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मंगलवार, 12 मई 2026

बचत पर उपहास नहीं, राष्ट्रनिर्माण का शंखनाद है यह!

 बचत पर उपहास नहीं, राष्ट्रनिर्माण का शंखनाद है यह!


जब कोई राष्ट्र युद्ध, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक संघर्षों के दौर से गुजर रहा हो, तब उसके नेतृत्व का पहला कर्तव्य होता है — जनता को आने वाले समय के लिए तैयार करना। परंतु दुर्भाग्य यह है कि भारत में आज एक ऐसा राजनीतिक वर्ग खड़ा हो गया है, जो राष्ट्रहित की हर बात का विरोध केवल इसलिए करता है क्योंकि वह बात नरेंद्र मोदी ने कही है। प्रधानमंत्री ने यदि पेट्रोल बचाने, अनावश्यक खर्च कम करने, ऊर्जा संरक्षण करने, वर्क फ्रॉम होम अपनाने, स्थानीय संसाधनों को बढ़ावा देने और आर्थिक अनुशासन की बात की, तो क्या यह कोई अपराध है? क्या किसी परिवार का मुखिया अपने घर में यह नहीं कहता कि आने वाले समय के लिए बचत करो? क्या वह अपने बच्चों को संकट के लिए तैयार नहीं करता? क्या वह यह चाहता है कि उसका परिवार विपत्ति आने पर दर-दर भटके?
सच यह है कि जो लोग बचत की संस्कृति का उपहास उड़ा रहे हैं, वे भारत की सामाजिक संरचना और आर्थिक वास्तविकताओं से कट चुके हैं। भारत अभी विलासिता का साम्राज्य नहीं, निर्माणाधीन विकसित राष्ट्र है। यह वह समय है जब देश को उपभोगवादी उन्माद नहीं, बल्कि अनुशासन और राष्ट्रीय जिम्मेदारी की आवश्यकता है। आज विश्व की स्थिति देखिए। यूरोप ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। युद्धों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। तेल, खाद्य और तकनीक की आपूर्ति पर दबाव है। ऐसे समय में यदि भारत का नेतृत्व जनता से कहता है कि संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग कीजिए, तो यह दूरदर्शिता है, न कि डर फैलाना।
परंतु भारत में एक “विरोध उद्योग” खड़ा हो चुका है। यदि सरकार आत्मनिर्भरता कहे — विरोध। यदि बचत कहे — विरोध। यदि स्वदेशी कहे — विरोध।यदि सेना की बात करे — विरोध।यदि संस्कृति की बात करे — विरोध।यह विरोध नहीं, मानसिक पराधीनता का प्रदर्शन है।आज स्थिति यह हो गई है कि यदि राहुल गाँधी कोई टिप्पणी कर दें, तो बिना तर्क और विवेक के पूरा राजनीतिक झुंड उसी दिशा में शोर मचाने लगता है। यह लोकतांत्रिक बहस नहीं, भीड़ मानसिकता है। जंगल में पहले एक सियार हुआँ-हुआँ करता है, फिर पूरा झुंड उसी स्वर में चिल्लाने लगता है — आज भारतीय विपक्ष का बड़ा भाग उसी मानसिकता का प्रतीक बन चुका है।
भारत की सभ्यता ने संयम को सद्गुण माना है। हमारे ऋषियों ने कहा —“संग्रह नहीं, संतुलन; उपभोग नहीं, उत्तरदायित्व।”भारतीय परिवारों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी बचत संस्कृति रही है। यही कारण है कि संकट के समय भारतीय समाज पश्चिम की तुलना में अधिक स्थिर रहता है। जिस बचत संस्कृति ने करोड़ों परिवारों को कठिन समय में संभाला, आज उसी का उपहास किया जा रहा है।
यह उपहास केवल आर्थिक अज्ञान नहीं, राष्ट्रीय असंवेदनशीलता भी है।
राष्ट्र निर्माण केवल भाषणों से नहीं होता। उसके लिए अनुशासन चाहिए, त्याग चाहिए, दूरदृष्टि चाहिए। जापान ने युद्ध के बाद अनुशासन से स्वयं को उठाया। चीन ने संसाधनों को नियंत्रित करके अपनी अर्थव्यवस्था खड़ी की। यूरोप ने संकट के समय नागरिक अनुशासन लागू किया। और भारत में यदि बचत की बात हो जाए, तो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को उसमें भी समस्या दिखाई देने लगती है।
दरअसल समस्या बचत की सलाह में नहीं, समस्या उस नेतृत्व से है जिसने भारत को आत्मविश्वास देना शुरू किया है। वर्षों तक जनता को केवल उपभोग, तुष्टिकरण और चुनावी वादों की राजनीति दिखाई गई। पहली बार कोई नेतृत्व नागरिक कर्तव्य, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय अनुशासन की बात कर रहा है। यही बात कुछ लोगों को असहज कर रही है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पंक्तियाँ आज के समय पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं —
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”
आज तटस्थ रहने का समय नहीं है। यह वह समय है जब राष्ट्र को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए समाज को भी जिम्मेदारी निभानी होगी। यदि हम केवल उपभोग और राजनीतिक उपहास में डूबे रहेंगे, तो भविष्य की चुनौतियाँ हमें तैयार पाए बिना आ घेरेंगी। भारत को आज ऐसे नागरिक चाहिए जो समझें कि —ऊर्जा बचाना राष्ट्रसेवा है,अनावश्यक खर्च रोकना आर्थिक राष्ट्रवाद है,स्वदेशी अपनाना आत्मनिर्भरता है,और बचत करना भविष्य की सुरक्षा है।जो लोग इन बातों का मजाक उड़ाते हैं, वे शायद इतिहास की दिशा नहीं समझ पा रहे। दुनिया एक नए आर्थिक और सामरिक संघर्ष के दौर में प्रवेश कर रही है। ऐसे समय में जो राष्ट्र अनुशासित होंगे, वही टिकेंगे।
भारत को शोर नहीं, तैयारी चाहिए।उपहास नहीं, उत्तरदायित्व चाहिए।
और राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति चाहिए। 

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