वन्देमातरम् और शैक्षिक संस्थानों की भूमिका 71 - कौटिल्य का भारत

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बुधवार, 28 जनवरी 2026

वन्देमातरम् और शैक्षिक संस्थानों की भूमिका 71

वन्देमातरम 71 श्रृंखला



वन्देमातरम् और शैक्षिक संस्थानों की भूमिका

(एक सांस्कृतिक–राष्ट्रीय विवेचन)

“वन्देमातरम्” केवल एक गीत नहीं, नारा नहीं, और न ही मात्र ऐतिहासिक स्मृति है। यह भारत की सभ्यतागत चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक आत्मा का उद्घोष है। यह उस भूमि को नमन है जिसने हमें जन्म दिया, पोषित किया और संस्कारित किया। यह मातृभूमि को देवी के रूप में देखने की वह दृष्टि है, जो भारत को अन्य राष्ट्रों से भिन्न बनाती है।किन्तु प्रश्न यह है कि—आज के भारत में, विशेषकर शैक्षिक संस्थानों में, “वन्देमातरम्” की भूमिका क्या रह गई है?क्या वह केवल औपचारिकता बनकर रह गया है, या आज भी वह चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय बोध और सांस्कृतिक संस्कार का माध्यम बन सकता है?यह निबंध इसी प्रश्न का गहन उत्तर खोजने का प्रयास है।

 वन्देमातरम् : एक गीत से अधिक,बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित “वन्देमातरम्” औपनिवेशिक भारत में केवल साहित्यिक रचना नहीं था, बल्कि वह स्वतंत्रता संघर्ष का घोषणापत्र था।यह गीत राजनीतिक दासता के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध था.यह भारत को भूगोल नहीं, माँ मानने की चेतना देता है,यह राष्ट्र को धर्मनिरपेक्ष नहीं, बल्कि सभ्यतागत रूप से समन्वयी दृष्टि से देखता है“.सुजलां सुफलां…” केवल प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन नहीं, बल्कि उस भूमि की कृतज्ञता है, जिसने पीढ़ियों को अन्न, जल और आश्रय दिया।आज भारत में शिक्षा को प्रायः रोज़गार-उन्मुख कौशल तक सीमित कर दिया गया है। विद्यालय और विश्वविद्यालय—डिग्री बाँट रहे हैं लेकिन दृष्टि नहीं दे पा रहे,जानकारी दे रहे हैं, पर चरित्र नहीं गढ़ पा रहेभारतीय परंपरा में शिक्षा का अर्थ था—“सा विद्या या विमुक्तये”

जो मुक्त करे—अज्ञान से, स्वार्थ से और संकीर्णता से।यह कार्य बिना राष्ट्रबोध के संभव नहीं।

 वन्देमातरम् और राष्ट्रीय चेतना का निर्माणशै,क्षिक संस्थानों में “वन्देमातरम्” का महत्व तीन स्तरों पर है—(क) भावनात्मक स्तर यह गीत विद्यार्थी में मातृभूमि के प्रति भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है।राष्ट्र तब मजबूत होता है, जब नागरिक उसे केवल “राज्य” नहीं, बल्कि “अपना” मानते हैं।ख) नैतिक स्तर, व न्देमातरम् त्याग, समर्पण और कर्तव्यबोध की भावना जगाता है।यह पूछता है—मैंने देश के लिए क्या किया?मैं इस भूमि का ऋण कैसे चुकाऊँ?(ग) सांस्कृतिक स्तर,यह गीत भारतीय संस्कृति को सम्मानजनक और आत्मविश्वासी रूप में प्रस्तुत करता है—बिना किसी से घृणा किए, बिना किसी को排除 किए। औपनिवेशिक मानसिकता और वन्देमातरम् से दूरी,दुर्भाग्यवश, आज भी हमारे कई शैक्षिक संस्थान—औपनिवेशिक पाठ्यक्रमों से मुक्त नहीं,भारतीय विचार परंपरा को “पुरातन” कहकर हाशिए पर डालते हैंराष्ट्रगीतों को “विवादास्पद” कहकर टाल देते हैं,यह बौद्धिक दासता है।जब तक शिक्षा भारतीय दृष्टि से नहीं होगी, तब तक राष्ट्र आत्मनिर्भर नहीं होगा—न विचार में, न चरित्र में।

 क्या वन्देमातरम् थोपना है? – एक भ्रांति,अक्सर कहा जाता है—“वन्देमातरम् थोपना नहीं चाहिए।”यह कथन स्वयं में अधूरा और भ्रामक है।राष्ट्रगीत थोपे नहीं जाते वे संस्कार के रूप में आत्मसात किए जाते हैंक्या जापान में राष्ट्रगान पर विवाद होता है?क्य फ्रांस में राष्ट्रीय प्रतीकों पर असहजता है?तो भारत में क्यों?वास्तविक समस्या “वन्देमातरम्” नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति से असहजता है।

 शिक्षा संस्थानों की भूमिका(,1) पाठ्यक्रम में समावेश,वन्देमातरम् का साहित्यिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक अध्ययन,बंकिमचन्द्र और स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि2 प्रार्थना और आयोजन,सप्ताह में एक दिन सामूहिक गायन,केवल रस्म नहीं, अर्थ सहित प्रस्तुति

संवाद और विमर्श,विद्यार्थियों से प्रश्न पूछे जाएँ,आलोचना की अनुमति हो, पर अपमान की नहींशिक्षक की भूमिका शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला नहीं,वह राष्ट्रबोध का वाहक होता है। वन्देमातरम् और समावेशी भारत,यह भ्रम फैलाया गया कि वन्देमातरम् किसी एक धर्म का प्रतिनिधि है।वास्तव में—यह भूमि की स्तुति है,यह सांस्कृतिक प्रतीक है,यह किसी पूजा-पद्धति का आदेश नहीं,भारत की संस्कृति बहुलता में एकता की संस्कृति है, और वन्देमातरम् उसी का प्रतीक है।आज की आवश्यकता : सांस्कृतिक आत्मविश्वासआज भारत विश्व मंच पर खड़ा है—आर्थिक शक्ति बनने की ओर तकनीकी नेतृत्व की ओर पर यदि उसकी शिक्षा प्रणाली आत्महीन रही,तो यह शक्ति खोखली होगी।वन्देमातरम्—आत्मसम्मान सिखाता है,कृतज्ञता सिखाता है,राष्ट्र को माँ मानने की संवेदना देता है.शैक्षिक संस्थान यदि राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला हैं,तो “वन्देमातरम्” उनका संवेदनात्मक आधार है।यह न तो किसी पर थोपने की वस्तु है,न ही विवाद का विषय।यह तो—“भारत को भारत बनाए रखने की चेतना” है।यदि आने वाली पीढ़ियाँ—उच्च  शिक्षित हों,तकनीकी रूप से सक्षम हों,पर राष्ट्र के प्रति उदासीन हों,तो वह शिक्षा नहीं, केवल प्रशिक्षण होगा।अतः समय की माँग है कि— वन्देमातरम् को शैक्षिक संस्थानों में सम्मान, विवेक और संवेदनशीलता के साथ पुनः स्थापित किया जाए।क्योंकि—राष्ट्र पहले मन में बनता है,सीमाओं पर बाद में।


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