विद्वत्ता का दंभ और राजधर्म का पतन : युवा आक्रोश के ज्वालामुखी पर बैठी सत्ता
डॉ ऋतंभरा तिवारी,ब्लॉगर
जब परीक्षा चयन का माध्यम न रहकर सत्ता और विशेषज्ञों के अहंकार का अखाड़ा बन जाए, तब राष्ट्र का भविष्य प्रश्नपत्रों में नहीं, सड़कों पर लिखा जाता ह"प्रजापीड़नेन हि राज्ञः समूलं विनाशं भवति।"
कौटिल्य का यह वचन मात्र एक नीति-सूत्र नहीं, बल्कि हर युग की सत्ता के लिए अंतिम चेतावनी है। इतिहास गवाह है कि कोई भी साम्राज्य बाहरी शत्रुओं से उतना नहीं टूटा जितना अपनी ही प्रजा की पीड़ा, उपेक्षा और आक्रोश से बिखरा है।आज भारत का युवा एक विचित्र त्रासदी के दौर से गुजर रहा है। वह परिश्रम कर रहा है, तपस्या कर रहा है, परिवार का भविष्य अपने कंधों पर ढो रहा है, लेकिन उसकी राह में प्रतियोगी परीक्षाओं का ऐसा दुर्ग खड़ा कर दिया गया है, जहाँ योग्यता से अधिक अव्यवस्था, पारदर्शिता से अधिक भ्रम और न्याय से अधिक अहंकार का शासन दिखाई देता है।यह केवल परीक्षा का संकट नहीं है।यह राष्ट्र और उसकी युवा शक्ति के बीच टूटते विश्वास का संकट है।
विशेषज्ञता या बौद्धिक सामंतवाद?ज्ञान जब समाज का मार्गदर्शक बनता है तो वह प्रकाश देता है, किंतु जब वही ज्ञान अहंकार का कवच पहन लेता है तो अंधकार पैदा करता है।आज प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया में कई स्थानों पर यही अहंकार दिखाई देता है। ऐसे प्रश्न तैयार किए जाते हैं जिन्हें निर्धारित समय में हल करना स्वयं प्रश्न-निर्माताओं के लिए भी चुनौती हो। कई बार प्रश्नों की भाषा अस्पष्ट, विकल्प विवादास्पद और उत्तर-कुंजी त्रुटिपूर्ण होती है।यह विद्वत्ता नहीं है।यह उस पांडित्य का प्रदर्शन है जो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए युवाओं के भविष्य को प्रयोगशाला बना देता है।
कौटिल्य ने 'अमात्य' को राज्य की रीढ़ कहा था। किंतु जब अमात्य स्वयं भ्रम, अक्षमता और अहंकार का प्रतीक बन जाए, तब वह राज्य का सेवक नहीं, उसके पतन का कारण बन जाता है।युवा केवल अभ्यर्थी नहीं, राष्ट्र की ऊर्जा है ,सत्ता शायद यह भूल रही है कि परीक्षा कक्ष में बैठा छात्र कोई रोल नंबर नहीं होता।उसके पीछे माँ की अधूरी इच्छाएँ होती हैं।पिता का झुकता हुआ शरीर होता है।बहन की रुक गई पढ़ाई होती है।परिवार की वर्षों की बचत होती है।और सबसे बढ़कर एक ऐसे भारत का सपना होता है जहाँ परिश्रम का मूल्य मिले।
जब पेपर लीक होता है, परिणाम वर्षों तक लटकते हैं, नियुक्तियाँ न्यायालयों में फँसती हैं और आयोग अपनी त्रुटियों पर पर्दा डालते हैं, तब केवल एक परीक्षा नहीं टूटती—राष्ट्र के भविष्य पर से विश्वास टूटता है।युवा की असफलता उतनी खतरनाक नहीं होती, जितना उसका व्यवस्था से मोहभंग।क्योंकि निराश युवा बेरोजगार हो सकता है, किंतु मोहभंग हुआ युवा व्यवस्था-विरोधी बन सकता है।
राजधर्म का अवसान,लोकतंत्र में सरकार केवल शासन नहीं करती, वह विश्वास का संचालन भी करती है।किंतु जब छात्र महीनों धरना दें और सत्ता मौन रहे, जब न्याय की मांग पर लाठियाँ मिलें, जब संवाद की जगह उपदेश दिए जाएँ, तब यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं रहती।यह राजधर्म की पराजय बन जाती है।कौटिल्य ने स्पष्ट कहा था कि राजा को अपनी प्रजा के लिए सदैव सुलभ रहना चाहिए। जो शासक जनता की आवाज सुनना बंद कर देता है, वह धीरे-धीरे जनता के हृदय से उतर जाता है।सत्ता की सबसे बड़ी शक्ति सेना नहीं होती।सत्ता की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास होता है।और इतिहास में विश्वास खो चुकी सत्ता कभी अधिक समय तक टिक नहीं पाई।
अभ्यन्तर कोप : सबसे बड़ा खतरा,कौटिल्य ने बाहरी शत्रुओं से अधिक खतरनाक 'अभ्यन्तर कोप' को माना था।आज वही आंतरिक असंतोष देश के अनेक हिस्सों में दिखाई दे रहा है।यह केवल छात्रों का प्रदर्शन नहीं है। उन करोड़ों परिवारों की मौन चीख है जिनके बच्चे वर्षों से भर्ती परीक्षाओं, परिणामों और नियुक्तियों के बीच झूल रहे हैं।युवाओं का आक्रोश किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं होता।वह जब फूटता है तो सिंहासन और विचारधाराओं में भेद नहीं करता।
नंद साम्राज्य की विशाल शक्ति को भी अंततः एक अपमानित प्रतिभा और जन-असंतोष ने समाप्त किया था।इतिहास की यही सबसे बड़ी शिक्षा है कि जब व्यवस्था योग्य लोगों को अवसर नहीं देती, तब वही योग्य लोग व्यवस्था बदलने का संकल्प ले लेते हैं।अब क्या होना चाहिए?पहला—प्रश्नपत्र निर्माण और मूल्यांकन की प्रक्रिया में पूर्ण जवाबदेही तय हो।दूसरा—त्रुटिपूर्ण प्रश्नों और प्रशासनिक लापरवाही के लिए संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी निर्धारित हो।तीसरा—भर्ती प्रक्रियाओं को समयबद्ध और पारदर्शी बनाया जाए।चौथा—सरकार सीधे छात्र संगठनों और अभ्यर्थियों से संवाद स्थापित करे।पाँचवाँ—प्रतियोगी परीक्षाओं को विशेषज्ञों के अहंकार का मंच नहीं, राष्ट्र-निर्माण का साधन माना जाए।
: सत्ता के लिए अंतिम संकेत,सत्ताएँ यह भ्रम न पालें कि युवा केवल वोटर है।युवा राष्ट्र की गति है।युवा राष्ट्र की ऊर्जा है।युवा राष्ट्र का भविष्य है।यदि उसकी आँखों का पानी सूखकर अंगार बन गया, तो वह केवल रोजगार नहीं माँगेगा—वह व्यवस्था से हिसाब माँगेगा।
कौटिल्य की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी मगध के दिनों में थी—"प्रजा के धैर्य की परीक्षा मत लो।"क्योंकि जब न्याय देर से आता है, तो जनाक्रोश स्वयं न्याय बनने निकल पड़ता है।और उस दिन इतिहास प्रश्नपत्रों से नहीं, सड़कों से लिखा जाता है।
बिलकुल सही कह रहे हैं
जवाब देंहटाएं