“सबका साथ–सबका विकास” बंद करो? क्या लोकतंत्र अब केवल समर्थकों के लिए बचेगा?
पश्चिम बंगाल की राजनीति से निकला यह कथन — “सबका साथ–सबका विकास बंद करो, जो हमारे साथ हम उनके साथ” — केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना को झकझोर देने वाला संकेत है। यह प्रश्न केवल बंगाल का नहीं, पूरे भारत के लोकतांत्रिक चरित्र का है।
क्या सत्ता अब केवल समर्थकों के लिए कार्य करेगी?क्या विरोधी विचार रखने वाला नागरिक विकास, सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारों से वंचित माना जाएगा?
यदि राजनीति इस दिशा में बढ़ती है, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे जनसेवा से हटकर वैचारिक प्रतिशोध का माध्यम बन जाएगा।
भारत का संविधान किसी दल, जाति, क्षेत्र या विचारधारा के आधार पर शासन चलाने की अनुमति नहीं देता। सरकारें चुनाव जीतकर बनती हैं, लेकिन सत्ता पूरे समाज की होती है। मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या जनप्रतिनिधि केवल अपने समर्थकों के नेता नहीं होते; वे करोड़ों नागरिकों की आशाओं और अधिकारों के संरक्षक होते हैं।“जो हमारे साथ, हम उनके साथ” — यह वाक्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं, बल्कि सामंती मानसिकता में अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। लोकतंत्र की पहचान निष्पक्षता है, पक्षधरता नहीं। शासन यदि समर्थन और विरोध के आधार पर नागरिकों को बाँटने लगे, तो प्रशासन न्याय का माध्यम नहीं, राजनीतिक पुरस्कार और दंड का औजार बन जाता है।
पश्चिम बंगाल पहले ही राजनीतिक हिंसा, वैचारिक असहिष्णुता और चुनावी संघर्षों को लेकर लंबे समय से राष्ट्रीय बहस का विषय रहा है। ऐसे वातावरण में नेतृत्व से अपेक्षा होती है कि वह समाज को विश्वास दे, भय नहीं; संवाद दे, विभाजन नहीं; विकास दे, प्रतिशोध नहीं। “सबका साथ–सबका विकास” केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रजीवन की आवश्यकता है। भारत विविधताओं का देश है। यहाँ विचार अलग हो सकते हैं, मतभेद हो सकते हैं, लेकिन शासन सबका होना चाहिए। यदि राज्य यह तय करने लगे कि कौन “अपना” है और कौन “पराया”, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।
इतिहास गवाह है कि जो राजनीति समाज को बाँटकर चलती है, वह अंततः स्वयं भी अस्थिर हो जाती है। स्थायी नेतृत्व वही होता है जो आलोचकों को भी सुनता है, विरोधियों को भी नागरिक मानता है और सत्ता को सेवा का माध्यम समझता है।
आज भारत को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जो नागरिकों को विचारधारा के खांचों में बाँटने के बजाय राष्ट्रहित के सूत्र में जोड़े। लोकतंत्र की शक्ति विरोध को दबाने में नहीं, विरोध के बीच भी न्याय करने में होती है।राजनीति का अंतिम उद्देश्य सत्ता नहीं, समाज होना चाहिए।और जिस दिन “सबका विकास” की भावना समाप्त हो जाएगी, उसी दिन लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित होकर रह जाएगा।
क्या सत्ता अब केवल समर्थकों के लिए कार्य करेगी?क्या विरोधी विचार रखने वाला नागरिक विकास, सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारों से वंचित माना जाएगा?
यदि राजनीति इस दिशा में बढ़ती है, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे जनसेवा से हटकर वैचारिक प्रतिशोध का माध्यम बन जाएगा।
भारत का संविधान किसी दल, जाति, क्षेत्र या विचारधारा के आधार पर शासन चलाने की अनुमति नहीं देता। सरकारें चुनाव जीतकर बनती हैं, लेकिन सत्ता पूरे समाज की होती है। मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या जनप्रतिनिधि केवल अपने समर्थकों के नेता नहीं होते; वे करोड़ों नागरिकों की आशाओं और अधिकारों के संरक्षक होते हैं।“जो हमारे साथ, हम उनके साथ” — यह वाक्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं, बल्कि सामंती मानसिकता में अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। लोकतंत्र की पहचान निष्पक्षता है, पक्षधरता नहीं। शासन यदि समर्थन और विरोध के आधार पर नागरिकों को बाँटने लगे, तो प्रशासन न्याय का माध्यम नहीं, राजनीतिक पुरस्कार और दंड का औजार बन जाता है।
पश्चिम बंगाल पहले ही राजनीतिक हिंसा, वैचारिक असहिष्णुता और चुनावी संघर्षों को लेकर लंबे समय से राष्ट्रीय बहस का विषय रहा है। ऐसे वातावरण में नेतृत्व से अपेक्षा होती है कि वह समाज को विश्वास दे, भय नहीं; संवाद दे, विभाजन नहीं; विकास दे, प्रतिशोध नहीं। “सबका साथ–सबका विकास” केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रजीवन की आवश्यकता है। भारत विविधताओं का देश है। यहाँ विचार अलग हो सकते हैं, मतभेद हो सकते हैं, लेकिन शासन सबका होना चाहिए। यदि राज्य यह तय करने लगे कि कौन “अपना” है और कौन “पराया”, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।
इतिहास गवाह है कि जो राजनीति समाज को बाँटकर चलती है, वह अंततः स्वयं भी अस्थिर हो जाती है। स्थायी नेतृत्व वही होता है जो आलोचकों को भी सुनता है, विरोधियों को भी नागरिक मानता है और सत्ता को सेवा का माध्यम समझता है।
आज भारत को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जो नागरिकों को विचारधारा के खांचों में बाँटने के बजाय राष्ट्रहित के सूत्र में जोड़े। लोकतंत्र की शक्ति विरोध को दबाने में नहीं, विरोध के बीच भी न्याय करने में होती है।राजनीति का अंतिम उद्देश्य सत्ता नहीं, समाज होना चाहिए।और जिस दिन “सबका विकास” की भावना समाप्त हो जाएगी, उसी दिन लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित होकर रह जाएगा।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें