संपादकीय
बस्ती : मेडिकल कॉलेजों की प्रयोगशाला, जहाँ इंसान नहीं — “बकरा” चाहिए
यह अब आशंका नहीं रही, यह खुला खतरा है।बस्ती आज बीमार इसलिए नहीं है कि यहाँ मरीज ज़्यादा हैं,बल्कि इसलिए कि यहाँ मेडिकल कॉलेजों ने इंसान को नहीं, “कच्चा माल” समझना शुरू कर दिया है।यह संपादकीय किसी एक कॉलेज, एक घटना या एक व्यक्ति पर नहीं—पूरी व्यवस्था पर अभियोग-पत्र है।मेडिकल कॉलेज : इलाज का केंद्र या संगठित अपराध का कवर?जिस मेडिकल कॉलेज को जीवन-रक्षा का अंतिम भरोसा होना चाहिए था,वही आज—शोषण का सुरक्षित क्षेत्र,संवेदनशील गतिविधियों का ढका हुआ मंच,और वैचारिक–आपराधिक प्रयोगों की प्रयोगशाला बनता जा रहा है।यह कोई दुर्घटना नहीं है। यह चयन है। यह रणनीति है।बस्ती को इसलिए चुना गया क्योंकि यहाँ—आवाज़ दबाना आसान.हैडर दिखाना कारगर हैऔर सिस्टम सवाल पूछने से पहले समझौता कर लेता है बकरा” क्यों बनती है बस्ती?सच कड़वा है, पर साफ हछोटा जिला = कम मीडिया दबावग,रीब–मध्यमवर्गीय मरीज = विरोध की क्षमता शून्यछात्रों का भविष्य दांव पर = ब्लैकमेल आसान,स्थानीय तंत्र = या तो मौन, या मिला हुआ.यानी बस्ती वह जगह है जहाँजो करना है करो, पूछने वाला कोई नहीं।संवेदनशील गतिविधियाँ : जो फाइलों में नहीं, फुसफुसाहटों में दर्ज हैं
हॉस्टल और वार्ड में असामान्य धार्मिक–वैचारिक हस्तक्षेप,महिला और नाबालिग मरीजों के साथ गोपनीयता का खुला उल्लंघन,इलाज के नाम पर मानसिक निर्भरता और भय का निर्मा काउंसलिंग के बहाने चेतना पर कब्ज़ाऔर सबसे खतरनाक— सब जानते हैं ,कोई लिखता नहीं ,कोई बोलता नहीं,यही वह बिंदु है जहाँ अपराध, संस्थान बन जाता है।प्रशासन की चुप्पी : अक्षमता नहीं, अपराधअब यह कहना झूठ है कि प्रशासन अनजान है।जब शिकायतें हैं, रिपोर्ट हैं, चर्चा है—तो मौन का अर्थ है सहमति।आज बस्ती में सवाल यह नहीं है कि—“गलत क्या हो रहा है?”सवाल यह है कि—“किसके संरक्षण में हो रहा है?”यह केवल मेडिकल कॉलेज नहीं, राज्य की सुरक्षा का प्रश्न है जो लोग इसे “स्थानीय मामला” समझ रहे हैं, वे मूर्ख हैं।यह मॉडल है—आज बस्ती,कल कोई और जिला परसों पूरा पूर्वांचलजब मेडिकल संस्थान राज्य के भीतर राज्य बन जाते हैं,तो कानून कागज़ रह जाता है और संविधान दीवार पर टंग जाता है।
अब निर्णय का क्षण है या तो—मेडिकल कॉलेजों का पूर्ण, स्वतंत्र और केंद्रीय ऑडिट हो हॉस्टल, वार्ड, काउंसलिंग सिस्टम की न्यायिक जांच होदोषियों के नाम, पद और संरक्षक सार्वजनिक होंया फिर स्वीकार कर लिया जाए कि—बस्ती को जानबूझकर बकरा बनाया गया।
अंतिम चेतावनी,बस्ती कोई निरीह प्रयोगशाला नहीं है।यह वह ज़मीन है जहाँ चुप्पी टूटती है तो इतिहास बदलता है।आज यह संपादकीय है—कल यहv जनाक्रोश होगा।और तब किसी मेडिकल कॉलेज की डिग्री किसी को नहीं बचा पाएगी।
मेडिकल रेजिडेंट आबध घूमना, सी सी केमरो क़ी अनुपस्थिति, संदिग्ध गतिविधियां,अलफलाह यूनिवर्सिटी की तर्ज पर केजीएमयू और एम यू के तर्ज पर बस्ती, हो सकता है कल सारा पूर्वांचल जले तो अग्निशमन कौन बनेगा?
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