वन्दे मातरम् : राष्ट्रचेतना, विवाद, विमर्श और संवैधानिक यात्रा
6
इतिहास में कुछ रचनाएँ ऐसी होती हैं जो अपने रचनाकार से बड़ी हो जाती हैं। वे साहित्य की सीमाओं को लाँघकर सभ्यता की स्मृति बन जाती हैं। भारत में यदि किसी गीत ने यह स्थान प्राप्त किया है तो वह "वन्दे मातरम्" है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक युग की चेतना, एक सभ्यता का आत्मबोध और एक पराधीन राष्ट्र की मुक्ति-आकांक्षा का स्वर है। भारत की स्वतंत्रता के इतिहास को यदि उसके नारों में संक्षिप्त करना हो तो "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है", "जय हिन्द", "इंकलाब जिंदाबाद" और "वन्दे मातरम्" उसकी प्रमुख अभिव्यक्तियाँ होंगी। किंतु इनमें भी "वन्दे मातरम्" का स्थान विशिष्ट है, क्योंकि यह केवल राजनीतिक उद्घोष नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दर्शन भी प्रस्तुत करता है।
विडम्बना यह है कि जिस गीत ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध करोड़ों भारतीयों को एक सूत्र में बाँधा, वही गीत स्वतंत्र भारत में विवादों और बहसों का विषय बन गया। प्रश्न उठे—क्या यह राष्ट्रगीत है? क्या इसका गायन अनिवार्य होना चाहिए? क्या इसकी कुछ पंक्तियाँ धार्मिक दृष्टि से विवादास्पद हैं? क्या राष्ट्रभक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच कोई टकराव है?इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए हमें वन्दे मातरम् की यात्रा को केवल एक गीत की यात्रा नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, सांस्कृतिक अस्मिता और संवैधानिक विकास की यात्रा के रूप में देखना होगा। वन्दे मातरम् का जन्म : दासता के अंधकार में राष्ट्रीय चेतना का उदय#उन्नीसवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक रूप से पराधीन और मानसिक रूप से आहत था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के बाद अंग्रेजों ने भारतीय समाज को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि भारत कभी एक राष्ट्र था ही नहीं।भारतीय इतिहास को पिछड़ा, भारतीय संस्कृति को अंधविश्वासी और भारतीय समाज को विभाजित सिद्ध करने की योजनाबद्ध प्रक्रिया चल रही थी। मैकाले की शिक्षा नीति इसी मानसिक दासता का उपकरण थी।
ऐसे समय में बंगाल से एक स्वर उठता है—बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का। बंकिमचन्द्र केवल साहित्यकार नहीं थे; वे भारतीय आत्मा के पुनर्जागरण के पुरोधा थे। उन्होंने अनुभव किया कि भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता से पहले सांस्कृतिक आत्मविश्वास की आवश्यकता है। इसी चिंतन से "वन्दे मातरम्" का जन्म हुआ।यह गीत बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनन्दमठ में प्रकाशित हुआ। लेकिन उसकी शक्ति उपन्यास की कथा से कहीं अधिक व्यापक थी।
गीत की प्रथम पंक्तियाँ देखें—
सुजलां सुफलां मलमलयजशीतलाम
शस्यश्यामलां मातरम्।
