मोदी: अमृत, विष या युग-परिवर्तन
बस्ती,वशिष्ठ नगर, 272001 राजेंद्र नाथ तिवारी
आयुर्वेद कहता है कि अमृत भी यदि अनुपयुक्त शरीर में पहुँचे तो विकार उत्पन्न कर सकता है, और विष भी उचित मात्रा में औषधि बन सकता है। वस्तु वही रहती है, अंतर केवल ग्रहण करने वाले की प्रकृति में होता है। राजनीति में भी कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका मूल्यांकन उनके कार्यों से कम और लोगों की मानसिकता से अधिक होता है।नरेंद्र मोदी भी आज ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। एक वर्ग उन्हें भारत के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, वैश्विक प्रतिष्ठा और निर्णायक नेतृत्व का प्रतीक मानता है। दूसरा वर्ग उन्हें अपनी राजनीतिक, वैचारिक या सामाजिक असहमतियों का केंद्र मानता है। परंतु यह स्थिति किसी साधारण नेता की नहीं होती। साधारण नेता पर चर्चा होती है, असाधारण नेता पर विमर्श और संघर्ष होता है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब कोई व्यवस्था जड़ता को चुनौती देती है, तब-तब समाज दो भागों में बँटता है। एक भाग परिवर्तन का स्वागत करता है, दूसरा उसका प्रतिरोध। यही कारण है कि किसी भी युग-निर्माता के साथ प्रशंसा और आलोचना दोनों चलती हैं। प्रश्न यह नहीं कि मोदी के पक्ष में कितने लोग हैं और विरोध में कितने; प्रश्न यह है कि उनके नाम पर इतनी तीव्र प्रतिक्रिया क्यों होती है?
दरअसल मोदी आज केवल एक राजनीतिक व्यक्ति नहीं हैं। वे भारतीय राजनीति के उस मोड़ का नाम हैं जहाँ भारत अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों, विकास की आकांक्षाओं और वैश्विक भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास कर रहा है। इसलिए मोदी के समर्थन या विरोध में दिया गया प्रत्येक तर्क अंततः भारत की दिशा पर बहस बन जाता है।जो लोग उन्हें केवल व्यक्ति मानकर देखते हैं, वे संभवतः उनके प्रभाव की व्यापकता को नहीं समझते। व्यक्ति सत्ता से बड़ा नहीं होता, पर कभी-कभी उसका प्रभाव एक युग का प्रतीक बन जाता है। गांधी, पटेल, अंबेडकर और अन्य अनेक नेताओं के संदर्भ में भी यही हुआ था। इतिहास ने उन्हें तत्काल नहीं परखा; समय ने परखा।आज भी यदि कोई मोदी को अमृत कहता है और कोई विष, तो यह मोदी की नहीं, देखने वाले की दृष्टि का भी प्रश्न है। सूर्य जब उदित होता है तो कमल खिलता है और रात्रिचर प्राणी असहज हो उठते हैं। सूर्य किसी के लिए अलग नहीं चमकता; पर उसकी रोशनी का अनुभव सबके लिए समान नहीं होता।
कौटिल्य ने लिखा था कि सशक्त राज्य और दृढ़ नेतृत्व सदैव विरोध उत्पन्न करते हैं, क्योंकि परिवर्तन सबसे पहले उन लोगों को असुविधा देता है जो यथास्थिति के लाभार्थी होते हैं। इसलिए किसी भी बड़े राजनीतिक परिवर्तन को समझने के लिए केवल नारों से नहीं, उसके दीर्घकालिक परिणामों से निर्णय करना चाहिए।आज का भारत यदि अंतरिक्ष में पहुँच रहा है, डिजिटल क्रांति की बात कर रहा है, अपनी सांस्कृतिक पहचान को नए आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत कर रहा है और वैश्विक मंचों पर अधिक मुखर दिखाई देता है, तो इन परिवर्तनों का मूल्यांकन इतिहास करेगा। उसी प्रकार इन नीतियों की सीमाएँ और कमियाँ भी इतिहास के न्यायालय में दर्ज होंगी।
इसलिए "मोदी कौन हैं?" का उत्तर किसी दल, समर्थक या विरोधी के पास पूर्णतः नहीं है। इसका उत्तर आने वाली पीढ़ियाँ देंगी। वे देखेंगी कि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में भारत किस दिशा में बढ़ा, उसके आत्मविश्वास का स्रोत क्या था, उसकी चुनौतियाँ क्या थीं और उसके नेतृत्व ने उन चुनौतियों का सामना कैसे किया।
कौटिल्य दृष्टि से
मोदी को समझना हो तो व्यक्ति से ऊपर उठकर प्रवृत्ति को देखिए। वे उस भारत का प्रतीक हैं जो अपनी सभ्यता पर गर्व करना चाहता है, वैश्विक मंच पर सम्मान चाहता है और विकास तथा विरासत के बीच संतुलन खोज रहा है। इस प्रयास से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, पर उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
दिनकर की पंक्तियाँ मानो इसी संदर्भ में बोलती हैं—
"तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के,
पाते हैं जग से प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।"
और अंत में—"कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं, कुछ लोग इतिहास लिखते हैं, और कुछ ऐसे होते हैं जिनके पक्ष-विपक्ष में इतिहास स्वयं लिखा जाता है। मोदी उस तीसरी श्रेणी के नेता हैं। इसलिए विवाद उनके बारे में कम, भारत के भविष्य के बारे में अधिक है।"
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