राजनीति में शब्द नहीं, चरित्र मर रहा है - कौटिल्य का भारत

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शुक्रवार, 29 मई 2026

राजनीति में शब्द नहीं, चरित्र मर रहा है

 राजनीति में शब्द नहीं, चरित्र मर रहा है



राजेन्द्र  नाथ  तिवारी, 272001

भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा संकट विपक्ष या सत्ता नहीं, बल्कि गिरती हुई विश्वसनीयता है। नेता आज जो बोलते हैं, कल स्वयं उसी का खंडन करते दिखाई देते हैं। भावनात्मक बयान जनता को प्रभावित करने के लिए दिए जाते हैं, निभाने के लिए नहीं।वर्ष 1999 में सोनिया गांधी  ने कहा था -“मेरे बच्चे भीख मांग लेंगे, पर राजनीति में नहीं आएंगे।”समय बदला और वही परिवार भारतीय राजनीति का केंद्र बन गया। प्रश्न राजनीति में आने का नहीं, बल्कि उस भावनात्मक नैतिकता का है जिसे जनता के सामने आदर्श बनाकर प्रस्तुत किया गया था।इसी प्रकार अरविंद  केजरीवाल की राजनीति भी कभी आदर्शवाद और वैकल्पिक व्यवस्था का प्रतीक कही गई थी। किंतु समय ने दिखाया कि सत्ता का आकर्षण अक्सर सिद्धांतों को निगल जाता है। आंदोलन से निकली राजनीति भी अंततः उसी कुर्सी की परिक्रमा करने लगती है, जिसकी आलोचना करके वह पैदा हुई थी।आज राजनीति में विचारधारा कम, अभिनय अधिक दिखाई देता है। त्याग की भाषा बोली जाती है, पर संघर्ष सत्ता के लिए होता है। जनता से वादे किए जाते हैं, फिर सुविधानुसार भुला दिए जाते हैं। यही कारण है कि लोकतंत्र में अविश्वास बढ़ रहा है।राष्ट्र केवल चुनाव जीतने से महान नहीं बनता। राष्ट्र तब मजबूत होता है जब नेता अपने शब्दों के प्रति उत्तरदायी हों। क्योंकि राजनीति में झूठ केवल एक व्यक्ति का पतन नहीं करता, वह समाज की नैतिक चेतना को भी खोखला कर देता है।

राजनीति का सबसे बड़ा पतन : जब शब्द केवल हथियार बन जाएँ,भारतीय लोकतंत्र आज केवल चुनावों की लड़ाई नहीं लड़ रहा, वह विश्वास बचाने की लड़ाई भी लड़ रहा है।संकट इस बात का नहीं कि कौन सत्ता में है और कौन विपक्ष में। संकट इस बात का है कि राजनीति में शब्दों का मूल्य समाप्त होता जा रहा है। नेता अब विचार नहीं बोलते, परिस्थितियाँ बोलते हैं। सिद्धांत नहीं निभाते, अवसर निभाते हैं। जनता के सामने त्याग, संघर्ष और नैतिकता की भाषा प्रस्तुत की जाती है, लेकिन सत्ता के गलियारों में वही शब्द सबसे पहले दम तोड़ देते ह“मेरे बच्चे भीख मांग लेंगे, पर राजनीति में नहीं आएंगे।”उस समय यह वाक्य केवल एक निजी भावुकता नहीं, बल्कि राजनीतिक त्याग के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया था। देश के सामने यह संदेश देने का प्रयास था कि सत्ता जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। किंतु समय बीतते-बीतते वही परिवार भारतीय राजनीति के केंद्र में स्थायी रूप से स्थापित हो गया। आज प्रश्न यह नहीं कि किसी परिवार के सदस्य राजनीति में क्यों आए। लोकतंत्र में हर नागरिक को अधिकार है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या राजनीति में भावनात्मक नैतिकता केवल तत्कालीन सहानुभूति प्राप्त करने का माध्यम बन चुकी है?

भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहाँ कथन और आचरण के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। चुनावी मंचों पर त्याग की बातें होती हैं, लेकिन दलों के भीतर उत्तराधिकार की लड़ाई चलती रहती है। लोकतंत्र के नाम पर परिवारवाद खड़ा किया जाता है और फिर उसे जनता की इच्छा बताकर उचित ठहराया जाता है।विडंबना केवल एक दल तक सीमित नहीं है।अरविंद  केजरीवाल की राजनीति भी कभी व्यवस्था परिवर्तन और नैतिक आदर्शवाद का प्रतीक बनकर उभरी थी। “सिस्टम बदलेंगे”, “नई राजनीति लाएंगे”, “ईमानदार राजनीति करेंगे” — ऐसे नारों ने देश के करोड़ों युवाओं को प्रभावित किया। लोगों को लगा कि शायद अब राजनीति आंदोलन की पवित्रता को पुनर्जीवित करेगी। किंतु समय ने दिखाया कि सत्ता का आकर्षण सबसे कठोर आदर्शवाद को भी धीरे-धीरे व्यावहारिक समझौतों में बदल देता है।

यही भारतीय राजनीति का दुखद सत्य है —यहाँ आंदोलन अंततः संगठन बनता है, संगठन सत्ता बनता है और सत्ता धीरे-धीरे उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है जिसके विरोध में वह जन्मी थी।आज राजनीति में बयान देना अत्यंत सरल हो गया है।कैमरों के सामने त्याग की बातें, मंचों पर नैतिकता के भाषण, सोशल मीडिया पर आदर्शवाद — यह सब जनता की भावनाओं को प्रभावित करने की रणनीति का हिस्सा बन चुका है। लेकिन जब वही नेता अपने ही शब्दों से पलटते हैं, तब लोकतंत्र के भीतर अविश्वास पैदा होता है। जनता केवल नेताओं से नहीं, पूरे राजनीतिक तंत्र से निराश होने लगती है।समस्या केवल झूठ नहीं है।समस्या यह है कि झूठ अब सामान्य माना जाने लगा है। जनता भी मान बैठी है कि चुनावी भाषणों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। यह लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है। क्योंकि लोकतंत्र केवल संविधान से नहीं चलता, वह विश्वास से चलता है। जब जनता को यह लगने लगे कि हर दल, हर नेता और हर विचार अंततः केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम है, तब लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर होने लगता है।

भारतीय राजनीति में आज सबसे अधिक आवश्यकता नए नारों की नहीं, नए चरित्र की है। राष्ट्रवाद भाषणों से नहीं बनता, नैतिकता से बनता है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में विश्वास बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है।जो नेता अपने शब्दों का सम्मान नहीं करते, वे अंततः जनता के विश्वास का भी सम्मान नहीं कर पाते। और जब राजनीति से विश्वास समाप्त होता है, तब केवल सत्ता बचती है - सेवा नहीं, केवल संघर्ष बचता है — समर्पण नहीं।भारत को आज ऐसी राजनीति चाहिए जहाँ शब्द चुनावी हथियार नहीं, चरित्र की पहचान हों।

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