जान जाए पर हाथ से मोबाइल न जाए!
किशोर, युवा, प्रौढ़ और वृद्ध समाज पर मोबाइल-आसक्ति का बढ़ता राष्ट्रीय संकट
शिशु बिना मोबाइल के न दूध पीता है और नहीँ खांना ही खाता है
वी के त्रिपाठी, संवाददाता, कौटिल्य का भारत
भारत आज तकनीकी क्रांति के युग में खड़ा है। मोबाइल फोन ने जीवन को सरल बनाया, संवाद को तेज किया और संसार को हथेली पर ला दिया। परंतु जिस साधन को सुविधा का माध्यम00 होना चाहिए था, वही अब समाज के बड़े हिस्से पर मानसिक नियंत्रण स्थापित करता दिखाई दे रहा है। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि आज केवल किशोर और युवा ही नहीं, बल्कि प्रौढ़, अधेड़ और स्वस्थ वृद्ध भी मोबाइल-आसक्ति के शिकार बनते जा रहे हैं।सुबह मॉर्निंग वॉक पर जाइए — लोग प्रकृति नहीं, स्क्रीन देख रहे हैं।चाय की दुकानों पर बैठिए — संवाद नहीं, मोबाइल चल रहा है।विद्यालय, कार्यालय, पार्क, अस्पताल, रेल और बस — हर जगह झुकी गर्दनें और चमकती स्क्रीन दिखाई देती हैं।यहाँ तक कि सड़क पार करते समय भी लोग मोबाइल नहीं छोड़ते। मानो जीवन का सबसे बड़ा सत्य अब यही हो गया हो —“जान जाए पर हाथ से मोबाइल न जाए।”यह केवल एक आदत नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है।
मोबाइल: सुविधा से मानसिक निर्भरता तक,मोबाइल कभी मनुष्य की सहायता के लिए बना था, परंतु अब वही मनुष्य की दिनचर्या, सोच और व्यवहार को नियंत्रित करने लगा है।किशोर खेल छोड़ रहे हैं।युवा अध्ययन और लक्ष्य से भटक रहे हैं।प्रौढ़ वर्ग सामाजिक उत्तरदायित्व से दूर होकर घंटों वीडियो और राजनीतिक विवादों में डूबा रहता है।अधेड़ आयु के लोग स्वास्थ्य और परिवार की उपेक्षा कर निरंतर स्क्रीन पर लगे रहते हैं।यहाँ तक कि स्वस्थ वृद्ध भी अब परिवार से संवाद कम और मोबाइल पर समय अधिक बिताने लगे हैं।
पहले घरों में चौपाल जैसी चर्चा होती थी, अब एक ही कमरे में बैठे लोग भी अलग-अलग मोबाइल संसार में खोए रहते हैं।वृद्धावस्था में बढ़ती डिजिटल एकाकीपन की समस्यामोबाइल का अत्यधिक उपयोग वृद्धों में भी एक नया सामाजिक संकट पैदा कर रहा है।जो बुजुर्ग कभी परिवार को अनुभव और संस्कार देते थे, वे अब घंटों व्हाट्सऐप फॉरवर्ड, यूट्यूब वीडियो और निरर्थक सामग्री में उलझे रहते हैं। इससे शारीरिक निष्क्रियता, मानसिक तनाव और सामाजिक दूरी बढ़ रही है।कई वृद्ध अब वास्तविक संवाद से अधिक “ऑनलाइन सक्रियता” को महत्व देने लगे हैं। यह स्थिति पारिवारिक संबंधों को भी कमजोर कर रही है।
सड़क दुर्घटनाएँ और मोबाइल,आज सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण मोबाइल बन चुका है।चलते समय मोबाइल देखना, वाहन चलाते हुए कॉल करना, बाइक पर रील बनाना — यह सब सामान्य दृश्य हो गए हैं।लोग ट्रैफिक से अधिक नोटिफिकेशन पर ध्यान देते हैं।मोबाइल के कारण ध्यान क्षमता घट रही है और मनुष्य वास्तविक दुनिया से कटता जा रहा है। यह केवल व्यक्तिगत जोखिम नहीं, सार्वजनिक सुरक्षा का भी विषय है।
मानसिक और सामाजिक दुष्प्रभाव,मोबाइल-आसक्ति ने मनुष्य के धैर्य, स्मरण शक्ति और संवेदनशीलता को प्रभावित किया है।बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है।युवाओं में अवसाद और अकेलापन बढ़ रहा है।प्रौढ़ों में तनाव और क्रोध बढ़ रहा है।वृद्धों में सामाजिक अलगाव बढ़ रहा है।रील संस्कृति ने गंभीर चिंतन की क्षमता को कमजोर किया है। कुछ सेकंड के मनोरंजन ने घंटों के अध्ययन और आत्ममंथन की संस्कृति को पीछे धकेल दिया है।राष्ट्रीय दृष्टि से चुनौतीयदि किसी राष्ट्र की युवा शक्ति लक्ष्यहीन हो जाए, प्रौढ़ वर्ग सामाजिक चेतना खो दे और वृद्ध वर्ग अनुभव की भूमिका छोड़कर डिजिटल संसार में खो जाए, तो राष्ट्र का सांस्कृतिक संतुलन कमजोर होने लगता है।
भारत केवल तकनीकी शक्ति बनकर महान नहीं बनेगा।भारत तब महान बनेगा जब तकनीक मनुष्य के नियंत्रण में होगी, न कि मनुष्य तकनीक के नियंत्रण में।आज आवश्यकता “डिजिटल अनुशासन” की है।परिवारों को मोबाइल-मुक्त संवाद का समय तय करना होगा।विद्यालयों को बच्चों में अध्ययन, खेल और पुस्तक संस्कृति विकसित करनी होगी।समाज को यह समझना होगा कि मोबाइल उपयोग आवश्यक है, परंतु मोबाइल-निर्भरता विनाशकारी है।
मोबाइल आधुनिक जीवन का आवश्यक साधन है, लेकिन उसका अंधाधुंध उपयोग समाज को भीतर से खोखला कर सकता है।किशोर, युवा, प्रौढ़, अधेड़ और वृद्ध — सभी को डिजिटल संतुलन सीखना होगा।हाथ में मोबाइल होना समस्या नहीं है,समस्या तब शुरू होती है जब मोबाइल मनुष्य के मन, समय और जीवन पर अधिकार कर लेता है।

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