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मंगलवार, 20 जनवरी 2026

संत या राजनीतिक प्रवक्ता? क्यों बार-बार विवादों में आते हैं शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद

 

संत, सत्ता और स्वाभिमान: जब वैराग्य विवाद का औज़ार बन जाए






भारतीय परंपरा में संत सत्ता से ऊपर होता है, और सत्ता संत के चरणों में नहीं—संविधान और राष्ट्रहित के अधीन होती है।लेकिन आज एक विचित्र दृश्य बार-बार उभरता है—कुछ स्वयंभू या चर्चित संत, जिनका काम समाज को जोड़ना था,वे अनावश्यक विवादों के केंद्र बनते जा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में यह प्रश्न उठता है—आख़िर क्यों कुछ संत बार-बार राजनीतिक टकराव की भूमिका चुनते हैं?विवाद साधना नहीं, रणनीति बन जाए—तो प्रश्न उठेंगे किसी संत का बार-बार केंद्र सरकार के विरुद्ध बोलना, प्रदेश सरकारों पर एकतरफ़ा प्रहार करना, और एक ही राजनीतिक धारा के कथानकों से अनजाने में साम्य रखना यह सब यदि संयोग है,तो यह संयोग बहुत नियमित हो चला है।

और यदि संयोग नहीं है,तो यह साफ आध्यात्मिक भूमिका का राजनीतिक अपहरण है।संत और अहंकार: सबसे बड़ा विरोधाभासभारतीय दर्शन कहता है—अहंकार जहाँ प्रवेश करता है,वहाँ साधना विदा ले लेती है।जब कोई संत स्वयं कराष्ट्र से ऊपरसीसरकार से ऊपर और जनादेश से ऊपरमानने लगे,तो वह संत नहीं, विचारधारा का उपकरण बन जाता है।यही वह बिंदु है जहाँxवैराग्य, वर्चस्व में बदल जाता है। राष्ट्रीय स्वाभिमान बनाम चयनित आक्रोश एक और गंभीर प्रश्न यह है—राष्ट्रीय विषयों पर मौन,सीऔर राजनीतिक विषयों पर उग्रता—क्यों? जब देश की सुरक्षा का प्रश्न हो जब संस्कृति पर वैश्विक आघात होजब सनातन पर सीधा हमला हो तब कई संत मौन रहते हैं। लेकिन—चुनावसरकार नीति और एक विशेष राजनीतिक धारा आते ही स्वर तीखे हो जाते हैं। यह मौन और मुखरता का असंतुलन स्वाभिमान नहीं, चयनित आक्रोश को दर्शाता है। इतिहास की याद दिलाना आवश्यक है जो लोग आज सत्ता को ललकारने में आध्यात्मिक साहस का प्रदर्शन करते हैं, उन्हें इतिहास का एक अध्याय अवश्य याद रखना चाहिए।

 कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य को तत्कालीन तमिलनाडु सरकार ने—जयललिता के शासनकाल में—गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। उस समय:सीसत्ता कांग्रेस की सहयोगी थीकानून को राजनीतिक इच्छाशक्ति से मोड़ा गयाऔर संत पद भी राज्य की कठोरता से नहीं बच सका यह कोई कल्पना नहीं,दस्तावेज़ीकृत इतिहास है। तो प्रश्न उठता है—क्या आज बार-बार विवाद खड़ा करने वाले संत उसी इतिहास की पुनरावृत्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं? या उन्हें यह भ्रम है कि आज भी राजनीतिक सत्ता धार्मिक वस्त्र देखकर रुक जाएगी? 

कांग्रेस युग और ‘संतों की स्वतंत्रता’ का मिथक यह भी एक तथ्य है कि कांग्रेस शासनकाल मेसंत सुरक्षित नहीं थे मठ अछूते नहीं थे और आस्था को सत्ता की सुविधा के अनुसार तौला गया फिर भी आज कुछ संतों की भाषा,उसी वैचारिक धारा को अप्रत्यक्ष नैतिक बल देती प्रतीत होती है। यह विडंबना नहीं तो क्या है? संत का काम सरकार गिराना नहीं, समाज उठाना है संत का कार्य—समाज को दिशा देना नैतिक चेतना जगाना और राष्ट्र को जोड़ना है सरकारें आती-जाती हैं,लेकिन राष्ट्र स्थायी होता है।जो संत:हर विषय को सत्ता-विरोध में बदल देहर नीति को षड्यंत्र कहे और हर निर्णय को अधर्म बताए वह संत नहीं,राजनीतिक टिप्पणीकार की भूमिका में है। 

 राजनीतिक टिप्पणीकार आलोचना के लिए खुला होता है। कटघरे में प्रश्न, व्यक्ति नहीं यह लेख किसी व्यक्ति की साधना पर नहीं, उसके सार्वजनिक आचरण पर प्रश्न करता है। जब कोई संत:सीस्वयं को निष्पक्ष बताएलेकिन शब्द एकतरफ़ा हों स्वयं को राष्ट्रवादी कहे लेकिन राष्ट्रीय सरकार पर ही प्रहार करे तो कटघरा अपरिहार्य है।क्योंकि लोकतंत्र मेंके कोई भी सार्वजनिक भूमिका आलोचनाके से ऊपर नहीं।निष्कर्ष: संतों को चुनना होगा—साधना या सत्ता-संघर्षभारत को संत चाहिए—विवाद नहीं।

भारत को वैराग्य चाहिए—वर्चस्व नहीं।और भारत को राष्ट्रीय स्वाभिमान चाहिए—चयनित आक्रोश नहीं। जो संत इतिहास से नहीं सीखते, वे अक्सर इतिहास के कठोर अध्याय बन जाते हैं। यह चेतावनी है—आरोप नहीं।केक्योंकि राष्ट्र,किसी भी व्यक्ति, पद या पीठ से बड़ा है।


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