जब 64 साल बाद डॉ लोहिया की आत्मा मुस्कुराई, गरीब की बेटी विधानसभा पहुंची - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

शनिवार, 9 मई 2026

जब 64 साल बाद डॉ लोहिया की आत्मा मुस्कुराई, गरीब की बेटी विधानसभा पहुंची

 “रानी बनाम मेहतरानी” से “झाड़ू-पोछा करने वाली बहन” तक : 64 साल बाद  मोदी  ने साकार किया लोहिया का सपना!

सत्येंद्र सिंह "भोलू"(श्री सत्येंद्र सिंह राजनितिक विश्लेषक हैं )

भारतीय राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं है, यह समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सम्मान देने का माध्यम भी है। जब राजनीति वंचित, पीड़ित और श्रमजीवी समाज के हाथों में पहुंचती है, तभी लोकतंत्र अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त करता है। आज पश्चिम बंगाल की एक साधारण घरेलू सहायिका कलिता माझी का विधायक बनना केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा की विजय है। यह उस विचारधारा की जीत है, जिसकी नींव डॉ. राममनोहर लोहिया ने 1962 में रखी थी।


साल 1962 का वह ऐतिहासिक क्षण भारतीय राजनीति में सामाजिक क्रांति का उद्घोष था, जब समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने ग्वालियर की महारानी के खिलाफ एक महिला सफाईकर्मी सुखो रानी को चुनाव मैदान में उतारा था। लोहिया ने इसे “रानी बनाम मेहतरानी” की लड़ाई कहा था। यह केवल चुनाव नहीं था, बल्कि सदियों से दबे-कुचले समाज को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने का वैचारिक आंदोलन था। लोहिया मानते थे कि लोकतंत्र तभी सार्थक होगा, जब समाज का अंतिम व्यक्ति संसद और विधानसभाओं में अपनी आवाज़ बुलंद करेगा।

समय बीतता गया। राजनीति में समाजवाद के नाम पर अनेक दल बने, अनेक नेता उभरे, लेकिन लोहिया का मूल सपना धीरे-धीरे नारों और परिवारवाद की भीड़ में कहीं खोता चला गया। सामाजिक न्याय की बात करने वाले अनेक दल सत्ता तक तो पहुंचे, लेकिन सत्ता आम गरीब, दलित, श्रमिक और वंचित समाज के हाथों में नहीं पहुंच सकी। राजनीति कुछ परिवारों और जातीय समीकरणों तक सीमित होती चली गई।

ऐसे समय में पश्चिम बंगाल से आई कलिता माझी की कहानी भारतीय लोकतंत्र को नई ऊर्जा देती है। दूसरों के घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू-पोछा कर अपने परिवार का पेट पालने वाली यह महिला आज विधानसभा पहुंची है। यह केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं, बल्कि उस भारतीय आत्मा की जीत है जो कहती है कि संघर्ष करने वाला व्यक्ति कभी छोटा नहीं होता।

कलिता माझी की मासिक आय कभी ₹2500 से ₹4500 के बीच थी। वह गुसकरा इलाके में घर-घर काम करती थीं। आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को मरने नहीं दिया। 2021 में हार मिली, लेकिन उन्होंने संघर्ष छोड़ा नहीं। अंततः 2026 में उन्होंने आउसग्राम विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया। यह विजय बताती है कि लोकतंत्र की असली ताकत महलों में नहीं, बल्कि झोपड़ियों में बसती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उन्होंने राजनीति को अभिजात्य वर्ग की कैद से निकालकर सामान्य जन तक पहुंचाने का प्रयास किया। चाहे आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनाना हो, गरीब परिवारों से आए लोगों को मंत्री बनाना हो या फिर कलिता माझी जैसी महिला को विधायक बनने का अवसर देना—यह उस राजनीतिक दर्शन का हिस्सा है, जिसमें “सबका साथ, सबका विकास” केवल नारा नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनता है।

आज विडंबना यह है कि जो लोग स्वयं को लोहियावादी बताते हैं, वे शायद लोहिया के मूल स्वप्न से दूर हो चुके हैं। डॉ. लोहिया केवल सत्ता परिवर्तन नहीं चाहते थे; वे समाज के चरित्र में परिवर्तन चाहते थे। वे चाहते थे कि सफाईकर्मी, मजदूर, किसान और गरीब महिला भी सत्ता के केंद्र में पहुंचे। यदि आज वे जीवित होते और पश्चिम बंगाल की एक घरेलू सहायिका को विधायक बनते देखते, तो शायद वे यही कहते कि राजनीति ने अंततः गरीब की चौखट तक पहुंचने का प्रयास किया है।

भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब संसद और विधानसभाओं में केवल बड़े घरानों की आवाज़ नहीं, बल्कि उन हाथों की आवाज़ भी गूंजेगी जिनमें वर्षों तक झाड़ू, बेलचा और मेहनत की लकीरें रही हैं। कलिता माझी की जीत इस बात का प्रतीक है कि नया भारत अब वंशवाद और विशेषाधिकार की राजनीति से आगे बढ़ रहा है। यह भारत अवसर का भारत है, जहां संघर्ष करने वाला व्यक्ति इतिहास लिख सकता है।

यह केवल भाजपा या किसी एक दल की राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सामाजिक परिपक्वता का संकेत है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुंदरता यही है कि वह एक साधारण महिला को भी विधानसभा के दरवाजे तक पहुंचा सकता है। यही भारत की शक्ति है, यही संविधान की आत्मा है और यही डॉ. लोहिया के सपनों का वास्तविक विस्तार भी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad