“लोकतंत्र के मंदिर में कांग्रेस का सत्ता-विहीन आक्रोश: मर्यादा टूटी, मुखौटा उतरा” - कौटिल्य का भारत

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शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

“लोकतंत्र के मंदिर में कांग्रेस का सत्ता-विहीन आक्रोश: मर्यादा टूटी, मुखौटा उतरा”

 लोकतंत्र के मंदिर में अराजकता  कांग्रेस की राजनीति का असली चेहरा !



लोकतंत्र के मंदिर में अराजकता — कांग्रेस की राजनीति का असली चेहरा

भारतीय लोकतंत्र की सबसे पवित्र संस्था — लोकसभा — केवल बहस, विचार और जनमत की मर्यादा का मंच नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति का दर्पण भी है। लेकिन जब उसी सदन की गरिमा को तोड़ने का प्रयास स्वयं जनप्रतिनिधि करने लगें, तब प्रश्न केवल एक घटना का नहीं, बल्कि राजनीतिक चरित्र के पतन का बन जाता है।

हाल की घटनाओं में जिस प्रकार कांग्रेस सांसदों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कक्ष में जाकर कथित रूप से अभद्र व्यवहार, गाली-गलौच और दबाव की राजनीति की गई, वह केवल संसदीय परंपरा का उल्लंघन नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है। संसद विरोध का मंच हो सकती है, लेकिन अराजकता का अखाड़ा नहीं।

विरोध या राजनीतिक उन्माद?विपक्ष का काम सरकार से सवाल करना है — यह लोकतंत्र की आत्मा है। परंतु जब विरोध तर्क छोड़कर आक्रोश, अनुशासन छोड़कर उकसावे और संवाद छोड़कर धमकी का रूप ले ले, तब वह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं बल्कि राजनीतिक उन्माद बन जाता है। बताया जा रहा है कि वरिष्ठ नेता, जिनमें प्रियंका गांधी वाड्रा और के. सी. वेणुगोपाल जैसे नाम मौजूद थे, उस समय घटनास्थल पर उपस्थित थे। यदि वरिष्ठ नेतृत्व की उपस्थिति में मर्यादा टूटती है, तो यह केवल व्यक्तिगत गलती नहीं, बल्कि संगठनात्मक संस्कार का संकेत बन जाता है।

मर्यादा बनाम सत्ता की हताशा:राजनीति में हार-जीत होती रहती है, लेकिन हताशा जब व्यवहार में उतर आए तो वह लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाती है। आज प्रश्न यह नहीं है कि किस दल की सरकार है, बल्कि यह है कि क्या विपक्ष अपनी भूमिका को जिम्मेदारी से निभाने को तैयार है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले हों या लोकसभा अध्यक्ष पर दबाव — यह प्रवृत्ति बताती है कि राजनीतिक असहमति अब वैचारिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत टकराव में बदलती जा रही है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

कांग्रेस की राजनीतिक दिशा पर सवाल

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कभी संसदीय परंपराओं की वाहक पार्टी मानी जाती थी। वही पार्टी आज यदि संसदीय गरिमा पर सवाल खड़े करने वाली घटनाओं से जुड़ रही है, तो यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।

क्या यह वैचारिक संघर्ष है — या सत्ता से दूर रहने की बेचैनी?लोकतंत्र डर से नहीं, संवाद से चलता है

लोकतंत्र में आवाज ऊँची नहीं, तर्क मजबूत होना चाहिए। संसद में कुर्सी का सम्मान व्यक्ति का नहीं, संस्था का सम्मान होता है। जो संस्था का सम्मान नहीं कर सकता, वह लोकतंत्र की रक्षा का दावा भी नहीं कर सकता।आज आवश्यकता है स्पष्ट संदेश की —लोकतंत्र का मंदिर विरोध का अधिकार देता है, लेकिन अव्यवस्था की अनुमति नहीं।राजनीति यदि मर्यादा खो दे, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र बनने में देर नहीं लगती।और यही वह चेतावनी है, जिसे देश को गंभीरता से समझना होगा।

विपक्ष का काम सरकार से सवाल करना है — यह लोकतंत्र की आत्मा है। परंतु जब विरोध तर्क छोड़कर आक्रोश, अनुशासन छोड़कर उकसावे और संवाद छोड़कर धमकी का रूप ले ले, तब वह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं बल्कि राजनीतिक उन्माद बन जाता है।

बताया जा रहा है कि वरिष्ठ नेता, जिनमें प्रियंका गांधी वाड्रा और के. सी. वेणुगोपाल जैसे नाम मौजूद थे, उस समय घटनास्थल पर उपस्थित थे। यदि वरिष्ठ नेतृत्व की उपस्थिति में मर्यादा टूटती है, तो यह केवल व्यक्तिगत गलती नहीं, बल्कि संगठनात्मक संस्कार का संकेत बन जाता है।

मर्यादा बनाम सत्ता की हताशाराजनीति में हार-जीत होती रहती है, लेकिन हताशा जब व्यवहार में उतर आए तो वह लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाती है। आज प्रश्न यह नहीं है कि किस दल की सरकार है, बल्कि यह है कि क्या विपक्ष अपनी भूमिका को जिम्मेदारी से निभाने को तैयार है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले हों या लोकसभा अध्यक्ष पर दबाव — यह प्रवृत्ति बताती है कि राजनीतिक असहमति अब वैचारिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत टकराव में बदलती जा रही है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

कांग्रेस की राजनीतिक दिशा पर सवालभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कभी संसदीय परंपराओं की वाहक पार्टी मानी जाती थी। वही पार्टी आज यदि संसदीय गरिमा पर सवाल खड़े करने वाली घटनाओं से जुड़ रही है, तो यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।

क्या यह वैचारिक संघर्ष है — या सत्ता से दूर रहने की बेचैनी? लोकतंत्र डर से नहीं, संवाद से चलता है,लोकतंत्र में आवाज ऊँची नहीं, तर्क मजबूत होना चाहिए। संसद में कुर्सी का सम्मान व्यक्ति का नहीं, संस्था का सम्मान होता है। जो संस्था का सम्मान नहीं कर सकता, वह लोकतंत्र की रक्षा का दावा भी नहीं कर सकता।

आज आवश्यकता है स्पष्ट संदेश की —लोकतंत्र का मंदिर विरोध का अधिकार देता है, लेकिन अव्यवस्था की अनुमति नहीं। राजनीति यदि मर्यादा खो दे, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र बनने में देर नहीं लगती।

और यही वह चेतावनी है, जिसे देश को गंभीरता से समझना होगा।

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