राजेंद्र नाथ तिवारी
स्त्री-गरिमा पर प्रहार और राज्य की परीक्षा
मध्य प्रदेश में बयान, कानून और सरकार की नैतिक जिम्मेदारी यह कोई साधारण विवाद नहीं है।यह किसी एक विधायक की असावधानी भी नहीं है।यह भारतीय लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक चेतना की अग्नि-परीक्षा है।
मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति की लड़कियों पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि —क्या सत्ता में बैठा व्यक्ति कानून से ऊपर है?और यदि नहीं, तो सरकार की चुप्पी किस अपराध की ओर संकेत करती है? विषय भावनात्मक नहीं, कानूनी और नैतिक रूप से विस्फोटक है।बयान नहीं, मानसिकता कठघरे में है जिस क्षण कोई जनप्रतिनिधि महिला—विशेषकर अनुसूचित जाति की लड़की—को उसकी देह, सुंदरता या सामाजिक स्थिति के चश्मे से देखता है,उस क्षण वह केवल स्त्री का नहीं,संविधान का अपमान करता है।यह बयान बताता है कि—सत्ता के कुछ हिस्सों में आज भी महिला = वस्तु दलित महिला = निर्बल वस्तु जैसी घातक सोच जीवित है।यह सोच ही अपराध की जननी है।
यह स्त्री का नहीं, राज्य की साख का प्रश्न है जब कोई आम नागरिक ऐसा बयान देता है,
तो कानून अपना काम करता है।लेकिन जब विधायक ऐसा कहे, तो यह राज्य की साख पर सीधा आघात होता है।
क्यों?क्योंकि विधायक:कानून बनाता हैनीति तय करता हैसमाज को दिशा देता हैयदि वही व्यक्ति महिला-विरोधीऔरजाति-विरोधी दृष्टि अपनाए,तो अपराधियों को मौन संरक्षण मिलता है।3सरकार की चुप्पी: अपराध से कम घातक नहीं अब प्रश्न विधायक से बड़ा है —सरकार क्या कर रही है?क्या हुआ:
कोई त्वरित निंदा नहीं कोई स्पष्ट अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कोई सख्त राजनीतिक संदेश नहीं यह चुप्पी बताती है कि:
“बयान गलत था, पर सत्ता असहज नहीं।”यही चुप्पी समाज में यह संदेश देती है किस्त्री-अपमान राजनीतिक रूप से सहनीय है।यह लोकतंत्र के लिए घातक है। कानून क्या कहता है? (स्पष्ट और कठोर)
यह मामला केवल नैतिक नहीं, दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।भारतीय दंड संहिता / भारतीय न्याय संहिताधारा 354A — महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला व्यवहार धारा 509 — महिला की लज्जा भंग करने वाला कथनजनप्रतिनिधि द्वारा दिया गया बयान अधिक गंभीर माना जाता है। अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम यदि टिप्पणी अनुसूचित जाति की महिलाओं को लक्षित करती है:यह SC/ST Act के अंतर्गत अपराध है
सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए शून्य सहिष्णुता अपेक्षित है,संविधान का उल्लंघन,अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार अनुच्छेद 15 — जाति व लिंग के आधार पर भेदभाव निषेध
अनुच्छेद 21 — गरिमा के साथ जीवन का अधिकारयह बयान तीनों पर सीधा प्रहार है। निंदा प्रस्ताव: औपचारिकता नहीं, संवैधानिक कर्तव्य निंदा प्रस्ताव कोई राजनीतिक रस्म नहीं है।पयह होता है:लोकतंत्र की नैतिक घोषणा,समाज को दिया गया संदेश,प्रशासन को दिया गया संकेत,यदि विधानसभा ऐसे मामलों में मौन रहती है,
तो वह स्वयं आरोपी के साथ खड़ी मानी जाती है। त्वरित कार्रवाई क्यों जरूरी है?देरी के परिणाम:,पीड़ित वर्ग में अविश्वास
समाज में अपराध को वैधता,सत्ता की नैतिक साख का क्षरण,त्वरित कार्रवाई का अर्थ:,बयान की सार्वजनिक निंदा
कानूनी प्रक्रिया की स्पष्ट घोषणाराजनीतिक संरक्षण से इनकार
यही सुशासन की पहचान है।यह महिला बनाम पुरुष नहीं है,यह युद्ध:महिला बनाम पुरुष का नहीं,जाति बनाम जाति का नहीं यह युद्ध है:संविधान बनाम कुंठित मानसिकता का जो इसे “राजनीतिक मुद्दा” कहकर टालते हैं,
वे दरअसल अपराध को वैचारिक सुरक्षा दे रहे हैं। समाज की भूमिका: चुप रहना भी अपराध हैजब समाज चुप रहता है:
बयान सामान्य हो जाते हैं,अपराध संस्कृति बन जाते हैं,आज आवश्यकता है कि:,मीडिया प्रश्न पूछे,बुद्धिजीवी मुखर हों
नागरिक सत्ता से जवाब माँगे क्योंकि कल यही चुप्पी किसी और बेटी पर भारी पड़ेगी।
सरकार के सामने निर्णायक प्रश्न,मध्य प्रदेश सरकार से प्रश्न सीधा है:क्या आपकी सत्ता,स्त्री की गरिमा से ऊपर है?
क्या राजनीतिक सुविधा, संविधान से बड़ी है?और क्या दलित बेटी की अस्मिता,केवल भाषणों तक सीमित है?
मौन नहीं, निर्णय चाहिए यह समय आधे-अधूरे बयान का नहीं है।यह समय स्पष्ट, कठोर और सार्वजनिक निर्णय का है।
जो सत्ता स्त्री-अपमान पर चुप रहती है,वह देर-सबेर लोकतंत्र की हत्या करती है।मध्य प्रदेश सरकार को चाहिए कि:तत्काल सार्वजनिक निंदा करे कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करे,विधानसभा में स्पष्ट प्रस्ताव लाए यह संदेश दे कि —महिला कीगरिमा पर कोई समझौता नहीं क्योंकि: महिला को भोग की दृष्टि से देखना पाप है,और सत्ता का उस पाप पर मौन—राज्य का
महा पाप,

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