अयोध्या का विलाप,सरयू की त्रासदी!
अयोध्या केवल एक नगर नहीं है। वह भारत की स्मृति है, भारत की आत्मा है और भारत की सभ्यता की सबसे प्राचीन धड़कनों में से एक है। यह वह भूमि है जहाँ इतिहास और आस्था का संगम हुआ, जहाँ धर्म और मर्यादा ने समाज को दिशा दी और जहाँ मानव जीवन के आदर्शों को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप में मूर्त रूप मिला। इसी अयोध्या की जीवनरेखा है सरयू नदी -वह नदी जिसने युगों से इस नगरी को पोषित किया, उसे पवित्रता दी और उसकी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा।
किन्तु आज वही सरयू जैसे मौन होकर विलाप कर रही है।यह विलाप केवल जलधारा का विलाप नहीं है; यह उस सभ्यता का विलाप है जिसने अपने ही पवित्र स्रोतों को भूलना शुरू कर दिया है। यह विलाप उस समय का प्रतीक है जब विकास के नाम पर प्रकृति की आत्मा को अनदेखा कर दिया जाता है, जब पवित्रता के स्थान पर केवल बाहरी भव्यता को महत्व दिया जाता है।सरयू: केवल नदी नहीं, सभ्यता की धारा है,सरयू को समझने के लिए केवल भौगोलिक मानचित्र देखना पर्याप्त नहीं है। यह नदी भारतीय चेतना के भीतर बहती हुई एक सांस्कृतिक धारा है। रामायण के युग से लेकर आज तक सरयू के तटों ने असंख्य घटनाओं की प्रत्यक्ष साक्षी है।
जब राम ने इस धरती पर जन्म लिया, तब सरयू के जल ने उस घटना का साक्षी बनकर इतिहास को अमर कर दिया। जब अयोध्या के राजमहलों में उत्सव हुआ, तब उसकी प्रतिध्वनि सरयू की लहरों में गूँज उठी। और जब समय आया कि राम अपने जीवन की अंतिम यात्रा पर निकलें, तब वही सरयू उनकी समाधि की साक्षी बनी।इस प्रकार सरयू केवल जल की धारा नहीं रही; वह अयोध्या की आत्मा का विस्तार बन गई।
पवित्रता से संकट तक-एक समय था जब सरयू का जल इतना निर्मल था कि लोग उसे जीवन दायिनी मानते थे। तीर्थयात्री दूर-दूर से आते और उसके जल में स्नान कर स्वयं को पवित्र समझते।किन्तु समय के साथ परिस्थितियाँ बदलने लगीं। जनसंख्या बढ़ी, नगर का विस्तार हुआ और आधुनिक विकास की योजनाएँ बनने लगीं। यह सब स्वाभाविक था, क्योंकि कोई भी नगर स्थिर नहीं रह सकता। लेकिन समस्या तब शुरू हुई जब विकास की गति ने संतुलन खो दिया।आज सरयू के तटों पर बढ़ती भीड़, असंगठित निर्माण और प्रदूषण की समस्या स्पष्ट दिखाई देती है। अनेक स्थानों पर नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित किया जा रहा है। घाटों के आसपास फैलता कचरा और गंदा पानी उस पवित्रता को चोट पहुँचाता है जिसके लिए सरयू जानी जाती थी।
यह स्थिति केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है; यह सांस्कृतिक संकट भी है-अयोध्या का बदलता स्वरूप हाल के वर्षों में अयोध्या में विकास की गति तेज हुई है। मंदिरों का पुनर्निर्माण, नई सड़कों का निर्माण, पर्यटन की सुविधाएँ—इन सबने अयोध्या को वैश्विक स्तर पर चर्चा का केंद्र बना दिया है।यह विकास निश्चित रूप से आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इस विकास में सरयू का ध्यान रखा जा रहा है?यदि अयोध्या की आत्मा को बचाना है तो उसकी जीवन रेखा को भी सुरक्षित रखना होगा। यदि सरयू ही संकट में पड़ जाए, तो अयोध्या की पवित्रता भी खतरे में पड़ जाएगी।
