देश जरा का बाण नहीं, गीता का अंतिम अध्याय था श्रीकृष्ण का महाप्रयाण
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श्रीकृष्ण के जीवन का सबसे गूढ़ रहस्य उनका जन्म नहीं, उनका महाप्रयाण है। जन्म के समय उन्होंने संसार को यह संदेश दिया कि जब-जब धर्म की हानि होगी, तब-तब ईश्वर मानवता के मार्गदर्शन हेतु अवतरित होगा। किंतु अपने प्रस्थान के समय उन्होंने उससे भी बड़ा सत्य प्रकट किया—कि जो जन्म लेता दिखाई देता है, वह वास्तव में जन्मा नहीं होता; और जो मृत्यु को प्राप्त होता दिखाई देता है, वह वास्तव में मरता नहीं।प्रभास क्षेत्र में पीपल के वृक्ष के नीचे बैठे श्रीकृष्ण को यदि केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में देखा जाए तो यह कथा एक शिकारी और एक बाण की कहानी बनकर रह जाएगी। किंतु यदि इसे अध्यात्म की दृष्टि से देखा जाए, तो यह मानव सभ्यता को दिया गया ईश्वर का अंतिम और मौन उपदेश है।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन संशय में था, इसलिए कृष्ण ने गीता सुनाई। प्रभास में कोई अर्जुन नहीं था, कोई प्रश्न नहीं था, कोई युद्ध नहीं था। वहां केवल मौन था। और कभी-कभी मौन, शब्दों से कहीं अधिक गहन उपदेश देता है। जो बात गीता के सात सौ श्लोकों में कही गई थी, उसे कृष्ण ने अपने अंतिम क्षणों में एक जीवंत उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर दिया।जरा का बाण उनके शरीर को लगा, किंतु उनकी चेतना को नहीं। क्योंकि चेतना को कोई अस्त्र भेद नहीं सकता। यही गीता का मूल संदेश है,आत्मा न शस्त्र से कटती है, न अग्नि से जलती है, न जल से भीगती है और न वायु से सूखती है। कृष्ण ने केवल यह शिक्षा नहीं दी, उन्होंने स्वयं उसे जीकर दिखाया।इस प्रसंग का सबसे अद्भुत पक्ष यह है कि जिस व्यक्ति के हाथों उनके अवतार-कार्य की पूर्णाहुति हुई, उसी के प्रति उनके हृदय में करुणा थी। न क्रोध, न प्रतिशोध, न शिकायत। सामान्य मनुष्य अपने विरोधी को क्षमा नहीं कर पाता, किंतु कृष्ण उस व्यक्ति को भी आशीर्वाद देते हैं जो उनके महाप्रयाण का निमित्त बनता है। यह केवल दया नहीं, बल्कि आत्मज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है।
उस समय तक द्वारका का वैभव समाप्त हो चुका था। यदुवंश का गौरव इतिहास बन चुका था। मित्र, संबंधी, सेना, राज्य—सब पीछे छूट चुका था। मानो कृष्ण स्वयं मानवता को यह स्मरण करा रहे हों कि संसार की सबसे बड़ी सत्ता भी अंततः समय के सामने टिक नहीं पाती। जो स्थायी है, वह न राज्य है, न धन है, न यश है; स्थायी केवल आत्मा है।
यही कारण है कि श्रीकृष्ण का महाप्रयाण मृत्यु का प्रसंग नहीं, वैराग्य का महोत्सव है। यह हमें सिखाता है कि जीवन की सफलता संग्रह में नहीं, समर्पण में है; अधिकार में नहीं, उत्तरदायित्व में है; और देह के मोह में नहीं, आत्मा के बोध में है।
कृष्ण ने अपने अंतिम क्षणों में कोई नया उपदेश नहीं दिया, क्योंकि जो कुछ कहना था वह गीता में कह चुके थे। अब समय उसे सिद्ध करने का था। इसलिए उनका मौन ही अंतिम प्रवचन बन गया। उनकी मुस्कान ही अंतिम शास्त्र बन गई। और उनका महाप्रयाण ही गीता का अंतिम अध्याय बन गया।
यदि इस घटना का सार एक वाक्य में कहा जाए, तो वह यह है—
"कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने मनुष्य को मृत्यु का रहस्य समझाया था; प्रभास में उन्होंने स्वयं मृत्यु के भ्रम को तोड़ दिया।"
और शायद यही उनका अंतिम आध्यात्मिक संदेश था—जो स्वयं को शरीर मानता है, वह मृत्यु से भयभीत रहता है; जो स्वयं को आत्मा जान लेता है, उसके लिए मृत्यु भी परमात्मा से मिलन का उत्सव बन जाती है।"
॥ जय श्रीकृष्ण ॥ :::
कुरुक्षेत्र में अर्जुन संशय में था, इसलिए कृष्ण ने गीता सुनाई। प्रभास में कोई अर्जुन नहीं था, कोई प्रश्न नहीं था, कोई युद्ध नहीं था। वहां केवल मौन था। और कभी-कभी मौन, शब्दों से कहीं अधिक गहन उपदेश देता है। जो बात गीता के सात सौ श्लोकों में कही गई थी, उसे कृष्ण ने अपने अंतिम क्षणों में एक जीवंत उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर दिया।जरा का बाण उनके शरीर को लगा, किंतु उनकी चेतना को नहीं। क्योंकि चेतना को कोई अस्त्र भेद नहीं सकता। यही गीता का मूल संदेश है,आत्मा न शस्त्र से कटती है, न अग्नि से जलती है, न जल से भीगती है और न वायु से सूखती है। कृष्ण ने केवल यह शिक्षा नहीं दी, उन्होंने स्वयं उसे जीकर दिखाया।इस प्रसंग का सबसे अद्भुत पक्ष यह है कि जिस व्यक्ति के हाथों उनके अवतार-कार्य की पूर्णाहुति हुई, उसी के प्रति उनके हृदय में करुणा थी। न क्रोध, न प्रतिशोध, न शिकायत। सामान्य मनुष्य अपने विरोधी को क्षमा नहीं कर पाता, किंतु कृष्ण उस व्यक्ति को भी आशीर्वाद देते हैं जो उनके महाप्रयाण का निमित्त बनता है। यह केवल दया नहीं, बल्कि आत्मज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है।
उस समय तक द्वारका का वैभव समाप्त हो चुका था। यदुवंश का गौरव इतिहास बन चुका था। मित्र, संबंधी, सेना, राज्य—सब पीछे छूट चुका था। मानो कृष्ण स्वयं मानवता को यह स्मरण करा रहे हों कि संसार की सबसे बड़ी सत्ता भी अंततः समय के सामने टिक नहीं पाती। जो स्थायी है, वह न राज्य है, न धन है, न यश है; स्थायी केवल आत्मा है।
यही कारण है कि श्रीकृष्ण का महाप्रयाण मृत्यु का प्रसंग नहीं, वैराग्य का महोत्सव है। यह हमें सिखाता है कि जीवन की सफलता संग्रह में नहीं, समर्पण में है; अधिकार में नहीं, उत्तरदायित्व में है; और देह के मोह में नहीं, आत्मा के बोध में है।
कृष्ण ने अपने अंतिम क्षणों में कोई नया उपदेश नहीं दिया, क्योंकि जो कुछ कहना था वह गीता में कह चुके थे। अब समय उसे सिद्ध करने का था। इसलिए उनका मौन ही अंतिम प्रवचन बन गया। उनकी मुस्कान ही अंतिम शास्त्र बन गई। और उनका महाप्रयाण ही गीता का अंतिम अध्याय बन गया।
यदि इस घटना का सार एक वाक्य में कहा जाए, तो वह यह है—
"कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने मनुष्य को मृत्यु का रहस्य समझाया था; प्रभास में उन्होंने स्वयं मृत्यु के भ्रम को तोड़ दिया।"
और शायद यही उनका अंतिम आध्यात्मिक संदेश था—जो स्वयं को शरीर मानता है, वह मृत्यु से भयभीत रहता है; जो स्वयं को आत्मा जान लेता है, उसके लिए मृत्यु भी परमात्मा से मिलन का उत्सव बन जाती है।"
॥ जय श्रीकृष्ण ॥ :::
सादर प्रणाम 🙏🙏🙏
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