अब बाबर या बाबरी नाम से कोई मस्जिद देश में नहीँ बनेगी - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

अब बाबर या बाबरी नाम से कोई मस्जिद देश में नहीँ बनेगी

 



देश के लिए गंभीर निर्णय,सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद नाम पर रोक लगाने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है, लेकिन राष्ट्रीय एकता के दृष्टिकोण से गंभीर चिंता पैदा करता है।याचिका का पृष्ठभूमि जनहित याचिका में मांग की गई थी कि देशभर में बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम से कोई नई मस्जिद न बने। याचिकाकर्ता ने बाबर को आक्रमणकारी बताते हुए दलील दी कि उसके नाम पर धार्मिक निर्माण अनुचित है, और हिंदुओं को गुलाम कहने जैसे ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला दिया। यह याचिका पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर द्वारा 6 दिसंबर 2025 को बाबरी मस्जिद शिलान्यास के विवाद से उपजी थी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला20 फरवरी 2026 को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया।अदालत ने मामले की प्रकृति को देखते हुए दखल देने से साफ इनकार किया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाबर के नाम पर मस्जिद बनाने से कोई रोक नहीं लगा सकता।अयोध्या फैसले से तुलना2019 के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल पर राम मंदिर को मंजूरी दी, लेकिन बाबरी विध्वंस को कानून का उल्लंघन माना।

 कोर्ट ने मस्जिद के लिए अयोध्या में ही 5 एकड़ वैकल्पिक भूमि आवंटित करने का आदेश दिया था। अब नई याचिका खारिज होने से अयोध्या फैसले की भावना पर सवाल उठते हैं, जहां न्याय संतुलन पर जोर था।राष्ट्रीय एकता पर प्रभावयह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता को मजबूत करता प्रतीत होता है, लेकिन राष्ट्रवादी दृष्टि से विभाजनकारी नामों को प्रोत्साहित कर सकता है। मुर्शिदाबाद विवाद ने बंगाल से यूपी तक तनाव बढ़ाया था, जो अब सुप्रीम कोर्ट के रुख से और गहरा सकता है।भारतीय राष्ट्रवाद के सिद्धांतों में सांस्कृतिक प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है, अन्यथा सामाजिक सद्भाव खतरे में पड़ सकता है।राष्ट्रवादी दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भले ही कानूनी हो, लेकिन बाबर जैसे आक्रमणकारी के नाम को धार्मिक स्थल से जोड़ना राष्ट्रीय चेतना के विरुद्ध है 

कौटिल्य जैसे प्राचीन भारतीय चिंतकों की परंपरा में राष्ट्र एकता सर्वोपरि है, जहां आक्रमणकारी प्रतीकों को अस्वीकार किया जाता है। इतिहास गवाह है कि बाबरी विवाद ने दशकों तक देश को बांटा। अब नए निर्माण राष्ट्र निर्माण की बजाय पुरानी घावों को हरा रखेंगे। राष्ट्रवाद का अर्थ है भविष्योन्मुखी दृष्टि, न कि विभाजनकारी नामों को वैधता।आगे की राहसरकार को संविधान की भावना में वैकल्पिक नामों को प्रोत्साहित करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम है, लेकिन सामाजिक चर्चा जारी रखनी होगी ताकि धार्मिक स्वतंत्रता राष्ट्रीय एकता से समझौता न करे। राष्ट्रप्रेमी शक्तियों को शांतिपूर्ण जागरूकता फैलानी चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad