दुर्गाष्टमी पर विशेष, राजेंद्र नाथ तिवारी, 26 मार्च, 26,समय, 10.26
“शक्ति का शंखनाद: क्यों आज भी प्रासंगिक है दुर्गा सप्तशती?”
भारतीय सभ्यता केवल इतिहास नहीं, एक जीवित चेतना है—एक ऐसी चेतना, जो समय-समय पर स्वयं को पुनः जागृत करती है। जब-जब समाज दिशाहीन होता है, जब-जब राष्ट्र अपने आत्मविश्वास को खोने लगता है, तब-तब हमारी परंपरा के कुछ ग्रंथ प्रकाशस्तंभ बनकर सामने आते हैं। दुर्गा सप्तशती ऐसा ही एक अद्भुत ग्रंथ है—जो केवल देवी की आराधना नहीं, बल्कि शक्ति के दर्शन, संघर्ष के सिद्धांत और विजय के मार्ग का उद्घोष करता है। आज का भारत, जो एक ओर वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है और दूसरी ओर वैचारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है—उसके लिए दुर्गा सप्तशती केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक “रणनीतिक दर्शन” बनकर उभरती है।
शक्ति: भारत का मूल तत्व, जिसे हमने भुला दिया@भारतीय दर्शन में “शक्ति” का अर्थ केवल बल नहीं है। यह वह ऊर्जा है जो सृष्टि को गति देती है। दुर्गा सप्तशती स्पष्ट कहती है—शक्ति के बिना शिव भी “शव” हैं।
यह कथन केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ भी है।आज भारत में—
ज्ञान है, पर निर्णायकता का अभाव,जनसंख्या है, पर संगठन की कमी,संस्कृति है, पर आत्मविश्वास की कमी यही कारण है कि अनेक बार सत्य होते हुए भी हम निर्णायक नहीं हो पाते।
दुर्गा सप्तशती हमें याद दिलाती है—सत्य को स्थापित करने के लिए शक्ति आवश्यक है।
महिषासुर: केवल एक राक्षस नहीं, एक प्रवृत्ति@महिषासुर की कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं है।यह उस मानसिकता का प्रतीक है जो—सत्ता पाकर अहंकारी हो जाती है,धर्म और मर्यादा को तुच्छ समझती है,समाज को भय और भ्रम में रखती है,आज के संदर्भ में देखें तो—भ्रष्टाचार,वैचारिक आतंकवाद,सांस्कृतिक विघटन—ये सभी “आधुनिक महिषासुर” हैं।दुर्गा सप्तशती हमें सिखाती है कि इनसे संवाद नहीं, संकल्प और संहार की आवश्यकता होती है।
रक्तबीज: बुराई का वह रूप जो बढ़ता ही जाता है@रक्तबीज की कथा अत्यंत गूढ़ है। उसका हर रक्तकण एक नया राक्षस उत्पन्न करता है। यह आज के युग की सबसे बड़ी समस्या का प्रतीक है—झूठी खबरें (Fake Narratives)विभाजनकारी विचारधाराएँ,राष्ट्रविरोधी एजेंडा,आप एक को समाप्त करते हैं, दस और खड़े हो जाते हैं। देवी ने इसका समाधान क्या दिया?समूल नाश—जड़ से समाप्त करना।यह संदेश स्पष्ट है—आधे-अधूरे उपाय समस्याओं को और बढ़ाते हैं।
नारी नहीं, शक्ति: भारतीय दृष्टि की विशिष्टता@पश्चिमी विमर्श “महिला सशक्तिकरण” की बात करता है,
पर दुर्गा सप्तशती उससे कहीं आगे जाकर कहती है—नारी स्वयं शक्ति है, उसे सशक्त करने की नहीं, पहचानने की आवश्यकता है। देवता भी संकट में देवी की शरण लेते हैं,युद्ध का नेतृत्व देवी करती हैं विजय का श्रेय देवी को ही मिलता है आज भारत को आवश्यकता है—स्त्री को “संरक्षण” से निकालकर “नेतृत्व” देने की उसे केवल अधिकार नहीं, निर्णय की शक्ति देने की.
सहिष्णुता बनाम दुर्बलता: एक खतरनाक भ्रम@भारत ने सदियों से सहिष्णुता को अपनाया है।
परंतु समस्या तब शुरू होती है जब सहिष्णुता “दुर्बलता” में बदल जाती है।दुर्गा सप्तशती स्पष्ट कहती है—
पहले समझाओ,फिर चेतावनी दो,और अंत में—यदि आवश्यक हो, तो संहार करो,यह “धर्म” का संतुलित रूप है।आज भारत के लिए यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है—जो राष्ट्र केवल सहता है, वह अंततः मिट जाता है।जो राष्ट्र संतुलित प्रतिकार करता है, वही टिकता है।
आंतरिक युद्ध: सबसे बड़ा रणक्षेत्र@ दुर्गा सप्तशती का सबसे गूढ़ पक्ष यह है कि यह केवल बाहरी युद्ध की बात नहीं करती, बल्कि व्यक्ति के भीतर चल रहे संघर्ष को भी उजागर करती है।हर व्यक्ति के भीतर—आलस्य (मधु-कैटभ)अहंकार (महिषासुर)लोभ और वासना (शुंभ-निशुंभ) इनसे लड़ने के लिए किसी बाहरी सेना की नहीं,आंतरिक “दुर्गा” को जागृत करने की आवश्यकता है।आज का युवा यदि इस सत्य को समझ ले, तो वह न केवल सफल होगा, बल्कि समाज का मार्गदर्शक भी बनेगा।
राष्ट्र निर्माण में दुर्गा सप्तशती की भूमिका@यदि दुर्गा सप्तशती के सिद्धांतों को राष्ट्र निर्माण में लागू किया जाए, तो—शिक्षा में आत्मगौरव आएगा,राजनीति में निर्णायकता आएगी,समाज में संतुलन आएगा और राष्ट्र में आत्मविश्वास जागृत होगा यह ग्रंथ हमें सिखाता है—राष्ट्र केवल नीतियों से नहीं, चेतना से बनता है।
@ समय आ गया है “दुर्गा” को पुनः जगाने का-आज का भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।एक ओर अवसर है—विश्वगुरु बनने का,और दूसरी ओर खतरा है—आंतरिक विघटन का।ऐसे समय में दुर्गा सप्तशती केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक “राष्ट्रधर्म” का घोष है।यह हमें पुकार रही है—उठो, अपनी शक्ति पहचानो,अन्याय के विरुद्ध खड़े हो जाओ,और धर्म की स्थापना के लिए संकल्पित हो जाओ,
क्योंकि जब समाज सो जाता है, तब राक्षस जागते हैं।और जब समाज जागता है, तब “दुर्गा” प्रकट होती हैं।

उत्तम लेख है ।दुर्गा सप्तशती आज भी सामयिक है ।ये एक धार्मिक ग्रन्थ ही नहीं वरन तमाम सत असत प्रवृत्तियों के बारे में विचार करने व उससे उबरने के एक महान साधन है ।
जवाब देंहटाएंजय माँ दुर्गे 💐💐💐💐💐