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शुक्रवार, 29 मई 2026

य़ह खबर नहीं, खबरों की आत्मा की हत्या है, जब परिवार टूटता है, तब केवल घर नहीं — सभ्यताएँ बिखरती हैं

 

रिश्तों का पतन और परिवार संस्था की उपेक्षा का दुष्परिणाम

गोरखपुर, सम्वाददाता,गोरखपुर  डेस्क 

सांकेतिक  इमेज स्रोत   सोशल  मीडिया 

गोरखपुर से सामने आई यह घटना केवल एक आपराधिक समाचार भर नहीं है, बल्कि आधुनिक समाज में परिवार संस्था के कमजोर होते आधार की भयावह चेतावनी भी है। जिस व्यक्ति को एक महिला ने अपने जीवन में स्थान दिया, जिस पर भरोसा किया, वही उसकी बेटी को लेकर फरार हो गया। सबसे अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि लड़की उस व्यक्ति को “पापा” कहकर संबोधित करती थी। यह घटना केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन का आईना है।

भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी परिवार व्यवस्था रही है। परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कार, मर्यादा, सुरक्षा और जिम्मेदारी की जीवंत संस्था है। इसी परिवार व्यवस्था ने हजारों वर्षों तक समाज को टूटने से बचाए रखा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के नाम पर पारिवारिक मर्यादाओं को लगातार कमजोर किया गया। परिणाम यह हुआ कि रिश्तों की पवित्रता की जगह अस्थायी संबंधों ने लेनी शुरू कर दी।

लिव-इन संबंधों को आधुनिकता का प्रतीक बताकर प्रस्तुत किया गया, लेकिन समाजशास्त्र का कठोर सत्य यह है कि जहाँ संबंधों में स्थायित्व और सामाजिक उत्तरदायित्व कम होता है, वहाँ भावनात्मक असुरक्षा और विश्वासघात की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों, संस्कारों और सामाजिक उत्तरदायित्वों का बंधन माना गया था। जब यह व्यवस्था कमजोर होती है, तब सबसे अधिक आघात महिलाओं और बच्चों को झेलना पड़ता है।

आज का संकट केवल एक परिवार का नहीं है। यह उस मानसिकता का परिणाम है जिसमें “क्षणिक सुख” को “स्थायी मूल्यों” पर प्राथमिकता दी जा रही है। सोशल मीडिया, मनोरंजन उद्योग और तथाकथित प्रगतिशील विमर्श ने पारिवारिक अनुशासन को पिछड़ापन और पारंपरिक मूल्यों को बोझ की तरह प्रस्तुत किया। धीरे-धीरे समाज ने यह मानना शुरू कर दिया कि संबंध केवल सुविधा का विषय हैं, जिम्मेदारी का नहीं। यही सोच अंततः रिश्तों के विघटन का कारण बनती है।

यह भी सत्य है कि हर लिव-इन संबंध गलत नहीं होता और हर पारंपरिक परिवार आदर्श नहीं होता। लेकिन किसी भी समाज की स्थिरता का आधार वही व्यवस्था बनती है जिसमें उत्तरदायित्व, मर्यादा और सामाजिक नियंत्रण मौजूद हों। भारतीय परिवार व्यवस्था की शक्ति इसी में थी कि वह व्यक्ति को केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य भी सिखाती थी।

गोरखपुर की यह घटना समाज को चेतावनी देती है कि यदि परिवार संस्था की उपेक्षा जारी रही, यदि बच्चों के मानसिक और सांस्कृतिक संरक्षण को महत्व नहीं दिया गया, और यदि रिश्तों को केवल निजी पसंद का विषय मानकर सामाजिक जिम्मेदारी से अलग कर दिया गया, तो आने वाले समय में ऐसे हादसे और बढ़ सकते हैं।

समाज को आधुनिकता और मर्यादा के बीच संतुलन बनाना होगा। स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन ऐसी स्वतंत्रता जो परिवार, विश्वास और सामाजिक नैतिकता को ही नष्ट कर दे, वह अंततः अराजकता को जन्म देती है। भारत की सांस्कृतिक शक्ति उसके परिवारों में रही है; यदि परिवार टूटेंगे, तो समाज भी धीरे-धीरे भीतर से कमजोर होता जाएगा।

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