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रविवार, 22 मार्च 2026

संगठन में आरएसएस, राजनीति में भाजपा : संवेदनशील संस्कृति और राष्ट्रवाद का एकात्म दर्शन

 संगठन में आरएसएस, राजनीति में भाजपा : संवेदनशील संस्कृति और राष्ट्रवाद का एकात्म दर्शन




राजेंद्र नाथ तिवारी, मुख्य सम्पादक, कौटिल्यकाभारत, सम्पादकीय, 22मार्च 26,समय, 7.03

गीता के 10वें अध्याय (विभूति योग) में कृष्ण कहते हैं कि "सृष्टि में जो कुछ भी श्रेष्ठ, ओजस्वी और प्रभावशाली है, वह मेरा ही अंश है।" इस तर्क से, यदि कोई संगठन या दल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या 'राष्ट्र-प्रथम' के विचार को सर्वोपरि मानता है, तो एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उसे उसी एक व्यापक चेतना का हिस्सा माना जा सकता है जो धर्म (कर्तव्य) की स्थापना के लिए कार्यरत है

भारत केवल एक भू-भाग का नाम नहीं है; यह एक जीवंत सभ्यता, एक सतत प्रवाहित संस्कृति और एक महान राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। हजारों वर्षों से भारत की आत्मा उसकी संस्कृति, अध्यात्म और समाज को जोड़ने वाली संगठनात्मक शक्ति में निहित रही है। जब कोई कहता है—“संगठन में मैं आरएसएस हूँ और पार्टियों में मैं भाजपा हूँ”, तो यह केवल एक राजनीतिक कथन नहीं होता, बल्कि यह उस व्यापक वैचारिक परंपरा का उद्घोष होता है जिसमें राष्ट्र, संस्कृति और समाज एकात्म भाव से जुड़े हुए हैं।

भारत की राष्ट्रीय चेतना का निर्माण केवल राजनीतिक सत्ता से नहीं हुआ है। इसके पीछे संतों, ऋषियों, समाज सुधारकों और संगठनों की दीर्घ परंपरा रही है। इसी परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उदय हुआ। यह संगठन किसी सत्ता या पद की आकांक्षा से नहीं, बल्कि समाज के चरित्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता की भावना को जागृत करने के उद्देश्य से स्थापित हुआ था। आरएसएस ने अपने प्रारंभ से ही यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्र निर्माण का आधार केवल सरकार नहीं, बल्कि संगठित और जागरूक समाज होता है।

आरएसएस की शाखाओं में किसी व्यक्ति को केवल शारीरिक प्रशिक्षण नहीं दिया जाता, बल्कि उसे अनुशासन, सेवा, त्याग और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना सिखाई जाती है। यही कारण है कि इस संगठन ने समाज के हर क्षेत्र में ऐसे कार्यकर्ताओं को तैयार किया जो व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हैं। जब कोई स्वयंसेवक यह कहता है कि “संगठन में मैं आरएसएस हूँ”, तो इसका अर्थ यह होता है कि वह व्यक्ति स्वयं को एक बड़े राष्ट्रीय परिवार का अंग मानता है।

दूसरी ओर, लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारों को नीति और शासन में रूपांतरित करने के लिए राजनीतिक मंच की आवश्यकता होती है। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए Bharatiya Janata Party एक ऐसी राजनीतिक शक्ति के रूप में सामने आई जिसने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद और विकास के समन्वय को अपनी विचारधारा का आधार बनाया। भाजपा केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है जिसका लक्ष्य भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक विकास की दिशा में देश को आगे बढ़ाना है।

इस वैचारिक आधार को समझने के लिए हमें दीनदयाल उपाध्याय के प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन को समझना होगा। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने स्पष्ट कहा था कि भारत की प्रगति पश्चिमी भौतिकवाद की नकल से नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक चेतना के अनुरूप विकास मॉडल से ही संभव है। एकात्म मानव दर्शन का मूल विचार यह है कि व्यक्ति, समाज, प्रकृति और राष्ट्र एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि इन चारों के बीच संतुलन बना रहे, तभी वास्तविक विकास संभव है।

आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है और वैश्वीकरण के प्रभाव में कई समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान खोते जा रहे हैं, तब भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहे। यही वह बिंदु है जहाँ संवेदनशील संस्कृति और राष्ट्रवाद का समन्वय अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

संवेदनशीलता का अर्थ केवल भावुकता नहीं है; इसका अर्थ है समाज के हर वर्ग की पीड़ा को समझना और उसके समाधान के लिए प्रयास करना। जब राष्ट्रवाद संवेदनशीलता से जुड़ता है, तब वह आक्रामकता नहीं बनता, बल्कि सेवा और समर्पण का माध्यम बन जाता है। यही वह राष्ट्रवाद है जो भारत की परंपरा में दिखाई देता है—जहाँ राष्ट्र को केवल राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परिवार माना जाता है।

भारतीय संस्कृति की यही विशेषता रही है कि उसने विविधताओं को संघर्ष का कारण नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें एकता का आधार बनाया। यहाँ भाषा, वेशभूषा, परंपराएँ और रीति-रिवाज भिन्न हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना सबको एक सूत्र में बाँधती है। यही कारण है कि भारत हजारों वर्षों की ऐतिहासिक चुनौतियों के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में सफल रहा।

यदि हम भारतीय दर्शन और इतिहास को देखें, तो पाएँगे कि यहाँ नेतृत्व का आदर्श सदैव कर्तव्य और धर्म से जुड़ा रहा है। जब हम योगेश्वर की बात करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से स्मरण आता है Krishna का, जिन्होंने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को यह संदेश दिया था कि जीवन का सर्वोच्च धर्म है—कर्तव्य का पालन। श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि जब समाज और राष्ट्र संकट में हों, तब निष्क्रियता नहीं, बल्कि धर्म और कर्तव्य के लिए सक्रियता आवश्यक है।

यदि आज के संदर्भ में उस संदेश को समझा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्र निर्माण के लिए केवल भावनाएँ पर्याप्त नहीं होतीं; इसके लिए संगठन, विचार और राजनीतिक नेतृत्व—तीनों का समन्वय आवश्यक होता है। यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि संगठन में वह आरएसएस है और राजनीति में भाजपा, तो वह मूलतः उसी समन्वय की बात कर रहा होता है।

यह विचारधारा इस विश्वास पर आधारित है कि भारत की शक्ति उसकी संस्कृति और समाज में निहित है। यदि समाज संगठित और जागरूक होगा, तो राजनीति भी राष्ट्रहित की दिशा में आगे बढ़ेगी। लेकिन यदि समाज विखंडित और दिशाहीन होगा, तो कोई भी राजनीतिक व्यवस्था राष्ट्र को मजबूत नहीं बना सकती।

आज भारत एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रहा है। आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक पहचान भी विश्व में नई प्रतिष्ठा प्राप्त कर रही है। यह केवल सरकार की नीतियों का परिणाम नहीं है, बल्कि समाज की उस चेतना का परिणाम है जो अपनी परंपराओं और मूल्यों पर गर्व करना सीख रही है।

ऐसे समय में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि राष्ट्रवाद को संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठाकर व्यापक सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से देखा जाए। राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ है—राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के सम्मान, सुरक्षा और विकास के लिए कार्य करना। जब यह भावना संस्कृति और संवेदनशीलता से जुड़ती है, तब वह समाज को जोड़ने वाली शक्ति बन जाती है।

भारत का भविष्य केवल आर्थिक शक्ति बनने में नहीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता के रूप में उभरने में है जो दुनिया को संतुलन, सह-अस्तित्व और मानवता का मार्ग दिखा सके। इसके लिए आवश्यक है कि संगठनात्मक शक्ति, सांस्कृतिक चेतना और राजनीतिक नेतृत्व एक दूसरे के पूरक बनकर कार्य करें।

अंततः यह कहा जा सकता है कि “संगठन में आरएसएस और राजनीति में भाजपा” का भाव किसी व्यक्ति या दल तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि का प्रतीक है जिसमें भारत की संस्कृति, संवेदनशीलता और राष्ट्रवाद एकात्म भाव से जुड़े हुए हैं। यही वह मार्ग है जो भारत को केवल एक शक्तिशाली राष्ट्र ही नहीं, बल्कि विश्व के लिए मार्गदर्शक सभ्यता बनने की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।

और शायद यही वह संदेश है जिसे यदि आज योगेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं कहते, तो उनके शब्दों का सार यही होता—कर्तव्य, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति समर्पण ही सच्चा धर्म है, और जब समाज संगठित होकर इस धर्म का पालन करता है, तभी राष्ट्र महान बनता है। 

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