नदियों का अपमान-भारत की संस्कृति में नदियों को माता का स्थान दिया गया है। गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा—इन सभी नदियों को हमने देवत्व प्रदान किया है।लेकिन विडंबना यह है कि जिन नदियों को हम माता कहते हैं, उन्हीं को हम सबसे अधिक प्रदूषित भी करते हैं।सरयू भी इसी विरोधाभास का शिकार बन रही है। श्रद्धा के नाम पर आने वाली भीड़ कभी-कभी वही काम कर देती है जो श्रद्धा के विपरीत है—कचरा, प्लास्टिक और अपशिष्ट नदी में डाल दिया जाता है।यह आस्था का नहीं बल्कि अज्ञान का परिणाम है।
सरयू का मौन प्रश्नयदि सरयू बोल सकती, तो शायद वह हमसे पूछती—क्या यही वह अयोध्या है जिसके लिए मैं युगों से बह रही हूँ?क्या यही वह समाज है जिसने मुझे पवित्र कहा था?क्या यही वह संस्कृति है जिसने नदियों को देवता माना था?यह प्रश्न केवल प्रशासन से नहीं बल्कि समाज से भी है।
सभ्यता की परीक्षा =हर सभ्यता की परीक्षा केवल उसके भवनों से नहीं होती, बल्कि उसके प्रकृति के प्रति व्यवहार से होती है।यदि कोई समाज अपनी नदियों को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो उसकी सांस्कृतिक महानता पर भी प्रश्न उठ सकते हैं।अयोध्या के संदर्भ में यह परीक्षा और भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह वही भूमि है जहाँ मर्यादा और धर्म की शिक्षा दी गई थी।यदि इस भूमि पर ही प्रकृति का अपमान होने लगे, तो यह विडंबना ही होगी।
समाधान की दिशा क्या है?समस्या का समाधान केवल आलोचना से नहीं होगा। इसके लिए ठोस प्रयास आवश्यक हैं।सबसे पहले यह समझना होगा कि सरयू केवल एक नदी नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर है।दूसरा, नदी के संरक्षण के लिए कठोर नियम और प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है।तीसरा, समाज में जागरूकता फैलानी होगी ताकि लोग स्वयं नदी की पवित्रता बनाए रखने में सहयोग करें।जब तक समाज और प्रशासन दोनों मिलकर प्रयास नहीं करेंगे, तब तक यह संकट समाप्त नहीं होगा।
भविष्य की चेतावनीयदि अभी भी हमने सरयू की पुकार नहीं सुनी, तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है।नदियाँ धीरे-धीरे मरती हैं। उनका प्रवाह कमजोर हो जाता है, उनका जल प्रदूषित हो जाता है और अंततः वे केवल स्मृति बनकर रह जाती हैं।हम यह नहीं चाहते कि सरयू भी केवल इतिहास की एक कथा बन जाए।
अंतिम आह्वान है,अयोध्या की पहचान केवल मंदिरों से नहीं है; उसकी पहचान सरयू से भी है।यदि हम वास्तव में इस पवित्र नगरी का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें उसकी नदी की रक्षा करनी होगी।क्योंकि जब सरयू स्वच्छ और जीवंत रहेगी, तभी अयोध्या की आत्मा भी जीवित रहेगी।
अन्यथा इतिहास एक दिन यह लिख सकता है—अयोध्या का विकास तो हुआ,पर सरयू की आवाज किसी ने नहीं सुनी।और उस दिन यह नगरी अपने ही इतिहास के सामने मौन खड़ी होगी।सरयू पूछ रही इसी कुल के भगीरथ ने गगा क़ो अवतरित किया क्या कोई और भगीरथ मेरी सुध लेने क़ो पैदा होगा?

बहुत सुंदर लेख
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