यह केवल प्रकृति का वर्णन नहीं है। यह भारत की आत्मा का चित्र है—समृद्ध, शीतल, जीवनदायिनी और मातृवत् करुणामयी।भारत माता की अवधारणा : राष्ट्र का सांस्कृतिक स्वरूप वन्दे मातरम् को समझने के लिए "भारत माता" की अवधारणा को समझना आवश्यक है।पश्चिमी राजनीतिक विचार में राष्ट्र प्रायः भूगोल, नस्ल, भाषा या राज्यसत्ता पर आधारित होता है। भारत में राष्ट्र की अवधारणा भिन्न रही है।भारत में भूमि केवल भूमि नहीं है।यह तीर्थ है।यह मातृभूमि है।
यह पुण्यभूमि है।ऋग्वेद, अथर्ववेद और पुराणों में पृथ्वी को माता कहा गया है।माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। इसलिए जब बंकिमचन्द्र भारत को माता कहते हैं तो वह कोई नई अवधारणा नहीं गढ़ रहे होते, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी भारतीय चेतना को आधुनिक भाषा दे रहे होते हैं।
वन्दे मातरम् और स्वतंत्रता संग्राम#यदि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का कोई आध्यात्मिक गीत था तो वह वन्दे मातरम् था।
1905 में बंगाल विभाजन हुआ। लॉर्ड कर्जन का उद्देश्य प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि हिन्दू-मुस्लिम विभाजन था।किन्तु परिणाम उल्टा हुआ।संपूर्ण भारत में प्रतिरोध की लहर उठी।यहीं से वन्दे मातरम् जन-जन का मंत्र बन गया।विद्यालयों में विद्यार्थी इसे गाते थे।क्रांतिकारी इसे उद्घोष बनाते थे।सभाएँ इसी से आरम्भ होती थीं।जुलूस इसी से गूँजते थे।
अनेक युवकों को केवल "वन्दे मातरम्" कहने के अपराध में जेल भेजा गया।ब्रिटिश प्रशासन ने इस नारे से भय खाना शुरू कर दिया।क्यों?क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि जब कोई राष्ट्र अपनी भूमि को माता मानने लगे तो उसे अधिक समय तक गुलाम नहीं रखा जा सकता।
. अरविन्द, तिलक और क्रांतिकारी दृष्टि#अरविन्द घोष ने लिखा था कि वन्दे मातरम् केवल शब्द नहीं बल्कि राष्ट्रशक्ति का मंत्र है।उनके लिए भारत माता कोई कल्पना नहीं बल्कि जीवित राष्ट्रीय सत्ता थी।
बाल गंगाधर तिलक ने भी इस गीत को राष्ट्रीय पुनर्जागरण का आधार माना।क्रांतिकारी संगठनों में यह गीत लगभग प्रार्थना के समान स्थान रखता था।जब युवा फाँसी पर चढ़ते थे तो उनके होंठों पर अंतिम शब्द अक्सर होते थे—"वन्दे मातरम्।"इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वन्दे मातरम् के बिना अधूरा है।
. विवाद की शुरुआत : राष्ट्रीयता और धार्मिक पहचान का टकराव#इतिहास का सबसे जटिल प्रश्न यह है कि जो गीत लाखों लोगों को जोड़ रहा था, वही कुछ लोगों के लिए असहज क्यों बन गया?विवाद का मूल कारण गीत के बाद के अंतरे हैं, जिनमें भारतमाता को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किया गया है।कुछ मुस्लिम नेताओं का मत था कि इस प्रकार की स्तुति इस्लामी एकेश्वरवाद के अनुकूल नहीं है।उनका तर्क था कि किसी देवीरूप की वंदना धार्मिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकती।
दूसरी ओर राष्ट्रवादी चिंतकों का मत था कि यहाँ देवी कोई धार्मिक मूर्ति नहीं बल्कि राष्ट्र की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।
यहीं से भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण विमर्शों में से एक प्रारंभ हुआ—क्या सांस्कृतिक प्रतीक को धार्मिक प्रतीक मान लिया जाना चाहिए?
