अयोध्या का सीता के साथ अन्याय
कुलदेवी माँ देवली की उपेक्षा
और अयोध्यावासियों को सीता का शाप
राजेन्द्र नाथ तिवारी,272001
"जनकनंदिनी जब तक रही अयोध्या में, तब तक उन्हें न न्याय मिला, न सम्मान और जब गई, तो अपने साथ ले गईं अयोध्या की समृद्धि का आशीर्वाद।"
सीता : केवल वनवासिनी नहीं, बल्कि शापिता भी! रामायण की कथा में श्रीराम का वनवास तो सर्वविदित है, किन्तु जो कथा प्रायः उपेक्षित रह जाती है, वह है : माता सीता के साथ अयोध्या का बार-बार का अन्याय। जनकदुलारी, जो राजा जनक की अपार वात्सल्यमयी पुत्री थीं, जो धरतीपुत्री थीं, जिनके त्याग और तपस्या की तुलना किसी भी युग में नहीं हो सकती उन्हें अयोध्या ने कभी वह सम्मान नहीं दिया जिसकी वे सर्वथा अधिकारिणी थीं।
सीता माँ का जीवन यदि ध्यान से देखा जाए, तो वह संघर्ष, त्याग और अपमान की एक ऐसी गाथा है, जिसमें अयोध्यानगरी और उसके वासी बारम्बार न्याय की कसौटी पर विफल सिद्ध होते हैं। यह लेख उसी अन्याय की परतें उघाड़ने का, कुलदेवी माँ छोटी देव काली की उपेक्षा के रहस्य को उजागर करने का और सीता माँ द्वारा दिए गए शाप की ऐतिहासिक व धार्मिक पृष्ठभूमि को समझने का एक विनम्र प्रयास है।
सीता के साथ अयोध्या के अन्याय की श्रृंखला::अयोध्या ने सीता माँ के साथ अन्याय केवल एक बार नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर किया। इस अन्याय की श्रृंखला को निम्न प्रकार समझा जा सकता है _प्रथम अन्याय : वनवास की सहभागिता : जब श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास हुआ, तब सीता माँ ने स्वेच्छा से पति का साथ देने का निर्णय किया। यह उनकी महानता थी, उनका कर्तव्यबोध था। किन्तु अयोध्या की राजसभा ने एक पत्नी की इस पवित्र निष्ठा को कभी समुचित सम्मान नहीं दिया। वनवास में रहते हुए जब रावण ने उनका अपहरण किया, उसके लिए दोषी कौन था ? क्या अयोध्या ने कभी यह प्रश्न किया?
द्वितीय अन्याय ::अग्निपरीक्षा : लंका विजय के पश्चात् श्रीराम ने सीता माँ से अग्निपरीक्षा माँगी। यह वही सीता थीं जो चौदह वर्षों तक वनवास में, छह मास रावण की कैद में, अपनी पवित्रता और मर्यादा की रक्षा करती रहीं। फिर भी अयोध्या की लोकमर्यादा और जनापवाद ने उन्हें परीक्षा की अग्नि में उतरवाया। यह अयोध्या का सीता के प्रति सबसे बड़ा अपमान था।
तृतीय अन्याय :: द्वितीय निर्वासन : अग्निपरीक्षा के बाद भी जब किसी धोबी के वचनों ने राजा राम के कानों तक पहुँचकर पुनः प्रश्न उठाए, तब गर्भवती सीता माँ को महल से निष्कासित कर वन में छोड़ दिया गया। यह निर्वासन केवल सीता का नहीं, अयोध्या की अंतरात्मा का भी निर्वासन था। एक गर्भवती स्त्री, जो महारानी थी उसे बिना किसी सुनवाई के वन में भटकने के लिए छोड़ देना , यह कौन सा न्याय था?
