जातियों के जाल से वैदिक समरसता तक : सनातन समाज के पुनर्जागरण का समय - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

शनिवार, 9 मई 2026

जातियों के जाल से वैदिक समरसता तक : सनातन समाज के पुनर्जागरण का समय

कौटिल्य उवाच, सम्पादकीय 


 वैदिक समरसता का प्रश्न और सनातन समाज की पुनर्संरचना, सामाजिक पुनर्जागरण के केंद्र में खड़ा एक आवश्यक विमर्श!


बस्ती (वष्टिठ नगर ) से राजेंद्र नाथ तिवारी 

भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना, दार्शनिक परंपरा और सामाजिक संरचना का जीवंत राष्ट्र है। इस राष्ट्र की आत्मा सनातन संस्कृति में निहित है, जिसने विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का संदेश दिया। किंतु विडंबना यह है कि जिस सनातन समाज की मूल भावना समरसता और कर्तव्य-आधारित व्यवस्था पर आधारित थी, वही समाज आज हजारों जातियों और उपजातियों में विभाजित होकर आंतरिक दूरी, सामाजिक संकोच और सांस्कृतिक विखंडन का शिकार दिखाई देता है। ऐसे समय में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जातिविहीन और समरस समाज की आवश्यकता पर खुलकर संवाद कर रहे हैं, तब यह विषय केवल वैचारिक चर्चा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का केंद्रीय प्रश्न बन जाता है।
वास्तव में वैदिक व्यवस्था का मूल स्वरूप जन्म-आधारित कठोर जातीय विभाजन नहीं था। “वर्ण” की अवधारणा सामाजिक दायित्व, गुण और कर्म पर आधारित थी। ब्राह्मण ज्ञान और अध्यात्म का प्रतिनिधि था, क्षत्रिय सुरक्षा और शासन का, वैश्य अर्थव्यवस्था और व्यापार का, जबकि शूद्र सेवा और श्रम का आधार था। यह व्यवस्था समाज के समन्वय हेतु थी, न कि सामाजिक ऊँच-नीच स्थापित करने हेतु। किंतु समय के साथ यह संरचना जड़ होती गई और वर्ण से जाति, जाति से उपजाति, तथा उपजाति से अंतहीन सामाजिक खांचों का निर्माण होता चला गया।
आज स्थिति यह है कि सनातन समाज स्वयं को हजारों सूक्ष्म पहचान में बाँट चुका है। विवाह, सामाजिक व्यवहार, राजनीतिक समीकरण और यहाँ तक कि धार्मिक आयोजन भी जातीय पहचान से प्रभावित दिखाई देते हैं। यह विभाजन केवल सामाजिक नहीं, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक दूरी भी उत्पन्न करता है। परिणामस्वरूप “एकात्म मानव” की भारतीय अवधारणा कमजोर पड़ती है और समाज सामूहिक शक्ति खोने लगता है।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या सनातन समाज अपनी मूल वैदिक चेतना की ओर लौट सकता है? क्या जातीय अहंकार और उपजातीय विभाजन से ऊपर उठकर व्यापक सांस्कृतिक पहचान स्थापित की जा सकती है? यही वह विमर्श है जिसे आज साहसपूर्वक उठाने की आवश्यकता है। यह विषय किसी संघर्ष, आरोप या सामाजिक विद्वेष का नहीं है। यह आत्मबोध और सामाजिक जागरण का विषय है। यदि समाज को यह समझाया जाए कि उसकी वास्तविक पहचान राष्ट्रधर्म, संस्कृति और सभ्यता से है — न कि संकीर्ण उपजातीय सीमाओं से — तो आने वाले समय में सामाजिक समरसता का एक नया अध्याय प्रारंभ हो सकता है।
निस्संदेह, यह कार्य अत्यंत संवेदनशील है। भारत की सामाजिक संरचना शताब्दियों से विकसित हुई है और उसमें अनेक ऐतिहासिक, आर्थिक तथा क्षेत्रीय कारण जुड़े रहे हैं। इसलिए किसी प्रकार का उग्र परिवर्तन नहीं, बल्कि संवाद, शिक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण ही इसका मार्ग हो सकता है। समाज को जोड़ने का कार्य केवल कानून से नहीं, बल्कि चेतना से होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि संत, समाज सुधारक, वैचारिक संगठन और सांस्कृतिक नेतृत्व एक व्यापक विमर्श प्रारंभ करें — ऐसा विमर्श जो जातीय विद्वेष नहीं, बल्कि वैदिक समरसता की भावना को पुनर्जीवित करे। यदि सनातन समाज स्वयं को हजारों टुकड़ों में बाँटता रहेगा, तो उसकी सांस्कृतिक शक्ति कमजोर होगी; किंतु यदि वह अपनी साझा सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों को केंद्र में रखेगा, तो भारत पुनः विश्व को दिशा देने की स्थिति में खड़ा होगा।
भारत का भविष्य केवल आर्थिक शक्ति बनने में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता स्थापित करने में निहित है। सामाजिक समरसता कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व की आवश्यकता है। संभवतः आने वाले वर्षों में यही विमर्श सनातन समाज के पुनर्जागरण का आधार बनेगा। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सामयिक एवं युग चेतना से सारगर्भित लेख है,यह विचारणीय व स्वागत योग्य है,, ऐसे उत्कृष्ट लेख से आम जनमानस को प्रेरणा प्राप्त करना चाहिए, साथ ही विचार करते हुए,, एक शुद्ध समृद्ध सशक्त राष्ट्र उत्थान की स्वपरिकल्पना करते हुए राष्ट उत्थान के प्रति सजगता से परिपूर्ण स्वयं जगते हुए दूसरों को भी जागृत करते हुए भेद भाव से उपर उठकर देश व राष्ट्र का सकारात्मक विकास करना चाहिए,, यही हम -सब का धर्म होना चाहिए।।
    उत्कृष्ट लेख के लिए साधुवाद ज्ञापित है।।
    भवदीय
    आचार्य सूर्य प्रकाश शुक्ल

    जवाब देंहटाएं
  2. अयं कालचैतन्यपूर्णः अतीव कालगतः संक्षिप्तः लेखः अस्ति । विचारणीयं स्वागतं च कर्तुं योग्यम् अस्ति। एतादृशात् उत्तमलेखात् सामान्यजनाः प्रेरणाम् आकर्षयेयुः। ततश्च चिन्तनकाले शुद्धस्य, समृद्धस्य, दृढस्य च राष्ट्रस्य विकासस्य स्वयमेव कल्पना करणीयम्, राष्ट्रविकासस्य प्रति जागरूकतया आत्मनः जागरणं करणीयम्, अन्येषां अपि जागरणं करणीयम्, भेदभावात् उपरि उत्थाय देशस्य राष्ट्रस्य च सकारात्मकविकासाय कार्यं कर्तव्यम्। एतत् अस्माकं सर्वेषां कर्तव्यं भवेत्।
    अस्य उत्तमस्य लेखस्य कृते धन्यवादः।
    भवतः निश्छलतया
    आचार्य सूर्य प्रकाश शुक्ल

    जवाब देंहटाएं

Post Bottom Ad