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सोमवार, 19 जनवरी 2026

वन्देमातरम्: गिरमितिया समाज की पीड़ा, स्मृति और विदेशस्थ सहयोग का वैश्विक उद्घोष 66

 वंदेमातरम षट्षष्टिःश्रृंखला






वन्देमातरम्: गिरमितिया समाज की पीड़ा, स्मृति और विदेशस्थ सहयोग का वैश्विक उद्घोष

गीत नहीं, जागरण

‘वन्देमातरम्’ भारत का केवल एक देशभक्ति गीत नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध राष्ट्रीय आत्मा का घोष है। यह वह मंत्र है जिसने भारत की सीमाओं के भीतर ही नहीं, बल्कि समुद्र पार बसे गिरमितिया समाज और विदेशों में सक्रिय भारतीयों के हृदय में भी स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्ज्वलित की। जब भारत में आंदोलन चल रहे थे, तब हज़ारों मील दूर खेतों, खदानों और बस्तियों में बसे भारतीय ‘वन्देमातरम्’ के उच्चारण से अपनी जड़ों से जुड़े रहे।

 गिरमितिया समाज: आधुनिक दासता का इतिहास

ब्रिटिश साम्राज्य ने 19वीं शताब्दी में दास-प्रथा के औपचारिक अंत के बाद गिरमिट (Agreement) प्रणाली शुरू की। भारत से लाखों लोगों को अनुबंधित श्रमिक बनाकर फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में भेजा गया।

अमानवीय श्रम सामाजिक अपमानcभाषा, धर्म और संस्कृति पर आघात इन परिस्थितियों में भारत उनके लिए स्मृति और स्वप्न बन गया। और उसी स्मृति का नाम था—वन्देमातरम्।

वन्देमातरम्: स्मृति से संघर्ष तक गिरमितिया समाज के लिए वन्देमातरम् तीन स्तरों पर काम करता रहा—सांस्कृतिक स्मृति – भारत माता की यादआत्मिक संबल – अपमान के विरुद्ध आत्मगौरवराजनीतिक चेतना – औपनिवेशिक अन्याय के प्रति प्रतिरोधजब श्रमिकों को कोड़ों से पीटा जाता, मजदूरी छीनी जाती, तब भारत की धरती की कल्पना उन्हें टूटने नहीं देती थी।

मॉरीशस: गिरमितिया चेतना का केंद्र,मॉरीशस गिरमितिया इतिहास का सबसे सशक्त उदाहरण है।आर्य समाज, सनातन धर्म सभा और हिंदी प्रचारिणी संस्थाओं नेcरामायण पाठ, होली–दीवाली आयोजनों में वन्देमातरम्’ को सामूहिक गायन का अंग बनाया यह गीत वहाँ के भारतीयों के लिए “राजनीति” नहीं, बल्कि आत्मसम्मान था।आज मॉरीशस में भारतीय मूल के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति—यह उसी चेतना का परिणाम है।

फिजी: शोषण के बीच प्रतिरोध,फिजी में भारतीय श्रमिकों पर अत्याचार अत्यंत क्रूर था।1916–1920 के श्रमिक आंदोलनों के दौरान—गुप्त सभाओं मेंसीमंदिरों और सामुदायिक बैठकों मेंवन्देमातरम्’ का उच्चारण ब्रिटिश प्रशासन को भयभीत करता था।यह गीत वहाँ विद्रोह का सांस्कृतिक हथियार बन गया।

 सूरीनाम और कैरिबियन द्वीप,सूरीनाम, त्रिनिदाद और गुयाना में—भोजपुरी–अवधी लोकगीतों के साथ,वन्देमातरम् को जोड़ा गया,भारत “भौगोलिक देश” नहीं, बल्कि मातृ-सत्ता के रूप में जीवित रहा

इन देशों में आज भी भारतीय मूल के लोग स्वतंत्रता दिवस पर वन्देमातरम् गाते हैं—यह ऐतिहासिक निरंतरता का प्रमाण है।

दक्षिण अफ्रीका: गांधी और वन्देमातरम्द,क्षिण अफ्रीका में गांधीजी के नेतृत्व में भारतीयों का संघर्ष केवल नागरिक अधिकारों तक सीमित नहीं था—वह भारत की आज़ादी से जुड़ा था।

सत्याग्रह सभाओं में भारतीय एकता बैठकों में‘वन्देमातरम्’ ने नैतिक साहस दिया यह गीत नस्लीय अपमान के विरुद्ध आत्मबल बना। ब्रिटेन: साम्राज्य की राजधानी में चुनौती लंदन—ब्रिटिश साम्राज्य का केंद्र—वहीं भारतीय छात्रों और क्रांतिकारियों ने—इंडिया हाउसभारतीय छात्र संघ,सार्वजनिक सभाओं में वन्देमातरम्’ को ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रतीकात्मक चुनौती बनाया।यह गीत संसद, प्रेस और जनमत तक पहुँचा। अमेरिका और गदर आंदोलन अमेरिका में गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने—सभाओं पत्रिकाओं ,भाषणोंमें ‘वन्देमातरम्’ को भारत की स्वतंत्रता का उद्घोष बनाया।यह गीत भारतीय प्रवासियों को क्रांतिकारी एकता में बाँधता था।. सुभाष बोस, एशिया और वन्देमातरम्आजाद हिंद आंदोलन में—सिंगापुर ,मलाया,जापान,में भारतीय सैनिकों और प्रवासियों ने वन्देमातरम् को राष्ट्रीय स्वप्न के रूप में जिया।यह गीत एशिया में औपनिवेशिक विरोध का साझा स्वर बना।

 वन्देमातरम् का वैश्विक अर्थ,विदेशों में वन्देमातरम्—धार्मिक नहीं, राष्ट्रीय था,उग्र नहीं, गौरवपूर्ण था,विभाजनकारी नहीं, एकताबद्ध था

इसने भाषा, जाति और प्रांत से ऊपर उठकर भारतीयता को जोड़ा। आज का संदर्भ: विस्मृति बनाम स्मरणआज जब वन्देमातरम् पर प्रश्न उठते हैं, तब गिरमितिया समाज का इतिहास उत्तर देता है—जिन्होंने कोड़ों के साए में भी वन्देमातरम् नहीं छोड़ा,वे जानते थे कि यह गीत किसी संप्रदाय का नहीं,बल्कि मातृभूमि की चेतना का है।

 समुद्र पार गूँजती मातृ-वंदना,वन्देमातरम् ने गिरमितिया समाज को बताया कि वे केवल मजदूर नहीं—भारत माता की संतान हैं।विदेशस्थ सहयोग, आंदोलनों और सांस्कृतिक मंचों के माध्यम से यह गीत,भारत की स्वतंत्रता का वैश्विक घोष बन गया।आज आवश्यकता है कि—इस इतिहास को पढ़ाया जाए,गिरमितिया योगदान को सम्मान मिलेवन्देमातरम् को उसकी सम्पूर्ण राष्ट्रीय गरिमा में समझा जाए क्योंकिजिस गीत ने दासता में भी भारत को जीवित रखा,वह कभी विवाद का विषय नहीं हो सकता—वह इतिहास की शपथ है।

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