अग्रलेख : प्रश्नपत्र में छिपा वैचारिक विष
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल नियुक्ति की प्रक्रिया नहीं होतीं, वे राज्य की बौद्धिक मर्यादा और वैचारिक अनुशासन का भी दर्पण होती हैं। जब किसी परीक्षा के प्रश्नपत्र में ऐसा प्रश्न आ जाए जो समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं को आहत करता प्रतीत हो, तो वह केवल एक अकादमिक त्रुटि नहीं रहती, बल्कि वह पूरे तंत्र की संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश की पुलिस भर्ती परीक्षा में पूछे गए एक प्रश्न ने व्यापक विवाद को जन्म दिया है। इस प्रश्न को लेकर विधायक प्रकाश द्विवेदी ने मुख्यमंत्रीयोगी आदित्य नाथ को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि प्रश्न की संरचना और उसके विकल्प ऐसे हैं जो समाज के एक वर्ग की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाने वाले हैं। यदि यह आरोप सत्य है, तो यह केवल परीक्षा निर्माण की त्रुटि नहीं बल्कि प्रशासनिक विवेक के पतन का संकेत है।
यह समझना आवश्यक है कि पुलिस जैसी संवेदनशील सेवा की भर्ती परीक्षा केवल ज्ञान की जाँच नहीं करती; वह उस मानसिकता को भी परखती है जिसके सहारे भावी पुलिस अधिकारी समाज में कानून और न्याय की स्थापना करेंगे। यदि प्रश्नपत्र ही विवाद और विभाजन की भूमि तैयार करने लगे, तो यह संकेत है कि कहीं न कहीं व्यवस्था की बौद्धिक सतर्कता शिथिल हो गई है।
प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत सावधानी और उत्तरदायित्व की माँग करती है। इसमें विषय विशेषज्ञों, भाषा विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों की बहुस्तरीय जाँच की व्यवस्था होती है, ताकि कोई भी शब्द, वाक्य या विकल्प ऐसा न हो जो अनावश्यक विवाद या सामाजिक तनाव का कारण बने। यदि इसके बावजूद ऐसा प्रश्न सार्वजनिक परीक्षा में पहुँच जाता है, तो यह केवल व्यक्तिगत चूक नहीं बल्कि संस्थागत असावधानी का प्रमाण है।
भारत जैसा बहु धार्मिक और बहु सांस्कृतिक समाज अत्यंत संवेदनशील संतुलन पर टिका हुआ है। यहाँ शब्द भी कभी-कभी शस्त्र बन जाते हैं और वाक्य भी वैचारिक संघर्ष का कारण बन सकते हैं। इसलिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं में भाषा का संयम और विवेक सर्वोच्च अपेक्षा होती है। प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों में विशेष सावधानी इसीलिए आवश्यक है कि वे समाज के विविध वर्गों के बीच किसी भी प्रकार की अनावश्यक कटुता को जन्म न दें।
यह प्रकरण केवल एक परीक्षा का विवाद नहीं है; यह उस व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करता है कि क्या हमारी संस्थागत व्यवस्थाएँ अपने उत्तरदायित्व के प्रति पर्याप्त सजग हैं। यदि लापरवाही या असावधानी के कारण समाज में अनावश्यक विवाद उत्पन्न होते हैं, तो उसका दुष्परिणाम केवल प्रशासनिक छवि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक विश्वास को भी आघात पहुँचाता है।
अतः आवश्यक है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और पारदर्शी जाँच कराई जाए। यदि प्रश्नपत्र निर्माण में लापरवाही या दुर्भावना का कोई तत्व पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। प्रशासनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब वे अपनी त्रुटियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का साहस दिखाती हैं।
अंततः यह स्मरण रखना होगा कि शासन की प्रतिष्ठा केवल नीतियों से नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म प्रक्रियाओं से भी निर्मित होती है जिनके माध्यम से राज्य जनता के जीवन को प्रभावित करता है। एक प्रश्नपत्र भी कभी-कभी राज्य की बौद्धिक संस्कृति का परिचायक बन जाता है। इसलिए आवश्यक है कि प्रशासनिक विवेक, भाषा की मर्यादा और सामाजिक संवेदनशीलता—तीनों का संतुलन हर निर्णय में दिखाई दे।
जब तक यह संतुलन सुरक्षित है, तब तक लोकतंत्र की नैतिक शक्ति भी सुरक्षित रहती है।पेपर बनाने वाले का नाम भी उजागर हो!
राजेंद्र नाथ तिवारी
संपादक

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