कांग्रेस का देश हित में समापन जरूरी पर मजबूत विपक्ष भी आवश्यक!!
प्रश्न कांग्रेस का नहीं, लोकतंत्र की आत्मा का है
भारत की राजनीति में आज एक विचार बार-बार उभरता है — क्या देश को कांग्रेस से मुक्त होना चाहिए?यह प्रश्न केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के बाद निर्मित राजनीतिक संरचना की समीक्षा का विषय है।किन्तु इस प्रश्न के साथ ही एक दूसरा, अधिक गंभीर प्रश्न भी खड़ा होता है —यदि कांग्रेस या कोई भी प्रमुख दल कमजोर हो जाए, तो क्या लोकतंत्र बिना मजबूत विपक्ष के जीवित रह सकता है?राजनीति विज्ञान, इतिहास और भारतीय दार्शनिक परंपरा तीनों इस प्रश्न का एक ही उत्तर देते हैं —लोकतंत्र सत्ता से नहीं, संतुलन से चलता है।
कांग्रेस का ऐतिहासिक वर्चस्व : लोकतंत्र की पहली चुनौती::स्वतंत्रता के बाद भारत में कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं रही; वह राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत लेकर सत्ता में आई। पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में प्रारंभिक दशकों में कांग्रेस का प्रभुत्व इतना व्यापक था कि प्रसिद्ध राजनीतिक वैज्ञानिक राजनी कोठारी ने भारतीय राजनीति को “Congress System” कहा।इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि विपक्ष मौजूद तो था, पर प्रभावी नहीं था। परिणामस्वरूप लोकतंत्र चुनावी तो था, पर प्रतिस्पर्धी पूरी तरह नहीं।विद्वानों का मत है कि जब किसी लोकतंत्र में एक दल लंबे समय तक सत्ता में रहता है, तो तीन खतरे उत्पन्न होते हैं:सत्ता का केंद्रीकरण:संस्थागत आत्मसंतोष:वैचारिक चुनौती का अभाव,यही कारण था कि 1960 के दशक से कांग्रेस के विकल्प की खोज शुरू हुई।डॉ. राममनोहर लोहिया और “गैर-कांग्रेसवाद” का सिद्धांत::समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने सबसे पहले स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन आवश्यक है। उनका “गैर-कांग्रेसवाद” कांग्रेस विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र को प्रतिस्पर्धी बनाने का प्रयास था।लोहिया का तर्क था:“जहाँ सत्ता को चुनौती नहीं मिलती, वहाँ जनता धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाती है।”उन्होंने विपक्ष को लोकतंत्र का प्रशिक्षण विद्यालय बताया — जहाँ भविष्य की सरकार तैयार होती है।
आपातकाल : जब विपक्ष कमजोर पड़ा::1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रयोग और चेतावनी दोनों था। सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण, प्रेस नियंत्रण और नागरिक स्वतंत्रताओं का सीमित होना इस बात का प्रमाण बना कि मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की सुरक्षा कवच है।राजनीतिक इतिहासकार रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि आपातकाल ने भारतीय समाज को यह सिखाया कि लोकतंत्र केवल संविधान से नहीं, बल्कि सक्रिय राजनीतिक प्रतिरोध से बचता है।1977 में जनता पार्टी की विजय वास्तव में विपक्ष की पुनर्स्थापना थी — और लोकतंत्र की भी।
कांग्रेस से मुक्ति की मांग क्यों उठी? ::समकालीन राजनीतिक विमर्श में कांग्रेस की आलोचना कई आधारों पर की जाती रही है:वंशवादी नेतृत्व की प्रवृत्ति,निर्णयों का उच्च केंद्रीकरण,वैचारिक अस्पष्टता,क्षेत्रीय आकांक्षाओं से दूरी!राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब कोई दल राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत के कारण लंबे समय तक सत्ता में रहता है, तो वह धीरे-धीरे संगठनात्मक ऊर्जा खो देता है।इस दृष्टि से “कांग्रेस-मुक्त” विचार को कई लोग लोकतांत्रिक पुनर्संतुलन का प्रयास मानते हैं।
