क्या न्याय पालिका अपने ही परीक्षण से डर गई?
सुप्रीम कोर्ट का धेयवाक्य है यतो धर्मस ततो जय :लोकतंत्र के चार स्तंभों में न्यायपालिका को सबसे पवित्र और विश्वसनीय माना जाता है। यह वही संस्था है, जिसके सामने सत्ता, प्रशासन और समाज—सभी को सिर झुकाना पड़ता है। न्यायपालिका केवल कानून का संरक्षक नहीं, बल्कि राष्ट्र की नैतिक चेतना का भी प्रहरी है। ऐसे में यदि न्यायपालिका अपने ही मूल्यांकन या परीक्षण से भयभीत दिखाई दे, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर वह किस बात से डर रही है?हाल के वर्षों में यह चर्चा तेज हुई है कि न्यायपालिका से जुड़े विषयों—विशेषकर न्यायिक व्यवस्था, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार—को लेकर शैक्षणिक पाठ्यक्रमों या सार्वजनिक विमर्श में कुछ हिचक दिखाई देती है। यह हिचक स्वयं में चिंता का विषय है। क्योंकि यदि लोकतंत्र की सबसे मजबूत संस्था ही आलोचना और आत्मपरीक्षण से दूर रहने लगे, तो लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर पड़ने लगता है।
सच्चाई यह है कि न्यायपालिका की प्रतिष्ठा उसकी आलोचना से नहीं, बल्कि पारदर्शिता से बढ़ती है। यदि पाठ्यक्रम में यह कहा जाता कि भारत की न्यायपालिका भ्रष्टाचार से मुक्त और नैतिक मूल्यों पर आधारित है, तो यह न्यायपालिका के सम्मान को और ऊँचा ही करता। लेकिन जब किसी विषय को पाठ्यक्रम से हटाया जाता है या उससे दूरी बनाई जाती है, तो समाज में अनावश्यक शंकाएँ जन्म लेने लगती हैं।न्यायपालिका को समझना होगा कि लोकतंत्र में कोई भी संस्था आलोचना से ऊपर नहीं होती। संसद पर प्रश्न उठते हैं, कार्यपालिका पर सवाल उठते हैं, मीडिया पर भी आलोचना होती है—फिर न्यायपालिका क्यों इस स्वाभाविक प्रक्रिया से अलग रहे? दरअसल आलोचना से डरना नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करना ही लोकतांत्रिक परंपरा का मूल है।
भारत की न्यायपालिका का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। अनेक अवसरों पर उसने सत्ता के दबाव को ठुकराकर संविधान की रक्षा की है। आपातकाल के बाद से लेकर आज तक कई ऐतिहासिक निर्णयों ने यह सिद्ध किया है कि न्यायपालिका लोकतंत्र की अंतिम आशा है। लेकिन इसी इतिहास की गरिमा को बनाए रखने के लिए आत्ममंथन भी आवश्यक है।यदि पाठ्यक्रम में न्यायपालिका पर विमर्श होता, तो विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर मिलता कि न्यायिक व्यवस्था किस प्रकार कार्य करती है, उसकी सीमाएँ क्या हैं और उसे और अधिक पारदर्शी कैसे बनाया जा सकता है। यह विमर्श न्यायपालिका की गरिमा को कम नहीं करता, बल्कि उसे और मजबूत बनाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि न्यायपालिका स्वयं आगे बढ़कर यह कहे कि उसे किसी भी प्रकार के परीक्षण या आलोचना से भय नहीं है। उसे यह संदेश देना चाहिए कि भारत की न्यायपालिका पारदर्शी है, उत्तरदायी है और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर है। यही लोकतंत्र की सच्ची भावना भी है।यदि न्यायपालिका अपने ऊपर उठे प्रश्नों से घबराने के बजाय उन्हें अवसर के रूप में ले, तो वह और अधिक शक्तिशाली बनकर उभरेगी। लेकिन यदि वह विमर्श से दूरी बनाएगी, तो संदेह और अविश्वास की दीवारें खड़ी होंगी। लोकतंत्र में विश्वास की नींव पारदर्शिता से ही बनती है।
इसलिए आज समय का आह्वान है—न्यायपालिका को यह स्पष्ट करना होगा कि वह आलोचना से नहीं डरती। उसे यह साहस दिखाना होगा कि वह कह सके: भारत की न्यायपालिका निष्पक्ष है, पारदर्शी है और भ्रष्टाचार से मुक्त रहने के लिए सतत संघर्षरत है।यही साहस उसकी वास्तविक शक्ति भी बनेगा और लोकतंत्र की रक्षा भी करेगा।


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