ईद, मौसम और प्रशासनिक निष्क्रियता के बीच उभरा जनसंकल्प — मनोरमा सफाई अभियान बना जनशक्ति का प्रतीक
कौटिल्य का भारत संवाददाता, वी के त्रिपाठी
बस्ती। ईद के पावन पर्व और प्रतिकूल मौसम जैसी चुनौतियों के बावजूद मनोरमा नदी की सफाई के लिए चल रहा जनअभियान एक नई सामाजिक चेतना का संकेत दे रहा है। भाजपा नेता एवं समाजसेवी चन्द्रमणि पाण्डेय ‘सुदामा’ द्वारा अकेले प्रारंभ किया गया यह प्रयास अब व्यापक जनसहभागिता में परिवर्तित हो चुका है। अभियान के चौथे दिन जिस प्रकार बड़ी संख्या में स्थानीय लोग स्वतः जुड़ते गए, वह इस बात का प्रमाण है कि समाज अपनी प्राकृतिक धरोहरों के प्रति अब अधिक सजग और उत्तरदायी हो रहा है।
नदी के जल में दिखाई दे रही स्पष्ट स्वच्छता इस जनआंदोलन की प्रारंभिक सफलता को दर्शाती है। यह केवल सफाई का कार्य नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर पर्यावरणीय चेतना और सामूहिक उत्तरदायित्व का सशक्त उदाहरण बनता जा रहा है।
हालांकि, इस सकारात्मक पहल के समानांतर प्रशासनिक निष्क्रियता भी उतनी ही स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई है। लगातार चार दिनों तक अभियान चलने के बावजूद जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की अनुपस्थिति ने कई प्रश्न खड़े किए हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि जनहित से जुड़े मुद्दों पर सरकारी तंत्र की प्राथमिकताएं कहीं न कहीं कमजोर पड़ रही हैं।
चन्द्रमणि पाण्डेय ‘सुदामा’ द्वारा उठाए गए सवाल इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। यदि वास्तव में वर्षों से मनोरमा नदी की सफाई के लिए कोई बजट आवंटित नहीं हुआ है, तो यह एक गंभीर प्रशासनिक विफलता है। वहीं, यदि बजट की कमी है, तो अस्थायी और तात्कालिक उपायों के माध्यम से कम से कम घाटों, पौराणिक स्थलों और मेला क्षेत्रों की सफाई सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है।
यह भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने नदी को घाघरा से जोड़ने जैसी दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता पर बल दिया है, जो यदि साकार होती है तो क्षेत्र के पर्यावरण और जल प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकती है।
अभियान के चौथे दिन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि यह प्रयास अब व्यक्तिगत पहल से आगे बढ़कर सामूहिक आंदोलन का रूप लेने लगा है। पंडूलघाट पर चल रहे सफाई कार्य के समापन के बाद प्रस्तावित बैठक इस अभियान को संगठित दिशा देने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
, मनोरमा सफाई अभियान यह स्पष्ट करता है कि जब समाज स्वयं जागरूक होता है, तो सीमित संसाधनों के बावजूद परिवर्तन संभव है। लेकिन स्थायी समाधान के लिए प्रशासनिक सहयोग और ठोस नीतिगत पहल अनिवार्य है। जनसंकल्प और शासन के समन्वय से ही मनोरमा जैसी नदियों का वास्तविक पुनर्जीवन संभव हो

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें