वंदे मातरम् : सांस्कृतिक पुनर्जागरण 2009 — जब राष्ट्र ने स्वयं को पहचाना
वन्देमातरम त्रिषष्टिः श्रृंखला 63
वर्ष 2009 केवल एक राजनीतिक वर्ष नहीं था,वह भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का निर्णायक मोड़ था। और इस पुनर्जागरण का घोषवाक्य बना — “वंदे मातरम्”।यह कोई नारा नहीं था,
यह राष्ट्र की आत्मा की पुकार थी। वंदे मातरम् : गीत नहीं, राष्ट्रबोध“वंदे मातरम्” को वर्षों तक—सांप्रदायिक विवाद में घसीटा गया संविधान से टकराव का भ्रम फैलाया गया.राष्ट्रभक्ति के स्थान पर “विकल्प” बताया गया,पर 2009 आते-आते भारत ने समझ लिया—वंदे मातरम् किसी मत का नहीं,
मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता का स्वर है।,यह वह क्षण था जब राष्ट्र नेअपने इतिहास से भागना छोड़ दिया।
2009 : क्यों बना सांस्कृतिक टर्निंग पॉइंट 2009 तक भारत—आतंकवाद से घायल था,वैचारिक भ्रम से ग्रस्त था और आत्मग्लानि से दबा हुआ,लेकिन उसी दौर में—विश्वविद्यालयों में राष्ट्रचर्चा लौटी,युवा वर्ग ने “राष्ट्र” को शर्म नहीं, गर्व माना,सांस्कृतिक संगठनों ने वैचारिक स्पष्टता के साथ आवाज़ उठाई
और उसी वैचारिक प्रवाह में वंदे मातरम् फिर से सार्वजनिक चेतना का केंद्र बना। सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अर्थ यह पुनर्जागरण मंदिर–मस्जिद की राजनीति नहीं था।यह था—अपनी सभ्यता पर विश्वास अपने प्रतीकों का सम्मान और अपनी भाषा, गीत, इतिहास को,बोझ नहीं, विरासत मानना2009 के बाद
“राष्ट्रवाद” गाली नहीं रहा, वह विचार बना। विरोध क्यों हुआ? हर पुनर्जागरण का विरोध होता है।वंदे,मातरम् से डरने वालों को डर था—कहीं राष्ट्रबोध मज़बूत न हो जाए,कहीं युवा प्रश्न पूछने न लगें
कहीं भारत अपनी शर्तों पर खड़ा न हो जाए,इसलिए—इसे असहिष्णु कहा गया इसे विभाजनकारी बताया गया इसे राजनीति से जोड़ा गया पर सच यह है—जो मातृभूमि को माँ कहने से डरता है,वह उसे बेचने में संकोच नहीं करता। 2009 का संदेश : राष्ट्र पहले, भ्रम बाद में 2009 ने यह स्पष्ट कर दिया—भारत को वैचारिक दया नहीं चाहिए उसे आत्मसम्मान चाहिए और आत्मसम्मान के केंद्र में है,वंदे मातरम् यह गीत—
यह राष्ट्र की आत्मा की पुकार थी। वंदे मातरम् : गीत नहीं, राष्ट्रबोध“वंदे मातरम्” को वर्षों तक—सांप्रदायिक विवाद में घसीटा गया संविधान से टकराव का भ्रम फैलाया गया.राष्ट्रभक्ति के स्थान पर “विकल्प” बताया गया,पर 2009 आते-आते भारत ने समझ लिया—वंदे मातरम् किसी मत का नहीं,
मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता का स्वर है।,यह वह क्षण था जब राष्ट्र नेअपने इतिहास से भागना छोड़ दिया।
2009 : क्यों बना सांस्कृतिक टर्निंग पॉइंट 2009 तक भारत—आतंकवाद से घायल था,वैचारिक भ्रम से ग्रस्त था और आत्मग्लानि से दबा हुआ,लेकिन उसी दौर में—विश्वविद्यालयों में राष्ट्रचर्चा लौटी,युवा वर्ग ने “राष्ट्र” को शर्म नहीं, गर्व माना,सांस्कृतिक संगठनों ने वैचारिक स्पष्टता के साथ आवाज़ उठाई
और उसी वैचारिक प्रवाह में वंदे मातरम् फिर से सार्वजनिक चेतना का केंद्र बना। सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अर्थ यह पुनर्जागरण मंदिर–मस्जिद की राजनीति नहीं था।यह था—अपनी सभ्यता पर विश्वास अपने प्रतीकों का सम्मान और अपनी भाषा, गीत, इतिहास को,बोझ नहीं, विरासत मानना2009 के बाद
“राष्ट्रवाद” गाली नहीं रहा, वह विचार बना। विरोध क्यों हुआ? हर पुनर्जागरण का विरोध होता है।वंदे,मातरम् से डरने वालों को डर था—कहीं राष्ट्रबोध मज़बूत न हो जाए,कहीं युवा प्रश्न पूछने न लगें
कहीं भारत अपनी शर्तों पर खड़ा न हो जाए,इसलिए—इसे असहिष्णु कहा गया इसे विभाजनकारी बताया गया इसे राजनीति से जोड़ा गया पर सच यह है—जो मातृभूमि को माँ कहने से डरता है,वह उसे बेचने में संकोच नहीं करता। 2009 का संदेश : राष्ट्र पहले, भ्रम बाद में 2009 ने यह स्पष्ट कर दिया—भारत को वैचारिक दया नहीं चाहिए उसे आत्मसम्मान चाहिए और आत्मसम्मान के केंद्र में है,वंदे मातरम् यह गीत—
सैनिक के होंठों पर संकल्प है,विद्यार्थी के मन में लक्ष्य है,और नागरिक के लिए उत्तरदायित्व,आज के भारत के लिए सीख,यदि भारत को—वैचारिक रूप से सशक्त बनाना हैसांस्कृतिक रूप से आत्मनिर्भर करना है
और वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास से खड़ा करना है तो उसे—वंदे मातरम् को केवल गाना नहीं, जीना होगा।
2009 में उठा यह स्वर आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
क्योंकि—राष्ट्र तब तक सुरक्षित नहीं होताजब तक उसकी संस्कृति सजग न हो।
वंदे मातरम् —यह अतीत नहीं, भारत का भविष्य है। 🙏🙏
और वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास से खड़ा करना है तो उसे—वंदे मातरम् को केवल गाना नहीं, जीना होगा।
2009 में उठा यह स्वर आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
क्योंकि—राष्ट्र तब तक सुरक्षित नहीं होताजब तक उसकी संस्कृति सजग न हो।
वंदे मातरम् —यह अतीत नहीं, भारत का भविष्य है। 🙏🙏
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