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मंगलवार, 13 जनवरी 2026

उत्तरायण का स्वागत,सनातन विज्ञान और मकर संक्रांति

 विचारोत्तेजक और राष्ट्रबोधक संपादकीय 






मकर संक्रांति : सूर्य की दिशा बदली, क्या हमारी दृष्टि भी बदलेगी?

मकर संक्रांति केवल तिथि नहीं, दृष्टिकोण का परिवर्तन है। यह वह क्षण है जब सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ता है—और भारतीय परंपरा में इसे अंधकार से प्रकाश की यात्रा माना गया है। प्रश्न यह है कि जब सूर्य उत्तरायण होता है, तो क्या हमारा समाज भी संस्कार, विज्ञान और समरसता की ओर बढ़ता है?

भारत की कालगणना किसी व्यक्ति, सत्ता या घटना से नहीं, बल्कि सूर्य और ऋतुचक्र से जुड़ी रही है। यही कारण है कि मकर संक्रांति जैसे पर्व हजारों वर्षों बाद भी अप्रासंगिक नहीं हुए। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सभ्यता वही टिकती है, जो प्रकृति के साथ तालमेल बिठा कर चलती है।

वैदिक परंपरा में सूर्य को आत्मा कहा गया—“सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च”।यह कोई काव्यात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि जीवन के मूल सत्य की स्वीकृति है। कृषि, स्वास्थ्य, ऋतु और समय—सब सूर्य से ही नियंत्रित हैं। ऐसे में  संक्रांति भारतीय विज्ञान-बोध का सार्वजनिक उत्सव बन जाती है। पौराणिक स्मृति में भी यह पर्व आत्मसंयम और मोक्ष से जुड़ा है। भीष्म पितामह का उत्तरायण की प्रतीक्षा करना यह संकेत देता है कि भारतीय चिंतन में समय का नैतिक मूल्य भी है। श्रीकृष्ण का उत्तरायण को मोक्षदायक बताना हमें यह समझाता है कि जीवन केवल भोग नहीं, बोध भी है।

 मकर संक्रांति: सूर्योदय का संदेशमकर संक्रांति हिंदू संस्कृति का प्रमुख पर्व है, जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक है। यह त्योहार धार्मिक भक्ति, वैज्ञानिक सिद्धांत और सांस्कृतिक एकता को दर्शाता है। धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्वयह पर्व वैदिक काल से चला आ रहा है, जहां सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य पर जोर दिया जाता है। पुराणों में वर्णित है कि सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने आते हैं, तथा महाभारत में भीष्म पितामह ने इसी दिन देह त्याग किया। उत्तरायण को प्रकाश का काल माना जाता है, जो शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त है। 2026 की तिथि एवं मुहूर्त14 जनवरी 2026 को दोपहर लगभग 3:13 बजे सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। पुण्य काल दोपहर 3:13 से शाम 5:45 तक तथा महापुण्य काल 3:13 से 4:58 तक रहेगा। इस समय स्नान, दान और पूजा सर्वोत्तम फलदायी हैं। वैज्ञानिक आधारविज्ञान के अनुसार, यह शीतकालीन संक्रांति के बाद सूर्य का उत्तर की ओर झुकाव है, जिससे दिन लंबे और ठंड कम होती है। पृथ्वी के अक्षीय झुकाव से उत्पन्न यह घटना मौसम परिवर्तन का सूचक है, जो कृषि के लिए शुभ है। परंपराएं एवं रीति-रिवाजप्रातः पवित्र नदियों में स्नान, सूर्य को अर्घ्य, तिल-गुड़ भोग और दान प्रमुख हैं। तिल दान से शनि दोष निवारण होता है, जबकि खिचड़ी दान अगले दिन किया जाता है। पूजा में गंगा आवाहन मंत्र और सूर्य गायत्री का जाप करें। भारतव्यापी विविधताउत्तर भारत में खिचड़ी या मकर संक्रांति, तमिलनाडु में पोंगल (फसल उत्सव), पंजाब में लोहड़ी (अग्नि पूजा), असम में बिहू (मवेशी पूजा) के रूप में मनाया जाता है। गुजरात-राजस्थान में पतंग उड़ाना प्रसिद्ध है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीकयह पर्व भारतीय संस्कृति की एकता को मजबूत करता है, जहां सूर्योपासना से राष्ट्रीय चेतना जागृत होती है। किसानों की समृद्धि और सामाजिक सद्भाव का संदेश देता है, जो सनातन परंपरा की गौरवगाथा है। 

राजेंद्र नाथ तिवारी

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