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रविवार, 18 जनवरी 2026

“मेडिकल कॉलेज या मेडिको-आतंक के अड्डे? केजीएमसी, आगरा और बस्ती में सुरक्षा का खतरनाक ढोंग”

“मेडिकल कॉलेज या मेडिको-आतंक के अड्डे?






केजीएमसी, आगरा और बस्ती में सुरक्षा का खतरनाक ढोंग”
 
संपादकीय 
 इसमें किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया गया है, बल्कि संस्थागत लापरवाही, सुरक्षा-विरोधाभास और वैचारिक उदासीनता पर कठोर प्रश्न उठाए गए हैं — जैसा कि आप अपने मंच “कौटिल्य का भारत 
 केजीएमसी, आगरा और बस्ती :मेडिकल संस्थानों में पनपता ‘मेडिको-आतंक’ —जहाँ मिलिट्री गार्ड हैं, पर भीतर बेखौफ घुसपैठ!**भारत में मेडिकल कॉलेज केवल शिक्षा संस्थान नहीं होते। वे राष्ट्रीय स्वास्थ्य-सुरक्षा की रीढ़,आपदा-काल में रणनीतिक संसाधन,और सामान्य समय में लोक-विश्वास के मंदिर माने जाते हैं। परंतु जब यही संस्थान आतंक, अवैध आवागमन, संदिग्ध गतिविधियों और प्रशासनिक उदासीनता के केंद्र बनते दिखें —तो प्रश्न केवल स्वास्थ्य का नहीं रहता,
वह राष्ट्र-सुरक्षा और सामाजिक संतुलन का प्रश्न बन जाता है।
केजीएमसी (लखनऊ), आगरा मेडिकल कॉलेज और बस्ती मेडिकल कॉलेज से जुड़े हालिया घटनाक्रम
इसी गहरे संकट की ओर संकेत करते हैं। ‘मेडिको-आतंक’ : एक नया, खतरनाक शब्द
आतंक का पारंपरिक स्वरूप अब बदल चुका है।
आज वह AK-47 लेकर सीमा पार से नहीं आता —
वह स्टेथ मोड में आता है। कभी सफेद कोट में
कभी मरीज का तीमारदार बनकर कभी धार्मिक पहचान की आड़ में और कभी स्थानीय संरक्षण के भरोसे इसे ही कहा जा सकता है —“मेडिको-आतंक”जहाँ:अस्पताल का खुला वातावरण मरीजों की भीड़ मानवीय संवेदनशीलता
और प्रशासनिक ढील सब मिलकर इसे आदर्श कवर दे देते हैं। केजीएमसी : देश का प्रतिष्ठित संस्थान, पर सुरक्षा में छेद
केजीएमसी केवल उत्तर प्रदेश नहीं, पूरे उत्तर भारत का रेफरल मेडिकल हब है। यहाँ: हाई-प्रोफाइल मरीज आते हैं वीवीआईपी मूवमेंट होता है गंभीर आपराधिक और आतंकी मामलों के आरोपी भी इलाज के लिए लाए जाते हैं ऐसे में प्रश्न उठता है:
क्या केजीएमसी का सुरक्षा तंत्र,उसके संवेदनशील दर्जे के अनुरूप है? रिपोर्ट्स और स्थानीय अनुभव बताते हैं:
बाहरी व्यक्तियों का बेरोक-टोक प्रवेश पहचान सत्यापन की कमजोरी धार्मिक/सामाजिक नेटवर्क के नाम पर जमावड़ा
संदिग्ध लोगों का नियमित आना-जाना यह सब तब,
जब देश आतंक के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करता है।
 आगरा : मिलिट्री गार्ड बाहर, भीतर अराजकता आगरा मेडिकल कॉलेज का परिदृश्य और भी चौंकाने वाला है।
एक ओर: मिलिट्री या अर्धसैनिक गार्ड हथियारबंद सुरक्षा हाई-अलर्ट ज़ोन का दावा और दूसरी ओर:भीतर बाहरी तत्वों की निर्बाध आवाजाही धार्मिक गतिविधियों के नाम पर जमाव
स्थानीय प्रभावशाली समूहों का हस्तक्षेप यह दृश्य एक तीखा व्यंग्य रचता है:दरवाज़े पर देश की सेना, और भीतर सिस्टम की आत्मसमर्पण मुद्रा!यदि: गार्ड केवल दिखावे के लिए हैं
और अंदर का नियंत्रण स्थानीय दबावों के आगे नतमस्तक है
तो यह सुरक्षा नहीं, सुरक्षा का भ्रम है। बस्ती : नया मेडिकल कॉलेज, पुरानी बीमारियाँ बस्ती मेडिकल कॉलेज को
पूर्वांचल की स्वास्थ्य-क्रांति का प्रतीक बताया गया।
परंतु:अवैध आवागमन स्थानीय ‘सांस्कृतिक-धार्मिक’ दबाव
प्रशासनिक ढुलमुल रवैया और सुरक्षा मानकों की अनदेखी
इसे भी उसी रास्ते पर ले जाती दिख रही है जहाँ संस्थान कमजोर और नेटवर्क मजबूत हो जाते हैं। विशेष चिंता का विषय: कुछ वर्ग विशेष के लोगों का नियमित आना-जाना
बिना चिकित्सा प्रयोजन परिसर में मौजूदगी और इन सब पर प्रशासन की चुप्पी यह चुप्पी: सरल लापरवाही नहीं
बल्कि संस्थागत भय या मिलीभगत का संकेत देती है।
 ‘बकरा अंदर कैसे आया?’ — यह सवाल साधारण नहीं है
जब लोग पूछते हैं:“इतनी सुरक्षा के बाद भी अंदर बकरा कैसे आ गया?”तो यह सवाल केवल प्रतीकात्मक नहीं।बकरा’ यहाँ:
अवैध प्रवेश का प्रतीक है ।नियंत्रणहीन व्यवस्था का संकेत है
और सिस्टम की आँख मूँदने की प्रवृत्ति का प्रमाण है
आज बकरा है,कल कुछ और होगा। आतंक हमेशा छोटे छेद से ही प्रवेश करता है।  स्थानीय मुल्लाओं / प्रभावशाली धार्मिक व्यक्तियों का आवागमन : सवाल क्यों?यह प्रश्न संवेदनशील है,पर टालने योग्य नहीं। मुद्दा धर्म का नहीं,मुद्दा है:अनुचित आवागमन,अस्पताल के गैर-चिकित्सीय उपयोग,और प्रशासनिक पक्षपात या डर जब: हर मरीज के तीमारदार पर नियम लागू हों पर कुछ लोगों को ‘छूट’ मिले
तो यह सेक्युलरिज़्म नहीं यह चयनात्मक उदारता है।
और चयनात्मक उदारता हमेशा सुरक्षा के लिए घातक होती है।
प्रशासनिक उदासीनता : सबसे बड़ा अपराध इन सभी मामलों में सबसे बड़ा दोषी कोई व्यक्ति नहीं,बल्कि उदासीन प्रशासनिक मानसिकता है।“सब चलता है”“ऊपर से आदेश नहीं है”“विवाद क्यों मोल लें?”यही सोच:संस्थानों को कमजोर करती हैऔर असामाजिक तत्वों को ताकत देती है इतिहास गवाह है:आतंक हमेशा उदासीनता की गोद में पलता है मेडिकल कॉलेज : सॉफ्ट टारगेट क्यों बन रहे हैं?
कारण स्पष्ट हैं:24×7 खुला परिसर,भीड़ का दबाव भावनात्मक वातावरण सुरक्षा और मानवता के बीच असंतुलन राजनीतिक और स्थानीय दबाव पर समाधान भी स्पष्ट है —यदि इच्छाशक्ति हो।  समाधान : कठोर, स्पष्ट और निष्पक्ष अब आधे-अधूरे उपाय नहीं चलेंगे। ज़रूरी है: सख्त प्रवेश नियंत्रण प्रणाली
डिजिटल ID और विज़िटर लॉग धार्मिक/सामाजिक गतिविधियों पर स्पष्ट SOP स्थानीय दबावों से मुक्त प्रशासन
नियम तोड़ने पर शून्य सहनशीलता और सबसे ज़रूरी:डरमुक्त प्रशासन
अंतिम प्रश्न :क्या हम किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहे हैं?
भारत ने: संसद पर हमला देखा अस्पतालों में बम ब्लास्ट देखे
और ‘नरम रवैये’ की कीमत चुकाई है फिर भी यदि मेडिकल कॉलेज जैसे संवेदनशील संस्थान आज भी प्रयोगशाला बने हुए हैं —तो यह केवल लापरवाही नहीं,यह ऐतिहासिक भूल होगी।
कौटिल्य का प्रश्न स्पष्ट है:क्या मेडिकल कॉलेज इलाज के केंद्र रहेंगे, या ‘मेडिको-आतंक’ के सुरक्षित ठिकाने बनते रहेंगे?अब निर्णय सरकार, प्रशासन और समाज —तीनों को करना है।
रेडी संस्करण में ढाल सकता हूँ

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