अगस्त्य की प्रतीक्षा में भारत: जब उत्तर और दक्षिण के बीच संवाद का सेतु अभी बनना बाकी है
राजेंद्र नाथ तिवारी,272001
भारत में आश्चर्यजनक विरोधाभासों की कमी नहीं है। यह वह देश है जिसने सहस्राब्दियों पूर्व हिमालय से समुद्र तक एक सांस्कृतिक राष्ट्र की कल्पना की, किंतु आज कभी-कभी भाषा, क्षेत्र और पहचान के प्रश्नों पर स्वयं को खंडित रूप में देखने लगता है। यह वह सभ्यता है जिसने "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" का उद्घोष किया, किंतु आधुनिक विमर्श में कभी-कभी हिंदी और तमिल, उत्तर और दक्षिण, आर्य और द्रविड़ जैसे कृत्रिम द्वंद्वों में उलझ जाती है।सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि ये विवाद क्यों उत्पन्न होते हैं। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि जब भारत के पास इन मतभेदों को पाटने वाले इतने सशक्त सांस्कृतिक प्रतीक मौजूद हैं, तब राष्ट्रीय विमर्श ने उन्हें केंद्र में क्यों नहीं रखा?
महर्षि अगस्त्य ऐसा ही एक नाम हैं।अद्भुत तथ्य यह है कि उत्तर भारत उन्हें वैदिक ऋषि मानता है, दक्षिण भारत उन्हें "अगत्तियार" के रूप में पूजता है। संस्कृत परंपरा उन्हें अपना कहती है, तमिल परंपरा उन्हें अपना कहती है। काशी की स्मृति में भी वे हैं और अगस्त्यमलाई की चेतना में भी। भारत के सांस्कृतिक भूगोल में शायद ही कोई दूसरा व्यक्तित्व हो जिसे उत्तर और दक्षिण दोनों इतनी सहजता से स्वीकार करते हों।
फिर भी प्रश्न बना रहता है—यदि अगस्त्य इतने व्यापक स्वीकार्य हैं, तो उन्हें राष्ट्रीय एकात्मता के प्रतीक के रूप में क्यों नहीं स्थापित किया गया?इसका उत्तर केवल इतिहास में नहीं, आधुनिक भारत की बौद्धिक प्रवृत्तियों में छिपा है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने राजनीतिक एकीकरण को प्राथमिकता दी। संविधान, संसद, न्यायपालिका और प्रशासनिक ढाँचे ने राष्ट्र को संस्थागत रूप से मजबूत किया। यह आवश्यक भी था। किंतु इसी प्रक्रिया में सांस्कृतिक एकात्मता के उन सूत्रों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया जो भारत को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय एकता का विमर्श अधिकतर राजनीतिक और प्रशासनिक भाषा में व्यक्त हुआ, सांस्कृतिक भाषा में कम।
धर्माचार्यों ने धर्म की रक्षा की, समाज-सुधारकों ने सामाजिक प्रश्न उठाए, राजनेताओं ने शासन की चुनौतियों पर ध्यान दिया, भाषाविदों ने भाषाओं का अध्ययन किया। परंतु इन सबके बीच कोई ऐसा व्यापक प्रयास दिखाई नहीं देता जिसने अगस्त्य को उत्तर-दक्षिण संवाद के जीवंत प्रतीक के रूप में पुनः प्रतिष्ठित किया हो।यह और भी आश्चर्यजनक है क्योंकि भारत में भाषा-विवाद कोई नया विषय नहीं है। हिंदी के प्रश्न पर समय-समय पर दक्षिण भारत में आंदोलनों का इतिहास रहा है। दूसरी ओर उत्तर भारत में भी भाषाई अस्मिता के प्रश्न उठते रहे हैं। इन बहसों का समाधान अक्सर राजनीतिक समझौतों या प्रशासनिक व्यवस्थाओं में खोजा गया। किंतु शायद ही कभी यह पूछा गया कि क्या कोई ऐसा साझा सांस्कृतिक आधार है जिस पर संवाद की नई इमारत खड़ी की जा सके।