कुलदेवी माँ छोटी देव काली सर्व मंगला एक उपेक्षित शक्तिपीठ,सीता माँ के साथ हुए अन्याय को समझने के लिए एक और सूत्र की ओर ध्यान जाना आवश्यक है और वह है माँ देवकाली सर्व मंगला की उपेक्षा।
माँ देवकाली मिथिला राजवंश की कुलदेवी मानी जाती हैं। राजा जनक के वंश की आराध्य शक्ति, जिनकी कृपा से मिथिला सदा समृद्ध और शक्तिशाली रही। माँ का मंदिर आज भी जनकपुर (नेपाल/मिथिला क्षेत्र) के परिक्षेत्र में विद्यमान है और वहाँ के लोग उन्हें अपनी रक्षक शक्ति मानते हैं।जब सीता माँ का विवाह श्रीराम के साथ हुआ और वे अयोध्या आईं, तो मिथिला की कुलपरंपरा के अनुसार उन्हें अपनी कुलदेवी माँ की पूजा-अर्चना का अधिकार था। किन्तु अयोध्या में उनकी कुलदेवी की स्थापना नहीं की गई, उनकी उपासना को वह स्थान नहीं मिला जो एक गृहलक्ष्मी की कुलदेवी को मिलना चाहिए था।
यह उपेक्षा केवल एक परंपरा की उपेक्षा नहीं थी , यह सीता की अस्मिता की, उनकी जड़ों की, उनके मायके की उपेक्षा थी। एक स्त्री को उसके घर से काट देना, उसकी कुलदेवी को अमान्य करना ,यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर एक गहरा अन्याय था।"जिस घर में कुलदेवी की उपेक्षा हो, उस घर में लक्ष्मी कब तक टिकेंगी?"लोकमान्यता में यह विश्वास गहरा है कि कुलदेवी की उपेक्षा से वंश में विघ्न आते हैं, सुख-समृद्धि क्षीण होती है। अयोध्या ने सीता की कुलदेवी माँ छोटी देवकाली को स्थान न देकर अपने ही भविष्य को संकट में डाल लिया।
सीता माँ का शाप :: किंवदंती, लोकश्रुति और उसका सत्यअब उस प्रसंग पर आते हैं जो शायद सबसे अधिक चर्चित और रहस्यमय है , सीता माँ का अयोध्यावासियों को दिया गया शाप।लोकश्रुतियों और क्षेत्रीय परंपराओं में यह वर्णन मिलता है कि जब सीता माँ को गर्भावस्था में निर्वासित किया गया, जब वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम की ओर जा रही थीं , अकेली, असहाय, अपमानित , तब उनके हृदय से एक वेदना निकली, एक पुकार निकली जो शाप का रूप ले गई।कहा जाता है कि सीता माँ ने कहा ,
"हे अयोध्या! तूने मुझे बार-बार अग्नि में डाला, तूने मेरे गर्भ की भी चिंता न की। आज मैं तुझे शाप देती हूँ , तू कभी उतनी समृद्ध न हो सके जितनी हो सकती थी। जब तक मेरा अपमान इस धरती पर स्मरण किया जाएगा, तब तक तू पूर्ण वैभव को नहीं पा सकेगी।"
यह शाप केवल क्रोध में नहीं था यह एक व्यथित माँ की, एक अपमानित पत्नी की, एक उपेक्षित बहू की आत्मा की पुकार थी। वाल्मीकि रामायण में शाप का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, किन्तु उत्तर भारत की लोकपरंपरा में, विशेषकर अवध क्षेत्र में, यह आख्यान गहराई से रचा-बसा है।
एक और लोककथा के अनुसार , जब सीता माँ धरती में समाईं, उस क्षण उन्होंने यह भी कहा था कि अयोध्या की धरती पर जो भी राजसत्ता बैठेगी, वह कभी स्थायी सुख नहीं पाएगी, क्योंकि इस नगरी ने अपनी ही बहू-बेटी को कभी न्याय नहीं दिया।
अयोध्या की वर्तमान स्थिति , क्या शाप का प्रभाव दिखता है?यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या सीता माँ के शाप का कोई प्रभाव वास्तव में अयोध्या पर पड़ा? यह एक आस्था का विषय है, विज्ञान का नहीं। फिर भी कुछ तथ्यों पर विचार करना उचित होगा, अयोध्या ! जो कभी रघुवंश की राजधानी थी, जो विश्व के सर्वाधिक समृद्ध और सांस्कृतिक नगरों में गिनी जाती थी , वह सदियों तक उपेक्षा, आक्रमण और विस्मृति का शिकार रही। विदेशी आक्रांताओं ने उसे बार-बार रौंदा, उसके मंदिर तोड़े गए, उसकी पहचान मिटाने का प्रयास हुआ।
आज जब अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण हुआ है और नगर पुनः अपनी पहचान पा रहा है, तो यह भी विचारणीय है , क्या इस पुनर्जागरण में सीता माँ को उचित स्थान मिल रहा है? क्या माँ छोटी देवकाकी पूजा का स्मरण होता है? क्या सीता की वेदना को राम के वैभव के साथ-साथ याद किया जाता है?
