संपादकीय: क्या सिविल सेवा परीक्षा भी संदेह के घेरे में?
भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का मेरुदंड मानी जाने वाली यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन की सिविल सेवा परीक्षा हमेशा से प्रतिभा, परिश्रम और निष्पक्ष चयन का प्रतीक मानी जाती रही है। किंतु हाल के घटनाक्रमों और विवादों ने इस प्रतिष्ठित संस्था की कार्यप्रणाली पर ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए हैं, जिन्हें अब अनदेखा करना संभव नहीं रह गया है।देश के लाखों युवा अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष इस परीक्षा की तैयारी में लगा देते हैं। वे अपने परिवारों की आशाओं, आर्थिक सीमाओं और मानसिक दबाव के बीच यह विश्वास लेकर संघर्ष करते हैं कि अंततः चयन केवल योग्यता और निष्पक्ष मूल्यांकन के आधार पर होगा। परंतु जब चयन प्रक्रिया के नियमों, पात्रता निर्धारण, श्रेणी परिवर्तन और साक्षात्कार अंकों को लेकर बार-बार विवाद सामने आते हैं, तो यह विश्वास डगमगाने लगता है।
सबसे गंभीर प्रश्न नियमों की अस्पष्टता का है। यदि परीक्षा के विभिन्न चरणों के बाद भी किसी अभ्यर्थी की पात्रता या श्रेणी से जुड़े निर्णयों को लेकर भ्रम की स्थिति बनती है, तो यह केवल प्रशासनिक भूल नहीं बल्कि संस्थागत कमजोरी का संकेत है। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नियम वास्तव में स्पष्ट हैं, या उनकी व्याख्या परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है।दूसरा बड़ा मुद्दा साक्षात्कार प्रक्रिया की अपार शक्ति है। लिखित परीक्षा में कठोर प्रतिस्पर्धा के बाद मात्र कुछ मिनट के इंटरव्यू के आधार पर सैकड़ों अंकों का अंतर पैदा हो जाना चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े करता है। जब इस प्रक्रिया की रिकॉर्डिंग, मूल्यांकन मानक और जवाबदेही सार्वजनिक नहीं होती, तो यह स्वाभाविक है कि संदेह और असंतोष बढ़े।
यह भी एक विडंबना है कि देश के सर्वोच्च प्रशासनिक पदों के चयन की यह प्रक्रिया धीरे-धीरे कोचिंग उद्योग, शहरी संसाधनों और अंग्रेज़ी माध्यम के प्रभुत्व से प्रभावित होती दिखाई देती है। यदि यह धारणा मजबूत होती है कि सफलता केवल संसाधनों और रणनीति का परिणाम है, तो यह उस आदर्श को चोट पहुँचाती है जिसके आधार पर सिविल सेवा परीक्षा को स्थापित किया गया था।
प्रश्न यह नहीं है कि किसी एक परिणाम में क्या हुआ, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या चयन प्रक्रिया इतनी पारदर्शी और निर्विवाद है कि उस पर कोई संदेह ही न उठे? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो यह स्थिति देश के प्रशासनिक तंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक है।याद रखना होगा कि यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन केवल एक भर्ती संस्था नहीं है; यह उस प्रशासनिक वर्ग का निर्माण करती है जो भारत की नीतियों, शासन और न्यायिक प्रक्रियाओं को लागू करता है। यदि इसी प्रक्रिया पर विश्वास कमजोर हो जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद को भी प्रभावित कर सकता है।
इसलिए समय की मांग है कि सिविल सेवा परीक्षा की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा हो, नियमों को स्पष्ट और सार्वजनिक बनाया जाए तथा साक्षात्कार सहित सभी चरणों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।क्योंकि यदि देश की सर्वोच्च परीक्षा भी संदेह के घेरे में आ जाए, तो यह केवल एक संस्था का संकट नहीं होगा—यह भारत की प्रशासनिक नैतिकता का संकट बन जाएगा।

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