अगस्त्य इस प्रश्न का स्वाभाविक उत्तर हो सकते हैं।न्होंने भारतीय परंपरा में विजय नहीं, समन्वय का मार्ग दिखाया। वे उस सांस्कृतिक प्रक्रिया के प्रतीक हैं जिसमें भारत ने विविधताओं को मिटाया नहीं, उन्हें एक व्यापक सभ्यतागत ढाँचे में स्थान दिया। यही कारण है कि उनकी स्मृति उत्तर और दक्षिण दोनों में सुरक्षित रही।इसी संदर्भ में तमिल महाकवि कम्बन का स्मरण भी आवश्यक है। यदि अगस्त्य उत्तर और दक्षिण के बीच ज्ञान-सेतु हैं, तो कम्बन उस सेतु पर खड़ा साहित्यिक शिखर हैं। कम्बन ने रामकथा को तमिल आत्मा में ढालकर यह सिद्ध किया कि भारतीय संस्कृति किसी एक भाषा की बपौती नहीं है। राम संस्कृत के भी हैं, तमिल के भी; अवधी के भी हैं, बांग्ला के भी। भारत की शक्ति इसी बहुरंगी एकता में निहित है।
आज आवश्यकता किसी नई वैचारिक लड़ाई की नहीं है। आवश्यकता उन सांस्कृतिक सूत्रों को पुनः पहचानने की है जिन्हें इतिहास ने हमें सौंपा है। यदि काशी-तमिल संगमम जैसे प्रयास सफल हो सकते हैं, तो अगस्त्य और कम्बन के नाम पर एक व्यापक राष्ट्रीय सांस्कृतिक संवाद भी संभव है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक मंचों के माध्यम से उत्तर और दक्षिण की साझा विरासत को नए रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
यह कार्य राजनीति के लिए भी उपयोगी होगा, समाज के लिए भी और राष्ट्र के लिए भी। क्योंकि राष्ट्र केवल कानूनों से संचालित नहीं होते; वे स्मृतियों, प्रतीकों और साझा विश्वासों से भी जीवित रहते हैं।संभव है कि आने वाले समय में भारत को अपनी एकता की रक्षा के लिए केवल संवैधानिक प्रावधानों से अधिक की आवश्यकता पड़े। उसे ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों की आवश्यकता होगी जो विवादों से ऊपर हों, जिन्हें सभी अपना मानते हों और जिनके माध्यम से संवाद का नया वातावरण निर्मित किया जा सके।महर्षि अगस्त्य ऐसे ही प्रतीक हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि अगस्त्य का महत्व क्या है। प्रश्न यह है कि क्या आधुनिक भारत उनकी प्रासंगिकता को पहचानने के लिए तैयार है?यदि उत्तर और दक्षिण के बीच विश्वास का नया अध्याय लिखना है, यदि भाषाओं के बीच सम्मान का नया वातावरण बनाना है, यदि भारत को केवल भौगोलिक नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी अधिक सुदृढ़ बनाना है, तो संभवतः समय आ गया है कि हम अगस्त्य को पुनः पढ़ें, कम्बन को पुनः समझें और अपनी सभ्यता की उस धारा को पुनर्जीवित करें जिसने कभी विंध्य को भी विभाजन की रेखा नहीं बनने दिया था।
कभी-कभी इतिहास किसी नए नायक की प्रतीक्षा नहीं करता। वह केवल उन पुराने प्रकाशस्तंभों की ओर लौटने का संकेत देता है जिन्हें हम भूल चुके होते हैं।शायद भारत आज उसी मोड़ पर खड़ा है।


वाह !अद्भुत व सटीक सोच है कि अगस्त्य को हम क्यों नहीं राष्ट्रीय एकता का मानक मान कर उसे ही विस्तार दें ।उत्तर दक्षिण की दूरी कम करने में ये बिंदु सहायक होगा ।
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