28,हज़ार की तनख्वाह… और अरबों की अकड़!
भोपाल से यह खबर नहीं, भारतीय व्यवस्था के चेहरे पर पड़ा तमाचा है।भोपाल में बैठे एक मामूली कर्मचारी के ठिकानों से निकली दौलत ने पूरे देश को बता दिया कि भ्रष्टाचार अब चोरी नहीं रहा —यह समानांतर अर्थव्यवस्था बन चुका है।52 किलो सोना…234 किलो चांदी…करोड़ों की नकदी…दुबई में फ्लैट…लक्ज़री गाड़ियाँ…सैकड़ों करोड़ की संपत्ति…और जनता से कहा जाता है —“देश संसाधनों की कमी से जूझ रहा है!”सच यह है कि देश संसाधनों से नहीं,लुटेरों से जूझ रहा है। जिस राष्ट्र में एक किसान खाद के लिए लाइन में खड़ा हो, एक युवा नौकरी के लिए उम्र खपा दे,एक मध्यमवर्गीय परिवार EMI और टैक्स में पिस जाए,वहीं व्यवस्था के भीतर बैठे लोग अरबों का साम्राज्य खड़ा कर लें —
तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, जनता के श्रम का अपमान है। सब जानते हैं —इतनी दौलत अकेला आदमी नहीं खाता।इसके पीछे संरक्षण होता है, साझेदारी होती है, सत्ता की छाया होती है। भ्रष्टाचार की सबसे खतरनाक बात पैसा नहीं है।सबसे खतरनाक बात यह है कि यह ईमानदार लोगों को हतोत्साहित करता है। जब समाज में यह संदेश जाए कि — मेहनत से नहीं,मिलावट से अमीरी मिलती है…तो राष्ट्र धीरे-धीरे नैतिक दिवालियापन की तरफ बढ़ने लगता है।आज भारत की सबसे बड़ी लड़ाई सीमा पर नहीं,व्यवस्था के भीतर है। क्योंकि बाहरी दुश्मन देश को उतना नुकसान नहीं पहुँचाता,जितना भीतर बैठा भ्रष्ट गठजोड़ पहुँचाता है।
यह वही दीमक है जो —गरीब का हक खाती है,युवाओं का भविष्य बेचती है,और लोकतंत्र को दलाली में बदल देती है।देश को अब केवल “छापे” नहीं चाहिए।देश को चाहिए — ऐसी व्यवस्था जहाँ सरकारी कुर्सी सेवा का माध्यम बने, लूट का नहीं।वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी —“क्या भारत सच में गरीब था…या भारत को भीतर बैठे लोगों ने गरीब बना दिया था?”

सत्य वचन
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