बजट में पत्रकार फिर उपेक्षित: पेंशन पर मौन से बढ़ी नाराज़गी
बस्ती/लखनऊ। उत्तर प्रदेश के हालिया बजट में पत्रकारों के लिए पेंशन योजना को लेकर कोई ठोस घोषणा न होने से प्रदेश भर के पत्रकारों में निराशा और असंतोष का माहौल है। जब बिहार, झारखंड, उत्तराखंड और हरियाणा जैसे राज्य वरिष्ठ एवं मान्यता प्राप्त पत्रकारों को पेंशन सुविधा दे रहे हैं, तब देश के सबसे बड़े राज्य में इस मुद्दे पर लगातार चुप्पी सवाल खड़े कर रही है।
नेशनल प्रेस क्लब, बस्ती मंडल के पदाधिकारियों ने इसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की उपेक्षा बताया है। मंडल अध्यक्ष संतोष कुमार सिंह ने कहा कि पत्रकार शासन और जनता के बीच सेतु का कार्य करते हैं, जोखिम उठाते हैं, दबाव झेलते हैं, लेकिन वृद्धावस्था में उनके लिए कोई स्थायी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था नहीं है।
उन्होंने कहा, “सरकारी कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति लाभ, जनप्रतिनिधियों को आजीवन सुविधाएँ, लेकिन पत्रकार—जो जनमत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं—उन्हें बुढ़ापे में असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है।”
अन्य राज्यों से तुलना ने बढ़ाई बहस
सूत्रों के अनुसार बिहार और झारखंड जैसे अपेक्षाकृत कम संसाधन वाले राज्यों में भी पत्रकार पेंशन योजनाएँ संचालित हैं। उत्तराखंड और हरियाणा में भी मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए आर्थिक सहायता एवं पेंशन प्रावधान लागू हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश का पीछे रहना चर्चा का विषय बन गया है।
पत्रकार संगठनों की मांग
पत्रकार संगठनों ने मांग की है कि—
मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकारों के लिए सम्मान-पेंशन योजना लागू की जाए।
न्यूनतम सेवा अवधि निर्धारित कर पात्रता तय की जाए।
पत्रकार कल्याण कोष को सशक्त एवं पारदर्शी बनाया जाए।
आकस्मिक मृत्यु या गंभीर बीमारी की स्थिति में आर्थिक सहायता का स्पष्ट प्रावधान हो।
सरकार के लिए अवसर
विश्लेषकों का मानना है कि यह विषय केवल आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा का है। यदि सरकार इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाती है तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने वाला निर्णय होगा।
फिलहाल बजट में इस मुद्दे पर चुप्पी ने पत्रकार समुदाय को निराश किया है। अब निगाहें सरकार की अगली पहल पर टिकी हैं—क्या प्रदेश अपने कलमकारों को सामाजिक सुरक्षा की छत देगा, या यह मांग फिर अगली बजट चर्चा तक टल जाएगी?
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