ईरान का सच और भारत के भ्रमित समर्थक
आज जब पश्चिम एशिया की राजनीति में ईरान केंद्र में है, तब भारत के भीतर कुछ लोग उसके समर्थन में बयान देते दिखाई दे रहे हैं। यह वही लोग हैं जो हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे को वैचारिक चश्मे से देखते हैं, न कि भारत के राष्ट्रीय हित से।लेकिन इतिहास का एक असुविधाजनक सच है -ईरान कभी भी भारत का वास्तविक मित्र नहीं रहा।
जब भी पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध आतंकवाद का सहारा लिया, तब ईरान का रुख शायद ही कभी स्पष्ट रूप से भारत के पक्ष में दिखाई दिया। कई अवसरों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान ने वही भाषा बोली जो पाकिस्तान बोलता रहा।विशेषकर ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) के मंच पर कश्मीर के प्रश्न पर ईरान का रुख अक्सर पाकिस्तान के करीब दिखाई देता रहा है। भारत के खिलाफ प्रस्तावों और आलोचनाओं में वह कभी भी खुलकर भारत के साथ खड़ा नहीं हुआ।
यह भी याद रखना चाहिए कि जब भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की—चाहे वह सीमापार आतंकी ढांचे के विरुद्ध हो या कश्मीर में सुरक्षा अभियान—तब भी ईरान ने भारत के समर्थन में कोई ठोस आवाज़ नहीं उठाई। इसके विपरीत भारत ने दशकों तक ईरान के साथ संबंध बनाए रखे। ऊर्जा व्यापार किया, और चाबहार बंदरगाह जैसी रणनीतिक परियोजनाओं में निवेश भी किया।
भारत ने हमेशा व्यवहारिक कूटनीति निभाई, लेकिन ईरान ने कई बार अपने वैचारिक और क्षेत्रीय समीकरणों को प्राथमिकता दी।आज प्रश्न यह है कि जब इतिहास इतना स्पष्ट है, तब भारत के कुछ लोग ईरान के पक्ष में भावनात्मक समर्थन क्यों दे रहे हैं?
विदेश नीति भावनाओं से नहीं चलती।:राष्ट्र अपने हित, सुरक्षा और दीर्घकालिक रणनीति के आधार पर निर्णय लेते हैं।भारत को भी यही करना चाहिए-न किसी के अंध समर्थन में खड़ा होना,न किसी के भ्रम में पड़ना।
कूटनीति का पहला सिद्धांत यही है कि मित्र वही है जो संकट के समय आपके साथ खड़ा हो।और इस कसौटी पर देखें तो भारत को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि ईरान कभी उसका स्वाभाविक शुभचिंतक रहा है।

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