“मरती नदियाँ, मौन सत्ता: बस्ती मंडल में पर्यावरण की हत्या का सच”
विशेष रिपोर्ट | कौटिल्य का भारत, 16मार्च अपरान्ह 3 बजे
उत्तर प्रदेश का बस्ती मंडल आज एक ऐसे पर्यावरणीय संकट से गुजर रहा है, जिसे देखने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विकास के नाम पर प्रकृति का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। बस्ती डिस्ट्रिक्ट , संत कबीर नगर व डिस्ट्रिक्ट और सिद्धार्थनगर डिस्ट्रिक्ट — इन तीनों जिलों की पहचान कभी उनकी जीवनदायिनी नदियों और जलस्रोतों से होती थी, लेकिन आज वही नदियाँ और तालाब प्लास्टिक, कूड़े और प्रशासनिक उदासीनता की कब्रगाह बन चुके हैं।
कभी आस्था और संस्कृति की धारा रही सरयु नदी राप्ति , कुंवानो और आमी (लगभग मृत प्राय )आज अपनी दुर्दशा पर मानो स्वयं विलाप कर रही हैं। नदी के तटों पर फैला प्लास्टिक कचरा, नालों से बहता जहरीला पानी और अवैध अतिक्रमण इस बात का प्रमाण है कि पर्यावरण संरक्षण की योजनाएँ केवल सरकारी फाइलों तक सीमित रह गई हैं।
तालाबों का गायब होता अस्तित्व=बस्ती मंडल में कभी हर गाँव की पहचान उसका तालाब होता था। यह तालाब केवल जलस्रोत नहीं बल्कि ग्रामीण जीवन का केंद्र हुआ करते थे। लेकिन पिछले दो दशकों में सैकड़ों तालाब या तो अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए या कूड़ाघर में बदल गए। कहीं उन पर अवैध निर्माण हो गया, तो कहीं उन्हें कचरा फेंकने का स्थायी स्थान बना दिया गया।ग्राम पंचायतों और नगर निकायों की जिम्मेदारी थी कि इन जलस्रोतों को बचाया जाए, लेकिन स्थानीय स्तर पर लापरवाही और मिलीभगत ने स्थिति को भयावह बना दिया। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में जल संकट इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या बन सकता है।
प्लास्टिक का जहर=नदियों और तालाबों की इस दुर्दशा के पीछे सबसे बड़ा कारण प्लास्टिक कचरे का अनियंत्रित फैलाव है। बाजारों से लेकर गाँवों तक हर जगह प्लास्टिक का ढेर दिखाई देता है। यही कचरा अंततः नालों और नदियों में पहुँच जाता है।स्थिति इतनी गंभीर है कि कई जगह नदियों के किनारे प्लास्टिक की मोटी परत जम गई है। इससे न केवल जलप्रवाह बाधित होता है बल्कि जलचर जीवों का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। प्लास्टिक जलाने से निकलने वाला जहरीला धुआँ हवा को भी प्रदूषित कर रहा है।
प्रशासनिक उदासीनता=सबसे बड़ा प्रश्न प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर उठता है। पर्यावरण संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कई योजनाएँ चलाई जाती हैं, लेकिन बस्ती मंडल में इन योजनाओं का असर जमीन पर दिखाई नहीं देता।स्थानीय लोग बताते हैं कि कई बार शिकायतों के बावजूद नदियों और तालाबों की सफाई के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। उल्टा, कई जगह अतिक्रमण को राजनीतिक संरक्षण मिलने की भी चर्चा होती है।
समाज की भी जिम्मेदारी=यह सच है कि प्रशासन की जिम्मेदारी सबसे बड़ी है, लेकिन समाज भी इस संकट से पूरी तरह निर्दोष नहीं है। प्लास्टिक का अंधाधुंध उपयोग, कचरे का खुले में फेंकना और जलस्रोतों की अनदेखी इस समस्या को और बढ़ा रही है।जब तक समाज और प्रशासन दोनों मिलकर जिम्मेदारी नहीं निभाएँगे, तब तक पर्यावरण संरक्षण केवल नारे और अभियानों तक सीमित रहेगा।
आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरा=पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि नदियों और तालाबों की स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ तो इसका सीधा असर जलस्तर, खेती और जनस्वास्थ्य पर पड़ेगा। बस्ती मंडल का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में पड़ सकता है।
अब भी समय है=यह समय केवल चिंता व्यक्त करने का नहीं बल्कि ठोस कदम उठाने का है। नदियों और तालाबों से अतिक्रमण हटाना, प्लास्टिक पर सख्त नियंत्रण और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है।अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब बस्ती मंडल की नदियाँ केवल किताबों और लोकगीतों में रह जाएँगी और आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—
क्या कभी यहाँ सचमुच नदियाँ बहती थीं?
राजेंद्र नाथ तिवारी

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें