क्षेत्रीय पार्टियों के अस्तित्व को चुनौती कॉकरोच पार्टी
फिर जागी कॉकरोच पार्टी: जब जनता ने राजनीति का आईना राजनीति को ही दिखा दिया
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन राजनीतिक दलों का जन्म जनता की सेवा के लिए हुआ था, उनमें से अनेक आज जनता पर शासन करने वाली संस्थाओं में बदलते दिखाई देते हैं। चुनाव आते हैं तो जनता "जनार्दन" बन जाती है, चुनाव बीतते ही वही जनता फाइलों, दफ्तरों और आश्वासनों के जंगल में भटकती रह जाती है। ऐसे माहौल में यदि "कॉकरोच पार्टी" जैसे प्रतीक उभरते हैं, तो उन्हें केवल मज़ाक समझना भूल होगी। वे व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास और आक्रोश की अभिव्यक्ति हैं।कॉकरोच को कुचलने की कोशिश बार-बार होती है, लेकिन वह फिर दिखाई देता है। शायद इसी कारण यह प्रतीक उस आम नागरिक की मनःस्थिति को व्यक्त करता है जिसे दशकों से वादों, घोषणाओं और नारों के बीच जीवित रहने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन आम आदमी की अनेक समस्याएँ वहीं की वहीं खड़ी रहती हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन राजनीतिक दलों का जन्म जनता की सेवा के लिए हुआ था, उनमें से अनेक आज जनता पर शासन करने वाली संस्थाओं में बदलते दिखाई देते हैं। चुनाव आते हैं तो जनता "जनार्दन" बन जाती है, चुनाव बीतते ही वही जनता फाइलों, दफ्तरों और आश्वासनों के जंगल में भटकती रह जाती है। ऐसे माहौल में यदि "कॉकरोच पार्टी" जैसे प्रतीक उभरते हैं, तो उन्हें केवल मज़ाक समझना भूल होगी। वे व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास और आक्रोश की अभिव्यक्ति हैं।कॉकरोच को कुचलने की कोशिश बार-बार होती है, लेकिन वह फिर दिखाई देता है। शायद इसी कारण यह प्रतीक उस आम नागरिक की मनःस्थिति को व्यक्त करता है जिसे दशकों से वादों, घोषणाओं और नारों के बीच जीवित रहने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन आम आदमी की अनेक समस्याएँ वहीं की वहीं खड़ी रहती हैं।
आज राजनीति का बड़ा हिस्सा जनसेवा से अधिक जन-प्रबंधन का विज्ञान बन गया है। विचारधाराएँ चुनावी गणित के आगे झुक रही हैं। दल बदलना सिद्धांत नहीं, अवसर का प्रश्न बन गया है। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों का ढोल पीटता है और विपक्ष अपनी असफलताओं का दोष सरकार पर डालता है। दोनों के बीच पिसता है वह नागरिक, जिसकी चिंता चुनावी भाषणों में तो दिखाई देती है, लेकिन नीतियों के क्रियान्वयन में अक्सर गायब हो जाती है।
"कॉकरोच पार्टी" का व्यंग्य इसी राजनीतिक संस्कृति पर प्रहार करता है। यह पूछता है कि जब जनता की समस्याएँ वर्षों तक जस की तस बनी रहती हैं, तो लोकतंत्र की सफलता का वास्तविक पैमाना क्या है? क्या केवल चुनाव जीत लेना पर्याप्त है, या जनता के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाना भी उतना ही आवश्यक है? और सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर जनता को व्यवस्था पर भरोसा दिलाने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि नागरिकों का एक वर्ग पारंपरिक राजनीति से निराश होकर व्यंग्यात्मक प्रतीकों में अपनी आशा खोजने लगे, तो यह केवल उसकी निराशा नहीं, बल्कि राजनीति की विफलता का भी संकेत है।
लोकतंत्र में आलोचना कोई अपराध नहीं, बल्कि प्राणवायु है। लेकिन जब आलोचना व्यंग्य से आगे बढ़कर उपहास में बदलने लगे, तो सत्ता और विपक्ष दोनों को आत्ममंथन करना चाहिए। क्योंकि जनता का विश्वास खो देना किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी पराजय होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति फिर से जनता के बीच लौटे। घोषणाओं से अधिक परिणामों पर ध्यान दे। प्रचार से अधिक पारदर्शिता पर बल दे। और सत्ता को अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व माने।
अन्यथा "कॉकरोच पार्टी" जैसे प्रतीक केवल सोशल मीडिया की सनसनी नहीं रहेंगे; वे उस जनभावना के प्रतिनिधि बन सकते हैं जो यह कह रही है कि यदि व्यवस्था हमारी नहीं सुनती, तो हम अपनी भाषा स्वयं गढ़ेंगे, अपने प्रतीक स्वयं चुनेंगे और अपना असंतोष स्वयं व्यक्त करेंगे।
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति विरोध का होना नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति विश्वास का समाप्त हो जाना है। और जब जनता विश्वास खोने लगती है, तब इतिहास बताता है कि परिवर्तन की आहट दूर नहीं होती।
"कॉकरोच पार्टी" का व्यंग्य इसी राजनीतिक संस्कृति पर प्रहार करता है। यह पूछता है कि जब जनता की समस्याएँ वर्षों तक जस की तस बनी रहती हैं, तो लोकतंत्र की सफलता का वास्तविक पैमाना क्या है? क्या केवल चुनाव जीत लेना पर्याप्त है, या जनता के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाना भी उतना ही आवश्यक है? और सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर जनता को व्यवस्था पर भरोसा दिलाने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि नागरिकों का एक वर्ग पारंपरिक राजनीति से निराश होकर व्यंग्यात्मक प्रतीकों में अपनी आशा खोजने लगे, तो यह केवल उसकी निराशा नहीं, बल्कि राजनीति की विफलता का भी संकेत है।
लोकतंत्र में आलोचना कोई अपराध नहीं, बल्कि प्राणवायु है। लेकिन जब आलोचना व्यंग्य से आगे बढ़कर उपहास में बदलने लगे, तो सत्ता और विपक्ष दोनों को आत्ममंथन करना चाहिए। क्योंकि जनता का विश्वास खो देना किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी पराजय होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति फिर से जनता के बीच लौटे। घोषणाओं से अधिक परिणामों पर ध्यान दे। प्रचार से अधिक पारदर्शिता पर बल दे। और सत्ता को अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व माने।
अन्यथा "कॉकरोच पार्टी" जैसे प्रतीक केवल सोशल मीडिया की सनसनी नहीं रहेंगे; वे उस जनभावना के प्रतिनिधि बन सकते हैं जो यह कह रही है कि यदि व्यवस्था हमारी नहीं सुनती, तो हम अपनी भाषा स्वयं गढ़ेंगे, अपने प्रतीक स्वयं चुनेंगे और अपना असंतोष स्वयं व्यक्त करेंगे।
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति विरोध का होना नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति विश्वास का समाप्त हो जाना है। और जब जनता विश्वास खोने लगती है, तब इतिहास बताता है कि परिवर्तन की आहट दूर नहीं होती।
राजेन्द्र नाथ तिवारी, 272001
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