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सोमवार, 16 मार्च 2026

भारत की छवि पर वार: आरएसएस विरोध में कांग्रेस की विदेश यात्रा राजनीति

 






“संघ को मिटाने चले थे, कांग्रेस खुद सिमट गई”
राजेंद्र नाथ तिवारी, सम्पादकीय, समय, 4 बजे अपरान्ह, 16 मार्च 2026

भारत की राजनीति में एक विचित्र परंपरा रही है—कांग्रेस जब भी अपनी राजनीतिक कमजोरी से घिरती है, तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाना बनाकर अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयास करती है। आज फिर वही दृश्य सामने है।
यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इटरनेशनल रिलिजस फ्रीडम (USCIRF) की रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश सामने आई है। और आश्चर्य की बात यह है कि भारत में कांग्रेस से जुड़े कई नेता इस विदेशी रिपोर्ट को मानो अपने राजनीतिक अभियान का हथियार बना रहे हैं।यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अब अपने ही देश के सामाजिक संगठनों के खिलाफ विदेशी मंचों से समर्थन तलाशनेcf लगी है?
नेहरू से राहुल तक — संघ विरोध की विरासत=
संघ विरोध कांग्रेस की राजनीतिक परंपरा रही है।जवाहरलाल नेहरु,के समय से ही संघ को संदेह की दृष्टि से देखा गया।इंदिरा गाँधी ने आपातकाल के दौरान संघ पर प्रतिबंध लगाया। राजीव गाँधी के समय भी वैचारिक टकराव जारी रहा।
आज वही परंपरा राहुल गाँधी के राजनीतिक वक्तव्यों में दिखाई देती है, जहाँ संघ को भारत की हर समस्या की जड़ बताने का प्रयास किया जाता है।लेकिन इतिहास ने एक अलग ही फैसला दिया।चार पीढ़ियाँ बीत गईं—संघ खत्म नहीं हुआ।बढ़ता ही गया पर कांग्रेस का राजनीतिक साम्राज्य लगातार सिमटता चला गया।
संघ पर हमला, पर जनता का भरोसा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक आंदोलन बन चुका है।ग्राम विकास, सेवा कार्य, शिक्षा, आपदा राहत और सांस्कृतिक जागरण—संघ के स्वयंसेवक समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय हैं।यही कारण है कि जितनी बार उस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश हुई, वह उतनी ही मजबूती से वापस खड़ा हुआ।
विदेशी मंचों से भारत की राजनीति?सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि भारत की राजनीतिक लड़ाई को विदेशी मंचों तक क्यों ले जाया जा रहा है।
यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजस फ्रीडम जैसे संस्थान अक्सर उन देशों पर टिप्पणी करते हैं जिनकी सभ्यता और सामाजिक संरचना पश्चिमी मानकों से अलग है।लेकिन भारत की लोकतांत्रिक परंपरा इतनी कमजोर नहीं कि उसे अपने सामाजिक संगठनों के बारे में फैसला लेने के लिए किसी विदेशी आयोग की जरूरत पड़े।
जब भारत के कुछ राजनीतिक वर्ग इन रिपोर्टों को आधार बनाकर अपने ही देश के संगठनों को कठघरे में खड़ा करते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह राजनीतिक आलोचना है या भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कमजोर करने की रणनीति?कांग्रेस का संकट-कभी भारत की राजनीति पर पूर्ण वर्चस्व रखने वाली कांग्रेस आज अपने ही बनाए संकट से जूझ रही है।जहाँ कभी कांग्रेस का झंडा पूरे देश में लहराता था, वहीं आज वह कई राज्यों में संगठनात्मक रूप से कमजोर हो चुकी है।और इसी राजनीतिक खालीपन को छिपाने के लिए संघ विरोध को एक स्थायी राजनीतिक मुद्दा बनाया जाता है।
इतिहास का व्यंग्य -इतिहास का व्यंग्य देखिए—जिस संगठन को कांग्रेस दशकों से समाप्त करने की बात करती रही, वही संगठन आज समाज में अधिक व्यापक होता जा रहा है। और जो दल खुद को भारत की आत्मा कहता था, वही दल आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

भारत में किसी भी संगठन या विचारधारा का अंतिम निर्णय जनता करती है, न कि कोई विदेशी आयोग। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि किसी रिपोर्ट में क्या लिखा है।असली सवाल यह है कि भारत का समाज किसे स्वीकार करता है और किसे अस्वीकार।
चार पीढ़ियाँ बीत गईं—संघ को मिटाने की राजनीति चलती रही।पर इतिहास गवाही दे रहा है—संघ खड़ा है,और कांग्रेस सिकुड़ती चली जा रही है।

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