यदि अयोध्या का सच्चा पुनरुद्धार होना है ,तो वह केवल राम के मंदिर से नहीं होगा। उसके लिए सीता माँ को भी उचित सम्मान देना होगा, उनकी कुलदेवी माँ छोटी देवकाली की पूजा को पुनः स्थापित करना होगा, और उस ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करना होगा जो इस नगरी ने उस पवित्रात्मा के साथ किया।
धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से विश्लेषण::सीता माँ के साथ हुआ अन्याय केवल एक पौराणिक घटना नहीं है , यह एक सामाजिक संदेश भी है जो हर युग में प्रासंगिक है।स्त्री का अपमान, कुलदेवी की उपेक्षा, और लोकापवाद के डर से न्याय की बलि , ये तीनों तत्व मिलकर एक ऐसी सांस्कृतिक विकृति को जन्म देते हैं जो समाज को अंदर से खोखला कर देती है। सीता माँ की कथा इस विकृति का दर्पण है।
सनातनी/हिन्दू परंपरा में कुलदेवी का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कुलदेवी वह शक्ति है जो परिवार की रक्षा करती है, जो वंश को आशीर्वाद देती है। जब किसी पुत्रवधू की कुलदेवी को सम्मान नहीं मिलता, तो यह केवल एक धार्मिक भूल नहीं है, यह उस स्त्री की संस्कृति, उसकी पहचान और उसके आत्मसम्मान का अपमान है। माँ देवली की उपेक्षा इसी का प्रतीक है। मिथिला की राजकुमारी जब अयोध्या आई, तो उन्हें अपनी जड़ों से काट दिया गया। यह वही त्रासदी है जो आज भी लाखों विवाहित स्त्रियों के जीवन में दोहराई जाती है।
सीता माँ शाप देने वाली नहीं, न्याय माँगने वाली माँ,यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट करना आवश्यक है। सीता माँ का स्वभाव क्षमाशील था, वे करुणामयी थीं। जब धरती में समाने से पहले उन्होंने श्रीराम से विदाई ली, तब भी उनके मुख से कोई अभिशाप नहीं था , था तो केवल एक अनुरोध, एक प्रश्न, एक पीड़ा।
लोकश्रुति में जो 'शाप' का उल्लेख है, वह वास्तव में एक व्यथित आत्मा की वेदना है जो एक प्रकार का आध्यात्मिक सत्य बन गई। जब कोई निर्दोष व्यक्ति अत्यंत व्यथित होकर कुछ कहता है , तो वह शब्द शाप नहीं, एक नियति का उद्घोष बन जाता है।
सीता माँ ने 'शाप' नहीं दिया ,उन्होंने केवल उस सत्य को कहा जो अपरिहार्य था। जब न्याय नहीं मिलता, जब सत्य का सम्मान नहीं होता , तब प्रकृति स्वयं न्याय करती है। और उसी प्राकृतिक न्याय को लोकभाषा में 'सीता का शाप' कहा गया।
"सीता माँ शाप देने वाली नहीं थीं — वे न्याय माँगने वाली माँ थीं। और जब माँ रोती है, तो आकाश भी व्यथित होता है।"
सीता का सम्मान ही अयोध्या का उद्धार::आज जब अयोध्या पुनः विश्वपटल पर अपनी पहचान स्थापित कर रही है, जब राममंदिर का निर्माण हो चुका है और करोड़ों श्रद्धालु वहाँ दर्शन को पहुँच रहे हैं ,तब यह प्रश्न और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम सीता माँ को वह सम्मान दे रहे हैं जो उन्हें देना चाहिए था?
राम और सीता अविभाज्य हैं — सियाराम। यदि राम का वैभव मनाया जाए और सीता की पीड़ा को भुला दिया जाए, तो यह आधी भक्ति है, आधा सत्य है।माँ देव काली सर्व मंगला की उपेक्षा का प्रायश्चित तभी होगा जब मिथिला की इस कुलदेवी को भी उचित सम्मान मिले, जब सीता माँ के नाम पर कोई भव्य तीर्थ स्थल स्थापित हो , न केवल जनकपुर में, बल्कि अयोध्या में भी।
तभी सीता माँ की आत्मा को शांति मिलेगी। तभी अयोध्या का वह शाप टूटेगा जो उसने अपने ऊपर स्वयं आमंत्रित किया था। तभी सरयू की लहरें उस वेदना को बहा ले जाएंगी जो सदियों से उसके तट पर गूँज रही है।
"जय सिया राम , सिया पहले, राम बाद में। यही है मिथिला का संस्कार, यही है सनातन का सत्य।"
सीतायण से कमश:,,,,!

सितायण नामक पुस्तक का लेखन कार्य अति विशिष्ट एवं सारगर्भित व सामाजिक कुरीतियां व उत्कृष्ट समाज कैसे सोंच के निम्न सोनें पर अनावश्यक बातों को पैदा कर अनायास ही समाजिक दुर्व्यवस्था पैदा कर देता है,,ऐसे उत्कृष्ट लेख को आप लिख कर लेखांकित दर्शन और इतिहास को आप ने समाज के सामने लिख कर प्रस्तुत करने का कार्य करना एक भागीरथ प्रयास में आपको बहुत-बहुत धन्यवाद व शुभकामनाएं आपका लेख संपूर्ण हो।।
जवाब देंहटाएंभवदीय
आचार्य सूर्य प्रकाश शुक्ल।।