सम्पूर्ण समाधान दिवस समाधान का मंच या औपचारिकता की परीक्षा?
बस्ती,वशिष्ठ नगर,272001,संवाददाता
तहसील भानपुर में आयोजित सम्पूर्ण समाधान दिवस में 88 शिकायतों का प्राप्त होना इस बात का संकेत है कि जनता आज भी प्रशासन को अपनी समस्याओं के समाधान का सबसे बड़ा माध्यम मानती है। किंतु विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या समाधान दिवस केवल शिकायत दर्ज करने का मंच बनकर रह गया है, अथवा वास्तव में यह जनविश्वास की पुनर्स्थापना का प्रभावी माध्यम बन पा रहा है? कौटिल्य ने 'अर्थशास्त्र' में स्पष्ट कहा है कि राज्य की शक्ति उसकी सेना या खजाने में नहीं, बल्कि प्रजा के संतोष में निहित होती है। यदि एक ही समस्या बार-बार समाधान दिवसों में पहुंच रही है, तो यह केवल नागरिक की समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी का भी संकेत है।
उप जिलाधिकारी द्वारा राजस्व वादों के निष्पक्ष एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के निर्देश स्वागतयोग्य हैं। विशेषकर दोनों पक्षों को सुनकर निर्णय लेने की बात न्याय के मूल सिद्धांतों को मजबूत करती है। परंतु वास्तविक सफलता का आकलन निर्देशों से नहीं, बल्कि उनके धरातलीय परिणामों से होगा।
88 में से मात्र 6 मामलों का मौके पर निस्तारण यह बताता है कि प्रशासनिक चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं। शेष 82 मामलों का समाधान कितनी समयबद्धता, पारदर्शिता और गुणवत्ता के साथ होता है, यही इस समाधान दिवस की वास्तविक उपलब्धि तय करेगा।
सम्पूर्ण समाधान दिवस की सफलता केवल शिकायतों की संख्या से नहीं, बल्कि अगले समाधान दिवस तक शिकायतों की संख्या घटने से मापी जानी चाहिए। यदि समस्याएं कम हो रही हैं तो व्यवस्था सफल है, और यदि शिकायतें बढ़ रही हैं तो आत्ममंथन आवश्यक है।
जनपद बस्ती जैसे कृषि प्रधान जिले में राजस्व विवाद, अतिक्रमण, राशन, पेंशन, स्वास्थ्य और भूमि संबंधी समस्याओं का त्वरित समाधान केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि सुशासन की कसौटी भी है। समाधान दिवस तभी सार्थक होगा जब फरियादी को यह विश्वास हो कि उसकी समस्या फाइलों में नहीं, बल्कि प्राथमिकता में है।
कौटिल्य की दृष्टि में उत्तम शासन वह नहीं जो आदेश देता है, बल्कि वह है जो शिकायतों के कारणों को समाप्त कर देता है।

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