय पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों, डिजिटल पत्रकारों और ग्रामीण संवाददाताओं को विशेष रूप से शामिल किया जाना चाहिए।पत्रकारिता और पत्रकार को वास्तविक सम्मान देना ही राष्ट्रधर्म है।
यह मांग किसी विशेष सुविधा या विशेषाधिकार की नहीं है। यह पहचान और सम्मान की मांग है। न्यूनतम स्तर पर दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य सहायता, प्रशिक्षण, आपातकालीन सहायता और संस्थागत पहचान जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इसके लिए बड़े वित्तीय व्यय की आवश्यकता नहीं है; केवल नीति-निर्माताओं की इच्छाशक्ति चाहिए।यदि सरकार असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की गणना कर सकती है, किसानों का डेटाबेस तैयार कर सकती है और विभिन्न सामाजिक वर्गों का पंजीकरण कर सकती है, तो पत्रकारों के लिए भी ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि सूचना के इस विशाल नेटवर्क को आधिकारिक रूप से पहचाना जाए।आज समय की मांग है कि प्रधानमंत्री और सूचना एवं प्रसारण मंत्री इस विषय को गंभीरता से लें। पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग वर्षों से उपेक्षा का शिकार है। वह न तो पर्याप्त सुरक्षा पाता है, न सम्मान और न ही व्यवस्था में उचित स्थान। जबकि सच्चाई यह है कि बड़े मीडिया संस्थानों की चमक के पीछे गांव, कस्बों और तहसीलों में कार्यरत हजारों पत्रकारों का मौन परिश्रम छिपा होता है।लोकतंत्र की असली धड़कन महानगरों के स्टूडियो में नहीं, बल्कि गांवों की गलियों, कस्बों के चौराहों और तहसीलों के समाचार कक्षों में सुनाई देती है। वहां कार्यरत पत्रकारों को पहचान देना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति राष्ट्रीय दायित्व है। जिस दिन देश के अंतिम छोर पर कार्यरत पत्रकार को भी व्यवस्था में सम्मानजनक स्थान मिलेगा, उसी दिन लोकतंत्र का चौथा स्तंभ वास्तव में पूर्ण और सशक्त माना जाएगा।
ग्रामीण क्षेत्र के पत्रकारों के साथ अरसे से भेदभाव व उनका शोषण किया जा रहा है। न तो उनकी बात संस्थान सुनता है न ही सरकार। वर्षों से हो रही मांग के बावजूद ग्रामीण क्षेत्र के पत्रकारों को कोई सुविधा नहीं दिलाया जा सका है। नामी गिरामी अखबार प्रतिनिधियों की हालत सबसे खराब है। उन्हें खबर के अलावा विज्ञापन तो देना ही पड़ता था। अब नई जिम्मेदारी अखबार बढ़ाने की व एजेंसी लेने की भी दी जाने लगी है। इसके बाद भी उसे कब हटा दिया जाए। कुछ पता नहीं। काश कोई ऐसी पहल होती कि ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिनिधियों को भी न्याय मिल पाता।
जवाब देंहटाएं