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सोमवार, 29 जून 2026

"तीन दशकों की तपस्वी पत्रकारिता: अभाव को स्वभाव बनाकर सत्य की दस्तक देने वाले अशोक श्रीवास्तव"

 कलम का वह स्तम्भ, जिसे समय भी झुका न सका!

अशोक श्रीवास्तव, प्रबंध निदेशक एवं संपादक,


'मीडिया दस्तक'

बस्ती, 272001,कौटिल्य टीम 

पत्रकारिता केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि सत्य के प्रति आजीवन व्रत है। यह व्रत हर किसी के बस की बात नहीं। इसे वही निभा सकता है जो अभावों को अपना शिक्षक, संघर्ष को अपनी शक्ति और राष्ट्रहित को अपनी अंतिम प्रतिबद्धता मानता हो। अशोक श्रीवास्तव ने तीन दशकों से अधिक की अपनी पत्रकारिता यात्रा में यही सिद्ध किया है।उन्होंने पत्रकारिता को केवल ओढ़ा नहीं, बिछाया नहीं, बल्कि जिया है। उनके लिए कलम रोज़गार का साधन नहीं, बल्कि जनचेतना का शंखनाद रही है। जब संसाधनों की कमी थी, तब उन्होंने अभाव को कमजोरी नहीं बनने दिया; उसे अपने व्यक्तित्व का स्वभाव बना लिया। विपरीत परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय उन्होंने उन्हें अपनी तपस्या का माध्यम बनाया।'मीडिया दस्तक' केवल एक समाचार मंच नहीं, बल्कि विचार, साहस और राष्ट्रहित की दस्तक है। इसकी स्थापना उस समय हुई जब बाज़ारवाद पत्रकारिता के मूल्यों को चुनौती दे रहा था। ऐसे दौर में अशोक श्रीवास्तव ने यह विश्वास जीवित रखा कि पत्रकार का पहला दायित्व सत्ता या बाज़ार नहीं, बल्कि समाज और सत्य के प्रति होता है।

तीन दशकों से  उपर की यह यात्रा अनगिनत चुनौतियों, दबावों और प्रलोभनों से होकर गुज़री होगी, किंतु उनकी कलम ने अपनी दिशा नहीं बदली। वह कभी सत्ता से प्रश्न पूछती दिखाई दी, कभी समाज को आईना दिखाती रही और कभी राष्ट्रहित के प्रश्नों पर निर्भीक स्वर बनकर उभरी। उनकी लेखनी ने यह संदेश दिया कि पत्रकारिता का धर्म केवल सूचना देना नहीं, बल्कि विवेक जगाना भी है।

आज जब सूचना की गति सत्य से अधिक तेज़ हो गई है और शोर ने संवाद को पीछे छोड़ दिया है, तब अशोक श्रीवास्तव जैसे पत्रकार यह विश्वास दिलाते हैं कि गंभीर, तथ्यपरक और राष्ट्रनिष्ठ पत्रकारिता आज भी जीवित है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि पत्रकार की सबसे बड़ी पूँजी उसका चरित्र और उसकी विश्वसनीयता होती है।

उनकी कलम लोकतंत्र के उस स्तम्भ की तरह है, जिसे डिगाने के अनेक प्रयास हुए होंगे, किंतु कोई भी उस स्तम्भ को हिला नहीं सका। क्योंकि वह केवल शब्दों का स्तम्भ नहीं, बल्कि सिद्धांतों, साहस और सत्यनिष्ठा की नींव पर खड़ा हुआ स्तम्भ है। ऐसे समय में जब पत्रकारिता को बार-बार अपनी विश्वसनीयता सिद्ध करनी पड़ रही है, अशोक श्रीवास्तव की यात्रा नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए एक प्रेरणा है। यह यात्रा बताती है कि यदि पत्रकार अपने मूल्यों पर अडिग रहे, तो समय स्वयं उसकी लेखनी का साक्षी बन जाता है।

तीन दशकों की यह साधना केवल एक पत्रकार की सफलता नहीं, बल्कि उस विश्वास की विजय है कि सत्य की कलम देर से ही सही, इतिहास पर अपनी अमिट छाप अवश्य छोड़ती है। यही अशोक श्रीवास्तव की सबसे बड़ी पहचान है, और यही मीडिया दस्तक की सबसे बड़ी शक्ति।

2 टिप्‍पणियां:

  1. निःसंदेह एक सशक्त पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में आदरणीय श्रीमान अशोक श्रीवास्तव जी अपने लेखनी स्वरूप कलम से पत्रकारिता जगत में बस्ती में एक अनूठी छाप छोड़ी है, इसके लिए आदरणीय श्रीमान अशोक श्रीवास्तव जी को हृदय की गहराइयों से अभिवादन सहित प्रणाम निवेदित करते हैं, साथ ही आपके विषय में स्वाकथन यह है कि,उत्कृष्ट लेख लिखने के लिए आपका साधुवाद ज्ञापित करते हुए हृदय तल से आप को अभिवादन सहित प्रणाम निवेदन करते हैं बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट सारगर्भित लेख लिखने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद व बधाई प्रेषित है।।
    भवदीय
    आचार्य सूर्य प्रकाश शुक्ल।।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत बहुत धन्यवाद हमारे व्यक्तित्व का सही अवलोकन करने के लिए। मैं दोहरा व्यक्तित्व नहीं जीता हूँ और जो हूं वह आप जानते हैं ये मेरा सौभाग्य है।

    जवाब देंहटाएं

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