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बुधवार, 28 जनवरी 2026

“सांसद निधि : लोकतंत्र का सबसे असफल प्रयोग”

 

सांसद निधि : लोकतंत्र का कलंक या निर्लज्ज लूट का लाइसेंस?


वेदप्रकाश






सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि (MPLADS) को लेकर वर्षों से एक भ्रम फैलाया जाता रहा है—कि यह योजना विकास की रीढ़ है। सच यह है कि आज सांसद निधि विकास नहीं, बल्कि “निर्दलीय वित्तीय तानाशाही” का औज़ार बन चुकी है।देश के अधिकांश संसदीय क्षेत्रों में सांसद निधि का उपयोग नहीं, दुरुपयोग हो रहा है—और उससे भी अधिक खतरनाक है कि न कोई सोशल ऑडिट है, न कोई सार्वजनिक जवाबदेही,न कोई नैतिक शर्म। यह कैसी विडंबना है कि जो सांसद संसद में सरकार से जवाब माँगता है,

वही अपने क्षेत्र में एक भी रुपये का जवाब देने को बाध्य नहीं है। अनाप-शनाप खर्च = अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता?आज सांसद निधि को इस तरह खर्च किया जा रहा है मानो यह सांसद की निजी जागीर हो—बिना ज़मीनी आवश्यकता के भवन बिना उपयोग के मंच बिना सामाजिक सहमति के “स्मृति द्वार” और बिना दीर्घकालिक योजना के तथाकथित विकास क्या यह लोकतंत्र है? या फिर जनता के धन से किया गया संसदीय स्वेच्छाचार?न सोशल ऑडिट, न श्वेत पत्र — फिर जवाबदेही किसकी?

यह सवाल सीधा और असहज है—क्या सांसद संविधान के अधीन हैं या निधि के स्वामी?आज तक किसी भी सांसद को यह बाध्य नहीं किया गया कि वह—साल भर में या कम से कम 5 साल बादएक श्वेत पत्र (White Paper) जारी करे किकौन-कौन सी योजनाएँ दी गईं किस मद में कितना धन गयाउसका सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक या आर्थिक लाभ क्या हुआ

अगर कोई मंत्री संसद में ऐसा हिसाब न दे तो बवाल मच जाता है,लेकिन सांसद निधि पर पूर्ण मौन—यह मौन नहीं, संस्थागत साज़िश है।सोशल ऑडिट से डर क्यों?अगर सांसद निधि ईमानदार है,तो सोशल ऑडिट से डर क्यों?ग्राम सभा में रिपोर्ट क्यों नहीं? वेबसाइट पर परियोजना-वार विवरण क्यों नहीं?असफल योजनाओं की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति क्यों नहीं?क्योंकि जवाब साफ़ है—जहाँ ऑडिट आएगा, वहाँ चेहरे उतरेंगे।अब रोक लगनी चाहिए अब यह बहस समाप्त होनी चाहिए कि“सांसद निधि रहे या न रहे।”असल प्रश्न यह है—क्या बिना जवाबदेही के एक भी पैसा खर्च करने का अधिकार किसी जनप्रतिनिधि को मिलना चाहिए?

समाधान स्पष्ट है—सांसद निधि पर तत्काल अनिवार्य सोशल ऑडिट लागू हो हर सांसद को सालाना या कार्यकाल के अंत में श्वेत पत्र जारी करना अनिवार्य किया जाए ,अनुपयोगी या दिखावटी योजनाओं पर आपराधिक जवाबदेही तय हो ।सांसद निधि को “सिफारिश आधारित” नहीं, मांग आधारित और सामाजिक प्रभाव आधारित बनाया जाए।यह सांसदों पर हमला नहीं, लोकतंत्र की रक्षा है।जो सांसद इसे “आक्रमण” समझे,वह यह स्वीकार कर रहा है कि उसे सवालों से डर लगता है। लोकतंत्र में डरने का अधिकार जनता को नहीं,जवाब देने की ज़िम्मेदारी जनप्रतिनिधि को होती है। अब बहुत हो चुका।सांसद निधि या तो पारदर्शी बने,या फिर इतिहास इसे लोकतंत्र की सबसे ढीठ व्यवस्था के रूप में दर्ज करेगा।

“सांसद निधि : लोकतंत्र का सबसे असफल प्रयोग” 

लोकतंत्र के नाम पर खुली लूट और जवाबदेही का जनाज़ा

सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि आज विकास योजना नहीं रही—यह लोकतंत्र की आड़ में चल रही सबसे ढीठ, बेशर्म और निरंकुश व्यवस्था बन चुकी है।देश के अधिकांश संसदीय क्षेत्रों में सांसद निधि का अर्थ है—मैं सांसद हूँ, पैसा मेरा है, हिसाब किसी को नहीं दूँगा।यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ एक सांसद करोड़ों रुपये खर्च कर सकता है,लेकिन जनता एक सवाल भी नहीं पूछ सकती?सीयह दुरुपयोग नहीं, सुनियोजित लूट हैअब “दुरुपयोग” जैसे नरम शब्दों से काम नहीं चलेगा।जो हो रहा है, वह संस्थागत लूट है—ज़रूरत नहीं, फिर भी निर्माण उपयोग नहीं, फिर भी उद्घाटन,लाभ नहीं, फिर भी खर्च और जवाबदेही? शून्य।यह पैसा विकास के लिए नहीं,

पोस्टर, पत्थर, प्रतीक और प्रचार के लिए बहाया जा रहा है।और मज़े की बात देखिए—जिस सांसद की निधि से बेकार ढाँचा खड़ा होता है,वही सांसद संसद में खड़े होकर भ्रष्टाचार पर भाषण देता है।

यह पाखंड नहीं तो क्या है?सोशल ऑडिट से सांसद डरते क्यों हैं?एक सीधा सवाल—अगर सांसद निधि ईमानदार है, तो सोशल ऑडिट से इतना डर क्यों?ग्राम सभा के सामने हिसाब क्यों नहीं?मोहल्ले में खर्च का विवरण क्यों नहीं?वेबसाइट पर फोटो और बिल क्यों नहीं?क्योंकि सोशल ऑडिट होगा तो भ्रष्ट प्राथमिकताएँ दिखेंगी,फर्जी ज़रूरतें उजागर होंगी, राजनीतिक स्वार्थ नंगे हो जाएँगे।

इसलिए सांसद निधि को अंधेरे में रखा गया है।अनाप-शनाप खर्च = सांसद की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता?आज सांसद निधि को ऐसे खर्च किया जा रहा हैमानो यह संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो—जहाँ चाहूँ खर्च करूँ, जैसे चाहूँ करूँ,कोई पूछे तो कह दूँ—यह मेरा विवेक है।”

नहीं।यह विवेक नहीं—वित्तीय उद्दंडता है।श्वेत पत्र क्यों नहीं? क्योंकि सच सामने आ जाएगाअगर हर सांसद से यह कहा जाए कि—साल भर मेंया 5 साल के कार्यकाल के अंत मेंएक श्वेत पत्र जारी करे किcकस योजना को कितना पैसा दियाउसका सामाजिक प्रभाव क्या हुआ कौन सी योजना असफल रहीतो आधे सांसदों की विकास-छवि उसी दिन ढह जाए। इसीलिए श्वेत पत्र से बचा जाता है। सच कड़वा नहीं—सच खतरनाक है।यह सांसदों पर हमला नहीं, जनता का प्रतिकार हैजो सांसद इसे “आक्रमण” कहेंगे,वे दरअसल यह स्वीकार कर रहे हैं कि—वे जनता के धन पर सवाल नहीं चाहते।लोकतंत्र में,जनता चुप रहे,सांसद खर्च करे,और कोई हिसाब न देयह व्यवस्था लोकतंत्र नहीं—संसदीय सामंतवाद है।अब या तो पारदर्शिता, या फिर समाप्ति,अब देश को स्पष्ट निर्णय चाहिए—सांसद निधि पर अनिवार्य सोशल ऑडिट लागू हो हर सांसद का सार्वजनिक श्वेत पत्र अनिवार्य होबेकार और दिखावटी योजनाओं पर दंडात्मक कार्रवाई हो,और यदि यह सब संभव नहीं—तो ईमानदारी से स्वीकार किया जाए कियह योजना विफल हो चुकी है।इतिहास बहुत साफ़ है—जो व्यवस्था सवालों से भागती है,वह अंततः जनता के गुस्से से कुचली जाती है।

अब फैसला सांसदों को करना है—हिसाब देंगे, या इतिहास में लुटेरों की पंक्ति में खड़े होंगे।


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