चलती बस, टूटा फ़र्श और टूटी व्यवस्था: एक मासूम की मौत का जिम्मेदार कौन?
लखनऊ
उत्तर प्रदेश में एक दर्दनाक घटना ने फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे स्कूल केवल शिक्षा के केंद्र हैं या लापरवाही के अड्डे बनते जा रहे हैं। खबर के अनुसार चलती स्कूल बस के फ़र्श से नीचे गिरने के कारण एक सात वर्ष की मासूम बच्ची की मौत हो गई। यह कोई दुर्घटना मात्र नहीं, बल्कि व्यवस्था की घोर विफलता का उदाहरण है।जब एक स्कूल बस का फ़र्श ही सुरक्षित न हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उस बस को सड़क पर चलने की अनुमति किसने दी? यह केवल विद्यालय की लापरवाही नहीं, बल्कि परिवहन विभाग की भी गंभीर जिम्मेदारी है।
विद्यालय की पहली जिम्मेदारी=हर अभिभावक अपने बच्चे को स्कूल भेजते समय यह विश्वास करता है कि विद्यालय उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाएगा। लेकिन जब स्कूल बस का फ़र्श तक जर्जर हो, तो यह स्पष्ट संकेत है कि विद्यालय प्रबंधन ने बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी।स्कूलों के लिए यह अनिवार्य है कि वे बसों की नियमित जांच कराएं, ड्राइवर और परिचालक की नियुक्ति सही तरीके से करें, और वाहन की तकनीकी स्थिति का ध्यान रखें। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई जगहों पर स्कूल बसें केवल कागजों पर फिट होती हैं, सड़क पर नहीं।
परिवहन विभाग की भूमिका=इस घटना के बाद परिवहन विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि बस इतनी खराब स्थिति में थी कि उसका फ़र्श ही टूट गया, तो फिर उसे फिटनेस प्रमाणपत्र कैसे मिला?परिवहन विभाग का दायित्व केवल कागजों पर मुहर लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। सड़क पर चलने वाले हर स्कूल वाहन की वास्तविक जांच होना आवश्यक है। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।
व्यवस्था की मौन स्वीकृति=इस प्रकार की दुर्घटनाएँ अचानक नहीं होतीं। इनके पीछे वर्षों से चली आ रही लापरवाही, ढीली निगरानी और प्रशासनिक उदासीनता होती है।जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं होती, तब तक न विद्यालय जागता है और न ही प्रशासन। और जब हादसा हो जाता है, तब कुछ दिन तक कार्रवाई की बातें होती हैं, फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है।
समाधान क्या है=इस समस्या का समाधान केवल संवेदना व्यक्त करने से नहीं होगा। इसके लिए ठोस कदम आवश्यक हैं—सभी स्कूल बसों की तत्काल तकनीकी जांच,दोषी विद्यालय प्रबंधन पर कठोर कार्रवाईप,रिवहन विभाग की जवाबदेही तय,हर बस में सुरक्षा मानकों का अनिवार्य पालन हो
एक सात वर्ष की बच्ची की मौत केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दर्द है। यह हमें याद दिलाती है कि जब व्यवस्था सो जाती है, तब मासूम जानें इसकी कीमत चुकाती हैं।
यदि अब भी प्रशासन और समाज नहीं जागे, तो ऐसी घटनाएँ केवल खबर बनकर रह जाएंगी और मासूम बच्चों की सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी।प्रश्न अब भी वही है —
बस का फ़र्श टूटा था, या पूरी व्यवस्था?

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