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सोमवार, 8 जून 2026

ढहते किलों की प्रतिध्वनि : कांग्रेस, ममता और हताश विपक्ष की राजनीतिक पराजय

 

ढहते किलों की प्रतिध्वनि : कांग्रेस, ममता और हताश विपक्ष की राजनीतिक पराजय

ऋषि  देव मिश्रा  राजनीतिक  समीक्षक 










भारतीय राजनीति में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं देते, बल्कि युग परिवर्तन की घोषणा करते हैं। आज का भारत ऐसे ही एक परिवर्तन काल से गुजर रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्र आत्मविश्वास, विकास, सुरक्षा और वैश्विक प्रतिष्ठा के नए शिखरों की ओर अग्रसर है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता की लड़ाई लड़ता दिखाई दे रहा है। दिल्ली में होने वाली I.N.D.I.A. गठबंधन की बैठक इस संकट का जीवंत उदाहरण है। विडंबना यह है कि जिस गठबंधन का निर्माण भाजपा और मोदी के विरोध के नाम पर हुआ था, वह आज तक यह तय नहीं कर सका कि देश को वह क्या देना चाहता है। उसके पास न कोई साझा विचार है, न साझा नेतृत्व और न ही साझा राष्ट्रीय दृष्टि। उसका एकमात्र सूत्र है— "मोदी विरोध"। किंतु लोकतंत्र में केवल विरोध कभी विकल्प नहीं बनता।
कांग्रेस की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है। कभी देश की राजनीति का ध्रुव रही यह पार्टी आज अपने ही बनाए राजनीतिक शून्य में भटक रही है। जिन क्षेत्रीय दलों को उसने कभी अपने विरुद्ध खड़ा होते देखा था, आज उन्हीं के दरवाजे पर वापसी की गुहार लगा रही है। ममता बनर्जी को "घर वापसी" का संदेश वास्तव में कांग्रेस की शक्ति नहीं, उसकी विवशता का प्रतीक है। ममता बनर्जी स्वयं भी एक राजनीतिक विरोधाभास बन चुकी हैं। जिनके राजनीतिक अस्तित्व की नींव कांग्रेस विरोध पर खड़ी हुई, आज वही कांग्रेस उन्हें अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रही है। यह केवल राजनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति के वैचारिक दिवालियेपन का प्रमाण है। सत्ता प्राप्ति की लालसा ने सिद्धांतों को इतना लचीला बना दिया है कि कल का शत्रु आज का सहयोगी और आज का सहयोगी कल का प्रतिद्वंद्वी बन जाता है।
राहुल गांधी विपक्ष के चेहरे के रूप में स्थापित होने का प्रयास करते हैं, परंतु उनकी राजनीति आज भी प्रतिक्रियात्मक राजनीति से आगे नहीं बढ़ पाई है। राष्ट्र निर्माण की कोई व्यापक अवधारणा, आर्थिक विकास का कोई स्पष्ट मॉडल, राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई दृढ़ दृष्टिकोण अथवा सांस्कृतिक अस्मिता पर कोई सकारात्मक विमर्श उनके नेतृत्व से प्रकट नहीं होता। परिणामस्वरूप विपक्ष की प्रत्येक बैठक एक राजनीतिक आयोजन तो बनती है, पर राष्ट्रीय आशा का केंद्र नहीं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस समय भारत विश्व मंच पर निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा है, सीमाओं को आधुनिक बनाया जा रहा है, अर्थव्यवस्था नई ऊँचाइयाँ छू रही है और वैश्विक संकटों में भारत की आवाज सुनी जा रही है, उसी समय विपक्ष जातीय समीकरणों, तुष्टिकरण और सत्ता-साझेदारी के गणित में उलझा हुआ है। वास्तव में विपक्ष की समस्या भाजपा नहीं है, मोदी नहीं हैं। उसकी सबसे बड़ी समस्या उसका स्वयं का वैचारिक रिक्तता है। राष्ट्रवाद का कोई उत्तर नहीं, विकास का कोई विकल्प नहीं, सुशासन का कोई मॉडल नहीं और नेतृत्व का कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं। ऐसे में गठबंधन केवल अंकगणित बनकर रह जाता है, रसायनशास्त्र नहीं बन पाता।
आज कांग्रेस, ममता और उनके सहयोगी दल जिस राजनीतिक मोड़ पर खड़े हैं, वहाँ सबसे बड़ा प्रश्न सत्ता प्राप्ति का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को पुनः अर्जित करने का है। दुर्भाग्यवश इसके लिए जिस आत्ममंथन, त्याग और वैचारिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है, उसके संकेत कहीं दिखाई नहीं देते।
इसलिए I.N.D.I.A. गठबंधन की बैठकों से निकलने वाली सबसे बड़ी ध्वनि किसी नए राजनीतिक युग की नहीं, बल्कि ढहते हुए किलों की प्रतिध्वनि जैसी प्रतीत होती है। जनता का मन भविष्य के भारत के साथ है, जबकि विपक्ष अभी भी अतीत के खंडहरों में अपने खोए हुए साम्राज्य की तलाश कर रहा है।
सत्ता का संघर्ष लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है, किंतु जब संघर्ष विचारों के स्थान पर केवल व्यक्तियों के विरोध तक सिमट जाए, तब वह आंदोलन नहीं, राजनीतिक हताशा का आख्यान बन जाता है। आज का विपक्ष उसी आख्यान का जीवंत पात्र दिखाई देता है।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही शानदार और ज्ञानवर्धक लेख। जानकारी सरल और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत की गई है।

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