कांग्रेस की दुविधा और समझौता#1930 के दशक तक यह विवाद राजनीतिक रूप लेने लगा था।कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती थी—राष्ट्रीय प्रतीक भी बचा रहे और स्वतंत्रता आंदोलन की एकता भी।1937 में निर्णय हुआ कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरे गाए जाएँ।कारण स्पष्ट था। पहले दो अंतरों में मातृभूमि की प्राकृतिक और सांस्कृतिक महिमा का वर्णन है, जबकि विवादास्पद माने जाने वाले देवीरूप वाले अंश बाद में आते हैं।यह निर्णय भारतीय राजनीति में सहमति और समन्वय की परंपरा का उदाहरण था।
संविधान सभा और ऐतिहासिक निर्णय#1947 में स्वतंत्रता के बाद प्रश्न उठा—राष्ट्रगान कौन होगा?वन्दे मातरम् या जन गण मन? यह केवल गीत चुनने का प्रश्न नहीं था।यह स्वतंत्र भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति चुनने का प्रश्न था।लंबी चर्चा के बाद 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने घोषणा की—"जन गण मन" राष्ट्रगान होगा।किन्तु "वन्दे मातरम्" को समान आदर और सम्मान प्राप्त रहेगा। यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण था।क्योंकि इससे भारत ने किसी एक पक्ष की पूर्ण विजय या पराजय का मार्ग नहीं चुना।उसने समन्वय का मार्ग चुना।
संवैधानिक दृष्टि : राष्ट्रगीत की वास्तविक स्थिति#एक महत्वपूर्ण तथ्य अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।भारतीय संविधान में "राष्ट्रगीत" शब्द कहीं नहीं लिखा है।यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान ने राष्ट्रगान का भी विस्तृत वर्णन नहीं किया।वन्दे मातरम् की प्रतिष्ठा संविधान सभा की ऐतिहासिक घोषणा से निर्मित हुई है।इसलिए उसका सम्मान संवैधानिक परंपरा से आता है, किसी दंडात्मक प्रावधान से नहीं।
न्यायपालिका और वन्दे मातरम्#भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर स्पष्ट किया है कि राष्ट्र के प्रति सम्मान आवश्यक है, परंतु किसी नागरिक को उसकी अंतरात्मा के विरुद्ध बाध्य नहीं किया जा सकता।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19, 21 और 25 व्यक्ति को अभिव्यक्ति, गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं।अतः राष्ट्रीय सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता—दोनों का संतुलन भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है।
आधुनिक राजनीति में वन्दे मातरम्#आज वन्दे मातरम् केवल ऐतिहासिक गीत नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का विषय भी है।कुछ लोग इसे राष्ट्रभक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मानते हैं।कुछ इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक मानते हैं।कुछ इसे धार्मिक विवाद से जोड़ते हैं।और कुछ इसे संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के संदर्भ में देखते हैं।वास्तव में विवाद अक्सर गीत से कम और राजनीति से अधिक जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
. वास्तविक प्रश्न : वन्दे मातरम् का विरोध या उसकी व्याख्या?आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि वन्दे मातरम् को राजनीतिक हथियार बनाया जाए।आवश्यकता यह समझने की है कि इस गीत का मूल उद्देश्य क्या था।बंकिमचन्द्र किसी धर्म विशेष का घोष नहीं कर रहे थे।वे पराधीन भारत को उसकी आत्मा का स्मरण करा रहे थे।उनकी दृष्टि में राष्ट्र केवल राज्य नहीं था।राष्ट्र माता था।और उस माता के प्रति कृतज्ञता का भाव ही "वन्दे मातरम्" था।
वन्दे मातरम् का भविष्य#वन्दे मातरम् का इतिहास केवल अतीत का इतिहास नहीं है।यह आज भी भारत से प्रश्न पूछता है,क्या राष्ट्र केवल संविधान से बनता है या संस्कृति से भी?क्या विविधता और राष्ट्रीय एकता साथ-साथ चल सकती हैं?क्या राष्ट्रीय सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में संतुलन संभव है?भारत का उत्तर है—हाँ।इसीलिए वन्दे मातरम् भारत की राष्ट्रीय स्मृति में जीवित है।यह गीत स्वतंत्रता संग्राम की रणभेरी भी है, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दर्शन भी है, और भारतीय लोकतंत्र की सहिष्णुता की परीक्षा भी।वन्दे मातरम् का अर्थ केवल "माता, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ" नहीं है; इसका गहन अर्थ है—"हे भारत! मैं तुम्हारे प्रति अपना कर्तव्य, समर्पण और श्रद्धा अर्पित करता हूँ।" और जब तक भारत अपनी सभ्यतागत चेतना को स्मरण करता रहेगा, तब तक वन्दे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का अमर स्वर बना रहेगा।
वन्दे मातरम्।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें