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रविवार, 18 जनवरी 2026

मित्रता का भ्रम और विश्वासघात का युग

वेदप्रकाश सिंह

 मित्रता का भ्रम और विश्वासघात का युग


( कौटिल्यीय दृष्टि)

आज का समाज विश्वासघात से इतना परिचित हो चुका है कि वह उसे अपवाद नहीं, नियति मानने लगा है। राजनीति में दलबदल, संगठनों में भीतरघात, उद्योग में साझेदारों की गद्दारी और व्यक्तिगत जीवन में आत्मीय संबंधों का टूटना—यह सब किसी एक व्यक्ति या युग की समस्या नहीं है। प्रश्न अधिक मूलभूत है: क्या विश्वासघात का जन्म मित्रता से होता है? और यदि “मित्रता” शब्द ही न होता, तो क्या यह विषाक्त वृत्ति पनप पाती?

कौटिल्य के भारत में इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं में नहीं, व्यवस्था में मिलता है।

मित्रता, आधुनिक समाज की दृष्टि में, नैतिक पवित्रता का पर्याय बन चुकी है। मित्र वह माना जाता है जिससे अपेक्षा की जाती है कि वह हर परिस्थिति में साथ निभाएगा। किंतु यहीं से समस्या आरंभ होती है। जहाँ अपेक्षा जन्म लेती है, वहीं विश्वासघात की भूमि तैयार होती है। कौटिल्य इस भ्रम से बहुत पहले सावधान कर चुके थे। उनके लिए मित्र कोई भावनात्मक संबल नहीं, बल्कि हित-साधन था—परिस्थिति से बंधा हुआ, मर्यादा से नियंत्रित और समयानुकूल परिवर्तनीय।

समाज में विश्वासघात तब सबसे घातक होता है जब वह “अपने” द्वारा किया जाता है। शत्रु से चोट लगने पर चेतना सजग होती है, पर मित्र से लगी चोट आत्मा को घायल करती है। यही कारण है कि सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों और वैचारिक आंदोलनों में सबसे बड़ा संकट बाहरी विरोध नहीं, आंतरिक मित्रता का भावुक अतिरेक बन जाता है। नियमों को मित्रता के नाम पर शिथिल किया जाता है और अंततः वही मित्र व्यवस्था को तोड़ देता है।

राजनीति और रणनीति के क्षेत्र में मित्रता का यह भ्रम और भी घातक सिद्ध होता है। राष्ट्रों के संबंधों में “मित्र देश” जैसे शब्द सुनने में भले ही मधुर लगें, पर इतिहास सिखाता है कि स्थायी मित्रता जैसी कोई अवधारणा नहीं होती—केवल स्थायी हित होते हैं। जब नीति भावनात्मक मित्रता पर आधारित होती है, तब विश्वासघात को नैतिक अपराध समझा जाता है; जबकि कौटिल्य उसे रणनीतिक स्वाभाविकता मानते थे। उनके लिए सजगता ही सुरक्षा थी, भावना नहीं।

उद्योग और कॉर्पोरेट संसार में तो मित्रता सबसे बड़ा छल बन चुकी है। “हम एक परिवार हैं” जैसे वाक्य विश्वासघात की भूमिका लिखते हैं। लाभ के समय मित्रता का उत्सव और संकट के समय अनुबंध की कठोरता—यही आधुनिक उद्योग का चरित्र है। यदि आरंभ से ही संबंधों को भावनात्मक नहीं, अनुबंधात्मक माना जाता, तो विश्वासघात नहीं होता—केवल समझौते समाप्त होते।

तो क्या समाधान मित्रता को नकार देना है? नहीं। कौटिल्य मित्रता के विरोधी नहीं थे, वे उसके असीम विस्तार के विरोधी थे। मित्रता यदि मर्यादा में रहे तो शक्ति बनती है; यदि वह नियमों से ऊपर उठा दी जाए, तो वही विश्वासघात का कारण बनती है। आधुनिक समाज की त्रासदी यह है कि उसने मित्रता को नैतिक देवता बना दिया और नियमों को उसका दास।

अंततः यह स्वीकार करना होगा कि विश्वासघात कोई असामान्य विकृति नहीं, बल्कि भावुक मित्रता की स्वाभाविक परिणति है। यदि समाज, राज्य और उद्योग कौटिल्य की चेतावनी को गंभीरता से लें—कि संबंधों से ऊपर व्यवस्था और भावना से ऊपर हित रखें—तो विश्वासघात समाप्त भले न हो, पर वह घातक अवश्य नहीं रहेगा।

क्योंकि सभ्यता मित्रता से जीवित रहती है,

पर राज्य और समाज मर्यादा से सुरक्षित रहते हैं।

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