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मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

“जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः…” — ज्ञान, सत्ता और पतन का शाश्वत सत्य

 कौटिल्य उवाच | संपादकीय
“जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः…” — ज्ञान, सत्ता और पतन का शाश्वत सत्य!





मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसे वाक्य हैं, जो समय की सीमाओं को लाँघकर हर युग के लिए चेतावनी बन जाते हैं। महाभारत का यह प्रसिद्ध वाक्य—
“जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः, जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः।”
केवल एक पात्र की स्वीकारोक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य की उस आंतरिक विडंबना का उद्घाटन है, जहाँ ज्ञान और आचरण के बीच गहरी खाई उत्पन्न हो जाती है।
जब श्रीकृष्ण शांति-दूत बनकर दुर्योधन के दरबार में पहुँचे, तब यह अपेक्षा थी कि संवाद से युद्ध टल जाएगा। परंतु दुर्योधन की प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया कि समस्या अज्ञान की नहीं, बल्कि प्रवृत्ति की है। उसे धर्म का ज्ञान था, पर उसमें रुचि नहीं थी; उसे अधर्म का बोध था, पर उससे विरक्ति नहीं थी। यही वह क्षण था, जब इतिहास ने यह स्वीकार कर लिया कि जब मनुष्य अपनी प्रवृत्तियों का दास बन जाता है, तब ज्ञान भी उसे पतन से नहीं बचा सकता।
 ज्ञान और प्रवृत्ति का द्वंद्व#मनुष्य का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि वह सत्य को नहीं जानता; बल्कि यह है कि वह जानकर भी उसे अपनाने का साहस नहीं करता। यह द्वंद्व केवल महाभारत के पात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक युग में, प्रत्येक समाज में और विशेषतः सत्ता के गलियारों में बार-बार प्रकट होता है।
आज का राजनीतिक परिदृश्य भी इसी मानसिकता का दर्पण बन चुका है। संविधान, कानून, नैतिकता—ये सब केवल पुस्तकीय शब्द नहीं हैं; ये उस सामाजिक अनुबंध के स्तंभ हैं, जिन पर राष्ट्र की स्थिरता टिकी होती है। फिर भी जब नेता और दल इन सिद्धांतों को जानते हुए भी उनके विपरीत आचरण करते हैं, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या ज्ञान की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति की है। राजनीति, जो मूलतः लोकसेवा का माध्यम होनी चाहिए, धीरे-धीरे स्वार्थ और सत्ता-संतुलन का खेल बन जाती है। यहाँ निर्णय सिद्धांतों से नहीं, बल्कि समीकरणों से लिए जाते हैं; यहाँ नीति का स्थान रणनीति ले लेती है, और आदर्श केवल चुनावी भाषणों तक सीमित रह जाते हैं। यही वह बिंदु है, जहाँ दुर्योधन की मानसिकता आधुनिक रूप धारण कर लेती है।
 धर्म का वास्तविक अर्थ और उसका क्षरण#भारतीय परंपरा में “धर्म” का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें न्याय, कर्तव्य, संतुलन और लोकहित समाहित हैं। धर्म वह है, जो समाज को जोड़ता है, जो व्यक्ति को उसके दायित्वों का बोध कराता है, और जो सत्ता को मर्यादित रखता है।
जब धर्म का यह व्यापक स्वरूप राजनीति से विलुप्त होने लगता है, तब सत्ता निरंकुश हो जाती है। निर्णय जनहित के बजाय व्यक्तिगत लाभ और तात्कालिक फायदे के आधार पर लिए जाने लगते हैं। परिणामस्वरूप समाज में असंतुलन उत्पन्न होता है—अविश्वास बढ़ता है, व्यवस्था कमजोर होती है, और अंततः संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। महाभारत का युद्ध केवल हस्तिनापुर की सत्ता के लिए नहीं था; वह धर्म और अधर्म के बीच अंतिम टकराव था। यह युद्ध उस समय अपरिहार्य हो गया, जब संवाद की संभावना समाप्त हो गई और नैतिकता को जानबूझकर दरकिनार कर दिया गया। यह हमें यह सिखाता है कि जब सत्ता अपने दायित्वों से विमुख हो जाती है, तब संघर्ष अनिवार्य हो जाता है।
 आधुनिक राजनीति में दुर्योधन की प्रतिध्वनि#आज के समय में यह प्रश्न उठता है कि क्या हम उस ऐतिहासिक चेतावनी से कुछ सीख पाए हैं? दुर्भाग्यवश, अनेक उदाहरण यह संकेत देते हैं कि दुर्योधन की मानसिकता आज भी जीवित है—केवल रूप बदल गया है।नेताओं को यह ज्ञात है कि पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय ही लोकतंत्र की आत्मा हैं। उन्हें यह भी पता है कि भ्रष्टाचार, भेदभाव और तुष्टिकरण समाज को विभाजित करते हैं। फिर भी जब इन कुरीतियों को जानबूझकर अपनाया जाता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या बाहरी नहीं, आंतरिक है।यह स्थिति केवल राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं है; यह समाज के उस वर्ग तक भी फैली हुई है, जो इन प्रवृत्तियों को सहन करता है या मौन समर्थन देता है। जब समाज स्वयं अपने मूल्यों के प्रति उदासीन हो जाता है, तब सत्ता को भी अपने आचरण में सुधार की आवश्यकता महसूस नहीं होती।
 समाज की भूमिका: मौन या प्रतिरोध?इतिहास यह बताता है कि परिवर्तन केवल सत्ता के शीर्ष से नहीं आता; वह समाज की चेतना से उत्पन्न होता है। जब जनता प्रश्न करना बंद कर देती है, जब वह अन्याय को सामान्य मानने लगती है, तब अधर्म को खुला मैदान मिल जाता है। महाभारत का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि तटस्थता भी एक प्रकार का अपराध है। भीष्म, द्रोण जैसे महान व्यक्तित्व भी अपनी तटस्थता और बंधनों के कारण अधर्म का प्रतिरोध नहीं कर पाए। परिणामस्वरूप, उन्हें भी उस विनाश का साक्षी बनना पड़ा, जिसे वे रोक सकते थे।आज के संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है—क्या हम केवल दर्शक बने रहेंगे, या सक्रिय नागरिक बनकर अपने अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे? लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है; यह निरंतर जागरूकता और सहभागिता की मांग करता है
 नैतिक साहस: परिवर्तन की कुंजी#
दुर्योधन की त्रासदी यह थी कि उसमें नैतिक साहस का अभाव था। वह सत्य को जानता था, पर उसे स्वीकार करने का साहस नहीं था। यही स्थिति आज भी अनेक स्तरों पर दिखाई देती है—जहाँ व्यक्ति अपने स्वार्थ, भय या लालच के कारण सही निर्णय लेने से बचता है।परिवर्तन के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है; उसके लिए साहस की आवश्यकता होती है। यह साहस ही व्यक्ति को भीड़ से अलग खड़ा होने की शक्ति देता है, यह साहस ही उसे सत्य के पक्ष में बोलने का आत्मविश्वास देता है।जब तक यह नैतिक साहस समाज में व्यापक रूप से विकसित नहीं होगा, तब तक केवल नीतियाँ और कानून भी अपेक्षित परिवर्तन नहीं ला पाएंगे।
 इतिहास की चेतावनी और भविष्य की दिशा#महाभारत केवल अतीत की कथा नहीं है; यह वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक है। यह हमें यह सिखाता है कि जब ज्ञान और आचरण के बीच दूरी बढ़ जाती है, तब विनाश अवश्यंभावी हो जाता है।
आज आवश्यकता है कि हम इस दूरी को कम करें—ज्ञान को आचरण में परिवर्तित करें,सिद्धांतों को व्यवहार में उतारेंऔर धर्म को केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का आधार बनाएं.
राजनीति में यह परिवर्तन तब आएगा, जब समाज इसकी मांग करेगा। जब नागरिक अपने नेताओं से केवल वादे नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की अपेक्षा करेंगे; जब वे प्रश्न पूछेंगे, जवाब मांगेंगे और आवश्यक होने पर विरोध भी करेंगे।

 कौटिल्य की चेतावनी#“जानामि धर्मं…” केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि एक दर्पण है—जिसमें हम अपने समय की वास्तविकता को देख सकते हैं। यह हमें यह याद दिलाता है कि ज्ञान का कोई मूल्य नहीं, यदि वह आचरण में न उतरे।आज का युग उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ निर्णय हमें करना है—क्या हम दुर्योधन की तरह ज्ञान के बावजूद अधर्म का मार्ग चुनेंगे,या साहस के साथ धर्म की ओर प्रवृत्त होंगे?
 कौटिल्य उवाच:#“जब सत्ता धर्म से विमुख होती है, तो विनाश केवल समय का प्रश्न रह जाता है;और जब समाज जागृत होता है, तो परिवर्तन भी अवश्यंभावी हो जाता है।” 

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