परंतु विपक्ष क्यों अनिवार्य है? ::राजनीति विज्ञान के महान विचारकों ने विपक्ष की भूमिका को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है।जॉन स्टुअर्ट मिल के अनुसार विचारों का टकराव सत्य को जन्म देता है। यदि केवल एक विचार सत्ता में रहे, तो समाज बौद्धिक रूप से ठहर जाता है। एडमंड बर्क:ब्रिटिश संसदीय परंपरा में बर्क ने विपक्ष को “loyal opposition” कहा — अर्थात सरकार का विरोध करते हुए भी राष्ट्र के प्रति निष्ठावान।आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांत,आज विपक्ष की पाँच प्रमुख भूमिकाएँ मानी जाती हैं:सरकार की निगरानी,नीति-विकल्प प्रस्तुत करना,जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व,सत्ता दुरुपयोग रोकनालोकतांत्रिक बहस जीवित रखना. वैश्विक अनुभव : जहाँ विपक्ष कमजोर, वहाँ लोकतंत्र सीमितइतिहास बताता है कि:सोवियत संघ में एकदलीय व्यवस्था ने राजनीतिक स्वतंत्रता समाप्त कर दी।चीन में आर्थिक विकास हुआ, पर राजनीतिक बहस नियंत्रित रही।ब्रिटेन में “Shadow Cabinet” व्यवस्था ने नीति-बहस को मजबूत बनाया।अमेरिका में द्विदलीय प्रतिस्पर्धा निरंतर जवाबदेही सुनिश्चित करती है।अर्थात विकास और लोकतंत्र दोनों के लिए विपक्ष आवश्यक है। भारतीय दर्शन की दृष्टि : शास्त्रार्थ की परंपरा,भारतीय सभ्यता का मूल संवाद है, एकरूपता नहीं।उपनिषदों में प्रश्न-प्रतिप्रश्न?बुद्ध और वैदिक परंपरा का वैचारिक संघर्ष,आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र का शास्त्रार्थ!भारतीय ज्ञान परंपरा कहती है:“विरोध सत्य का शत्रु नहीं, उसका मार्ग है।”इस दृष्टि से विपक्ष भारतीय परंपरा के अनुरूप ही है।
वर्तमान भारत की चुनौती : मजबूत सरकार बनाम मजबूत लोकतंत्रआज भारत में एक मजबूत केंद्रीय नेतृत्व दिखाई देता है। यह प्रशासनिक स्थिरता के लिए लाभकारी हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की दीर्घकालिक सुरक्षा तभी संभव है जब विपक्ष भी वैचारिक रूप से मजबूत हो।कमजोर विपक्ष के परिणाम:संसद में बहस का स्तर गिरता है:नीति समीक्षा कम होती है:जनता के वैकल्पिक विकल्प सीमित हो जाते हैंमजबूत विपक्ष का अर्थ अराजकता नहीं, बल्कि संतुलन है।
भ्रम का समाधान : कांग्रेस ≠ विपक्ष:यहाँ सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर समझना आवश्यक है:कांग्रेस एक राजनीतिक दल है:विपक्ष लोकतांत्रिक संस्था है
यदि कांग्रेस कमजोर होती है तो उसकी जगह नया विपक्ष जन्म लेना चाहिए — क्षेत्रीय दल, वैचारिक समूह या नई राजनीतिक शक्ति।लोकतंत्र का लक्ष्य किसी दल का अंत नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का निरंतर बने रहना है।लोकतंत्र का अंतिम सूत्र:भारत को यदि मजबूत राष्ट्र बनना है तो दो समानांतर प्रक्रियाएँ आवश्यक हैं:सत्ता का उत्तरदायी और प्रभावी होना:विपक्ष का बौद्धिक और नैतिक रूप से सक्षम होनाकिसी एक दल से असहमति लोकतांत्रिक अधिकार है;लेकिन विपक्ष का समाप्त होना लोकतांत्रिक संकट है।लोकतंत्र तब जीवित रहता है जब सत्ता को चुनौती मिलती रहती है।जहाँ प्रश्न समाप्त होते हैं, वहाँ लोकतंत्र भी समाप्त होने लगता है।
अधीनायक वादी पार्टी, क़ी जमींदारी अभी चल रही है, जहां राहुल के सामने सब बौने है. सरकार विहीन कांन्द्रेस संस्कार भी भूल गयी है उसे अतिथि देवो भव से क्या लेना देना. उसका समाप्त होना ही भारत की नियति में है.
Ki Vishva Sanhita Desh Mein Puri Tarah Se samapt Hai Congress se Vish layak Nahin Rahi uski Charcha ki
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